सम्पादकीय

दरकते पहाड़

Subhi
13 Aug 2021 2:52 AM GMT
दरकते पहाड़
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हिमाचल प्रदेश में एक बार फिर पहाड़ टूट कर गिरने की बड़ी घटना ने इस बात की चेतावनी दी है कि इन इलाकों में भूस्खलन आज कितने बड़े खतरे का रूप ले चुका है।

हिमाचल प्रदेश में एक बार फिर पहाड़ टूट कर गिरने की बड़ी घटना ने इस बात की चेतावनी दी है कि इन इलाकों में भूस्खलन आज कितने बड़े खतरे का रूप ले चुका है। हाल के दिनों में पहाड़ ढहने की कई घटनाओं ने स्थानीय से लेकर पर्यटन क्षेत्र के सभी लोगों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। यों इस तरह के हालात के लिए आमतौर पर मानवीय गतिविधियां ही मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं, लेकिन पर्यावरण में जिस तरह के बदलाव आ रहे हैं, उसके मद्देनजर भी प्रकृति का व्यवहार कुछ उग्र होता दिख रहा है। बुधवार को किन्नौर जिले के भावानगर उपमंडल में पहाड़ दरकने और एक बड़ा हिस्सा ढह जाने की वजह से वहां सड़क से गुजरते कई वाहन उसकी चपेट में आ गए। नतीजतन, कई लोगों की जान चली गई। बचाव दलों ने एक दर्जन से ज्यादा लोगों के शव निकाले और कम से कम इतने ही लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। हालांकि पहाड़ का मलबा जितने बड़े दायरे में ढह कर गिरा, उसमें कई और लोगों के दबे होने की आशंका है।

करीब पखवाड़ा भर पहले हिमाचल प्रदेश के ही सिरमौर में भूस्खलन की एक बड़ी और भयावह घटना सामने आई थी, जिसमें एक पहाड़ का बड़ा हिस्सा ढह गया और काफी दूर तक सड़क खाई में दब गई। उस घटना में गनीमत यह रही कि कुछ समय पहले संकेत मिल जाने की वजह से लोग सावधान हो गए और उसमें किसी की जान नहीं गई। लेकन उसके पहले सांगला घाटी में पहाड़ से अचानक बड़े-बड़े पत्थर गिरने लगे और उसकी चपेट में आकर नौ लोगों की मौत हो गई और एक पुल भी टूट गया। उत्तराखंड से भी ऐसी घटनाएं गाहे-बगाहे आती रहती हैं। एक मुख्य वजह यह जरूर है कि मानसून और लगातार बारिश की वजह से मिट्टी की पकड़ कमजोर पड़ती है और बहुत धीरे-धीरे ही, लेकिन पहाड़ दरक कर किसी भी समय ढह जाने की स्थिति में आ जाता है। इसके अलावा, पहाड़ी इलाकों में बादल फटने से आई बाढ़ भी बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा कर गई। सवाल है कि क्या बाहर से बेहद ठोस दिखने वाले पहाड़ इतने कमजोर हो रहे हैं या फिर इनके ढहने की वजहें भी हैं!
दरअसल, ऐसी घटनाएं पहाड़ों में निर्माण क्षेत्र का फैलता दायरा और मानवीय गतिविधियों के बढ़ने के बीच ज्यादा बढ़ी हैं। यह किसी से छिपा नहीं है कि पिछले कई सालों से लगातार पहाड़ी इलाकों में हाइड्रोपावर परियोजनाओं, सुरंगों और सुरक्षा के जरूरी मानकों के बिना सड़कों के निर्माण या विस्फोट के क्रम में पहाड़ों में कैसी कंपन पैदा होती है। इनके चलते न केवल पहाड़ों पर ऊपर टिके पत्थरों का संतुलन बिगड़ता है और वे अचानक खतरनाक तरीके से नीचे गिरने लगते हैं, बल्कि बीच में कहीं दरार भी पड़ जाती है, जो बरसात के दिनों में बड़े हिस्से के ढह जाने की मुख्य वजह बनती है। फिर फैलती आबादी के साथ बनती इमारतें, होटल और दूसरे निर्माण पहाड़ की बनावट के मुताबिक कितने मानकों का खयाल रख पाते हैं, कहा नहीं जा सकता। इसके नुकसान आए दिन इन इलाकों में भूस्खलन और मलबे में दब कर लोगों की मौतों के रूप में सामने आ रहे हैं। इसके अलावा, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में दूसरे राज्यों से केवल पर्यटन के लिए जाने वाले लोगों को शायद ही कभी इस बात का एहसास हो पाता है कि उन्हें पहाड़ और उनकी खूबसूरती को देखना और महसूस करना अच्छा लगता है, लेकिन उनकी गतिविधियां उन इलाकों की पारिस्थितिकी और संतुलन पर क्या असर डालती हैं!


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