सम्पादकीय

अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता कोरोना

Gulabi
3 April 2021 7:16 AM GMT
अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता कोरोना
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एक राष्ट्र एक कर यानि जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) वर्ष 2017 में लागू हुआ था। यह पहली बार है

एक राष्ट्र एक कर यानि जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) वर्ष 2017 में लागू हुआ था। यह पहली बार है जब लगातार 6 माह तक जीएसटी क्लैक्शन एक लाख करोड़ से ऊपर रहा है। किसी एक महीने में सबसे ज्यादा क्लैक्शन का रिकार्ड भी मार्च 2021 के नाम हो गया। सरकारी डाटा के अनुसार मार्च में वस्तु एवं सेवा कर क्लैक्शन 1,23,902 करोड़ रुपए रहा है। एक वर्ष पहले इसी अवधि के मुकाबले इसमें 27 प्रतिशत की ग्रोथ रही है। वस्तुओं के आयात से मिलने वाले जीएसटी में 70 प्रतिशत की ग्रोथ रही, जबकि घरेलू ट्रांजैक्शन से मिलने वाले राजस्व में 17 फीसदी का उछाल आया है।


निर्यात और आयात के मोर्चे पर भी अच्छी खबर है। देश का निर्यात कारोबार मार्च में 58.23 फीसदी उछल कर 34 अरब डालर पर पहुंच गया है, जबकि आयात बढ़कर 53 फीसदी हुआ है। पूरे वित्त वर्ष 2020-21 में निर्यात 7.4 फीसदी घट कर 290.18 अरब डालर रहा। यह भी पहली बार हुआ है कि जब किसी एक महीने में निर्यात 34 अरब डालर रहा। अर्थव्यवस्था के लिए संकेत तो बहुत अच्छे हैं। महामारी के बावजूद देश में आर्थिक गतिविधियां सामान्य हो रही हैं। कोविड-19 की चुनौतियों को देखते हुए यह काफी अच्छी वृद्धि है। लेकिन अभी भी चुनौतियां बरकरार हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था की दशा को लेकर विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और अन्य रेटिंग एजैंसियों ने जो आकलन प्रस्तुत किए हैं उससे स्पष्ट है कि अभी भी आर्थिक संकट से उबरने में समय लगेगा। 2019 में भारत का जीडीपी 4.2 फीसदी रहा था। महामारी के चलते इस वर्ष भी भारत का सकल घरेलू उत्पाद 2019 से भी कम रहने का अनुमान है। बीते साल में पूर्णबंदी के दौरान सभी छोटे-बड़े उद्योगों के बंद रहने से औद्योगिक गतिविधियां जिस तरह से ठप्प हुईं, उससे तो जीडीपी के रसातल में जाने से बच पाना सम्भव नहीं है। ऐसा भारत के साथ ही नहीं बल्कि वैश्विक शक्तियों के साथ भी हुआ। भारत में त्यौहारी मांग भी निकली लेकिन उत्पादन की कमी रही। भारत की अर्थव्यवस्था बहुत विशाल है। देश में महंगाई आसमान छू रही है। आबादी का बड़ा हिस्सा रोजगार विहीन है और उसके पास खर्च करने के लिए पैसे नहीं हैं। बैंकों का संकट बरकरार है। अर्थव्यवस्था को लेकर मिल रहे संकेत और अनुमान गुलाबी तस्वीर पेश कर रहे हैं लेकिन सरकार की प्राथमिकता अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के उपाय लागू करने की है।

कोरोना महामारी के चलते पूरी तरह हताश हो चुके लोगों की आय और जीवन स्तर में बेहतरी के लिए वेतन में बढ़ौतरी जरूरी है। भारत के श्रम बाजार में 90 फीसदी श्रम शक्ति असंगठित या अपंजीकृत क्षेत्र में है। इसका अर्थ यह है कि वे बिना लिखित अनुबंध या बिना किसी स्वास्थ्य और सेवा निवृत्ति के लाभ के काम करते हैं। जहां श्रम पंजीकृत है वहां भी एक ही काम के लिए अस्थाई कामगार को स्थाई कामगार से काफी कम मजदूरी मिलती है। इस असंतुलन की भरपाई करने की जरूरत है। अगर श्रमिकों की जेब में पैसा आएगा तो ही बाजार में खरीददारी करने निकलेंगे।

मध्यम वर्ग की जेब में कुछ पैसों की बचत होगी तो ही वह खरीददारी करेगा। यद्यपि वर्ष 2021 की शुरूआत से ही अर्थव्यवस्था और विकास दर में सुधार दिखाई दे रहा है लेकिन अर्थव्यवस्था को तेजी से गतिशील करने और भारत को दुनिया में सबसे तेज विकास दर वाला देश बनाने के लिए कोरोना के नए बढ़ते हुए संक्रमण के नियंत्रण पर सर्वोच्च प्राथमिकता से ध्यान देना होगा। भारत दुनिया के उन देशों में आगे है, जिन्होंने कोरोना का मुकाबला करने के ​लिए अधिक दवाइयां और वैक्सीन के उत्पादन में नई ऊंचाई प्राप्त की हैं। कोरोना से जूझ रही दुनिया के अनेक देशों को भारत ने कोरोना से बचाव के लिए वैक्सीन और अन्य दवाइयां मुहैया कराई हैं।

दुनिया के अधिकांश आर्थिक और वित्तीय संगठनों ने कोरोना संक्रमण के नियंत्रित हो जाने के दृष्टिगत भारत की विकास दर में तेज वृद्धि की सम्भावना जताई है। ऐसे में कोरोना की दूसरी लहर को देखते हुए तीन बातों पर ध्यान देना होगा। भारत को कोरोना वैक्सीन के निर्माण की वैश्विक महाशक्ति बनाया जाए, अधिक से अधिक लोगों का टीकाकरण हो तथा कोरोना वैक्सीन की बर्बादी रुके। अगर हमने कोरोना की दूसरी लहर को नियंत्रित करने में सफलता प्राप्त कर ली तो देश की अर्थव्यवस्था को पंख लगेंगे लेकिन गर हमने लापरवाही बरती तो फिर शीघ्र उबरना मुश्किल होगा। 2021 में अर्थव्यवस्था की दृष्टि से आगाज तो अच्छा है लेकिन अंजाम हमारे अपने हाथ में है


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