सम्पादकीय

क्रिकेट, कश्मीर और पाकिस्तान

Subhi
28 Oct 2021 3:04 AM GMT
क्रिकेट, कश्मीर और पाकिस्तान
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दुबई में हुए भारत-पाक के बीच क्रिकेट मैच में पाकिस्तान की जीत पर देश के कुछ हिस्सों में जिस तरह कुछ कश्मीरी युवा लोगों ने खुशी का इजहार किया उसे समस्त कश्मीरी अवाम का ख्याल नहीं माना जा सकता है

आदित्य नारायण चोपड़ा: दुबई में हुए भारत-पाक के बीच क्रिकेट मैच में पाकिस्तान की जीत पर देश के कुछ हिस्सों में जिस तरह कुछ कश्मीरी युवा लोगों ने खुशी का इजहार किया उसे समस्त कश्मीरी अवाम का ख्याल नहीं माना जा सकता है क्योंकि यह वही अवाम है जिसने 1947 में मजहब की बुनियाद पर पाकिस्तान के निर्माण का पुरजोर विरोध किया था। दरअसल जिन गिने-चुने लोगों ने भी इस सामान्य खेल स्पर्धा को राष्ट्रीय अस्मिता के तारों से बांधने की कोशिश की है वह उनकी जहालत का ही नमूना कहा जायेगा और इसके समानान्तर जिन लोगों ने भी भारत के कुशल क्रिकेट खिलाड़ी मोहम्मद शमी की देशभक्ति पर प्रश्न चिन्ह लगाने की कोशिश सिर्फ उसके मजहब की वजह से की है, वे भी इसी श्रेणी में डाले जायेंगे। किसी क्रिकेट खिलाड़ी के मुस्लिम होने की वजह से पाकिस्तान के खिलाफ खेलते हुए उसके खेल कौशल पर सवालिया निशान नहीं लगाया जा सकता है। 1965 में जब भारत-पाकिस्तान का युद्ध हुआ था तो देश के राष्ट्रपति पद पर डा. जाकिर हुसैन विराजमान थे और भारत के संविधान के अनुसार राष्ट्रपति तीनों सेनाओं के चीफ कमांडर होते हैं। उस युद्ध में भारत की फौजें पाकिस्तान के शहर लाहौर और कराची तक पहुंच गई थीं। इसी प्रकार 1965 का युद्ध शुरू होने से पहले पाकिस्तान की फौजों की कश्मीर में घुसपैठ की पहली सूचना कश्मीरी बकरवाल नागरिकों ने ही सेना को दी थी। अतः श्रीनगर, आगरा, उदयपुर और साम्बा में जिन कश्मीरी युवाओं पर भी पाकिस्तान की जीत का जश्न मनाने के आरोपों में फौजदारी कानूनों की जिन धाराओं के तहत भी मुकदमे दर्ज किये गये हैं उन्हें आगे चलाने के बारे में गंभीरतापूर्वक सकल राष्ट्रहित के सन्दर्भओं में विचार किया जाना चाहिए क्योंकि ऐसा करने वालों ने देशभक्त कश्मीरी अवाम का ही अपमान किया है। इस मामले में सबसे पहले यह विचार किये जाने की जरूरत है कि खेल केवल खेल होता है जिसमें दो टीमें अपने खेल कौशल व प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए हारती या जीतती हैं। जाहिर है कि जो टीम ज्यादा बेहतर होगी वही जीतेगी और बधाई की पात्र होगी। दुबई में पाकिस्तान की टीम इस खेल की तकनीकी कलाओं के तहत बेहतर खेली और जीत गई। इसमें कोई 'देश' नहीं परास्त होता बल्कि 'खेल' विजयी होता है। इसी वजह से मैच समाप्त होने के बाद भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली ने पाकिस्तान के कप्तान बाबर को गले लगा कर बधाई दी और उनकी टीम की प्रशंसा की। इसका भारत और पाकिस्तान के बीच विभिन्न मुद्दों पर चल रही खलिश का कोई वास्ता नहीं हो सकता क्योंकि दोनों टीमों का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। परन्तु यह तथ्य भी अपनी जगह पूरी तरह वाजिब है कि किसी भी भारतीय नागरिक का अपने विरोधी पाकिस्तान की टीम पर विजय का जश्न मनाना जायज नहीं है। इससे उसकी वतन परस्ती शक के घेरे में आती है परन्तु यह शक का घेरा इतना बड़ा भी नहीं होना चाहिए कि पूरे कश्मीर के लोग ही इसके दायरे में आ जाये। निश्चित तौर पर जश्न मनाने वाले लोग कहीं न कहीं एेसे भटके हुए लोग हैं जो मजहब को मुल्क से ऊपर मानने की गफलत में पड़े हुए हैं, ऐसे लोगों को हमें सबक इस तरह सिखाना होगा कि वे सच्चे भारतीय बन सकें और प्रतीक रूप में भी पाकिस्तान का समर्थन न कर सकें। यह काम हमें ऐसे युवाओं का भविष्य बिगाड़ कर नहीं बल्कि भारत के संविधान के तहत उन्हें मिले अधिकारों का प्रयोग करते हुए संवार कर देना होगा। संपादकीय :जोखिम भरा है स्कूल खोलनाआइये मिलाएं क्लब की Life Lines सेपटाखे नहीं दीये जलाओशाह की सफल कश्मीर यात्राआर्यन खान मामले का रहस्य ?अफगानिस्तान पर मोदी का एजेंडा !कश्मीर में इससे पहले भी आतंकवाद की तहरीक में शामिल युवाओं को बख्श कर मुख्य राष्ट्रीय धारा में लाया गया है। इसी प्रकार मोहम्मद शमी के धर्म की वजह से उस पर आक्षेप लगाने वाले लोगों को भी समझाना होगा कि जब दो क्रिकेट टीमें आमने-सामने होती हैं तो किसी भी खिलाड़ी का धर्म कोई मायने नहीं रखता बल्कि उसकी टीम मायने रखती है। यह कप्तान विराट कोहली का फैसला था कि शमी अपनी गेंदबाजी के जौहर दिखायें अगर वह उसमे अपेक्षानुरूप सफलता किसी पिच पर नहीं पा पाये तो इसे क्या हम विराट कोहली की गलती कहेंगे। मैच केवल 20 ओवरों का था और इसमें ही पूरा रण कौशल दिखाना था। हम क्यों भूल जाते हैं कि पाकिस्तान की टीम में भी एक समय एक हिन्दू खिलाड़ी हुआ करता था जिसका भारत के खिलाफ मैचों मे बहुत अच्छा प्रदर्शन रहता था। हाल ही में गृहमन्त्री श्री अमित शाह कश्मीर के दौरे पर थे और उन्होंने वहां युवा क्लबों के साथ बैठक करके कश्मीरी युवा पीढ़ी को आश्वस्त किया था कि वे ऊंचे लक्ष्य निर्धारित करें और उन्हें प्राप्त करने के लिए जी-जान लगा दें। भारत में उनके प्रयास उतने ही सफल होंगे जितने कि किसी अन्य राज्य के भारतीय के। अतः यह समय समन्वय से समाधान पाने का है न कि विद्वेष से विभाजन को बल देने का। पाकिस्तान यही तो चाहता है कि कश्मीरियों को उनके मजहब के आइने से देखा जाये और हमारी प्रतिज्ञा है कि हर कश्मीरी पहले भारतीय हैं उसके बाद कुछ और। अतः पाकिस्तान की जीत पर जश्न मनाने वाले कुछ युवाओं ने जिस तरह पुलिस को पछतावे में अपने माफी नामे लिख कर दिये हैं उनका उपयोग उन्हें सुधारने में किया जाना चाहिए और कश्मीर के आंतरिक समावेश को मजबूत बनाया जाना चाहिए जिससे वहां पाकिस्तान परस्त ताकतें हमेशा के लिए 'पस्त' हो सकें।

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