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- संकट और समाधान: उच्चतर...

भूपेंद्र सिंह | अस्पतालों में अव्यवस्था और खासकर ऑक्सीजन की कमी को लेकर कोरोना मरीजों की मौतों पर विभिन्न उच्च न्यायालयों की ओर से जो नाराजगी प्रकट की जा रही है, वह उचित ही है, लेकिन उनकी ओर से सरकारों को फटकारने के साथ जो अनावश्यक टिप्पणियां की जा रही हैं, उनसे हालात सुधारने में शायद ही कोई मदद मिले। ऑक्सीजन की कमी से मरीजों की मौत को नरसंहार बताने अथवा केंद्र सरकार को शुतुरमुर्ग की संज्ञा देने से आम जनता की पीड़ा भले ही व्यक्त हो जाए, समस्याओं का समाधान नहीं होने वाला। शायद इसी कारण कि उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय की ओर से केंद्र सरकार को जारी अवमानना नोटिस पर रोक लगाते हुए यह सवाल किया कि आखिर चार अधिकारियों को जेल में डालने से क्या होगा? यह वह सवाल है, जिस पर उन उच्चतर अदालतों को चिंतन-मनन करना चाहिए, जो हालात की गंभीरता से परिचित होते हुए भी तीखी टिप्पणियां करने में लगी हुई हैं। डांट-फटकार का सिलसिला स्थितियां सुधारने के बजाय उस सरकारी अमले का मनोबल प्रभावित करने का काम कर सकता है, जिसे हालात पर काबू पाना है। बेहतर हो कि उच्चतर अदालतें सरकारों और उनके प्रशासन की ढिलाई को इंगित करने के साथ-साथ समस्या के समाधान के उपाय भी सुझाएं।





