सम्पादकीय

समाज सेवा की आड़ में साजिश, मतांतरण के गंदे धंधे में विदेशी चंदे पर जरूरी है प्रहार

Sandhya Yadav
15 Sep 2021 4:26 AM GMT
समाज सेवा की आड़ में साजिश, मतांतरण के गंदे धंधे में विदेशी चंदे पर जरूरी है प्रहार
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हाल में केंद्रीय गृह मंत्रलय ने करीब छह गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) के उस लाइसेंस को रद कर दिया,

जनता से रिश्ता वेबडेस्क| मनीष पांडेय| हाल में केंद्रीय गृह मंत्रलय ने करीब छह गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) के उस लाइसेंस को रद कर दिया, जिसके तहत वे विदेशी चंदा लेने के अधिकारी थे। इस तरह इस साल ऐसे गैर सरकारी संगठनों की संख्या नौ पहुंच गई है, जिनके विदेशी चंदे पाने वाले लाइसेंस को रद किया गया। इन संगठनों पर विदेश से मिले चंदे का दुरुपयोग करने, आय-व्यय का हिसाब न देने और मतांतरण में लिप्त होने जैसे गंभीर आरोप हैं। बीते कुछ सालों में इन्हीं कारणों से तमाम गैर सरकारी संगठनों के विदेशी चंदे हासिल करने वाले लाइसेंस रद किए गए हैं, लेकिन अभी भी ऐसे हजारों संगठन सक्रिय हैं। ऐसे संगठन प्रकट रूप में तो समाज सेवा का काम करते हैं, लेकिन ज्यादातर मतांतरण का गंदा धंधा चलाते हैं। वे विदेश से मिले पैसे का मनमाना इस्तेमाल करते हैं। जहां कुछ एनजीओ अपनी जेबें भरने का काम करते हैं, वहीं अन्य लोगों को बरगलाकर या फिर उनकी गरीबी और अज्ञानता का लाभ उठाकर उनका मत-मजहब बदलने का काम करते हैं।

वैसे तो मतांतरण का धंधा पूरी दुनिया में चल रहा है, लेकिन अफ्रीका और एशिया के गरीब देश किस्म-किस्म के गैर सरकारी संगठनों के निशाने पर खास तौर से हैं। इनमें से बड़ी संख्या उनकी है, जो दूसरे मत-मजहब वालों को अपने मजहब में लाने को प्रतिबद्ध हैं। इनका मानना है कि लोगों का भला तभी होगा, जब वे मजहब विशेष के अनुयायी बनेंगे। जाहिर है कि ऐसे ज्यादातर संगठन ईसाइयत या इस्लाम से जुड़े हैं, क्योंकि इन्हीं दोनों मजहब के धर्म प्रचारक इस मानसिकता से लैस हैं कि केवल उनका मार्ग ही असली या फिर एकमात्र ऐसा मार्ग है, जिस पर चलकर ईश्वर को पाया जा सकता है या फिर जन्नत को हासिल किया जा सकता है। ये संगठन-समूह इस सनक से ग्रस्त हैं कि सारी दुनिया को अपने मजहब का अनुयायी बनाना है। इन संगठन-समूहों को कई देशों की सरकारें भी संरक्षण देने के साथ आर्थिक सहायता भी देती हैं। यदि कोई देश ऐसे संगठन-समूहों के खिलाफ कार्रवाई करता है तो वहां धार्मिक स्वतंत्रता के खतरे में होने का झूठा प्रचार किया जाता है। इस काम में तथाकथित मानवाधिकार संगठन भी भागीदार बनते हैं।

भारत में मतांतरण में लिप्त संगठनों का काम इसलिए आसान बना हुआ है, क्योंकि भारतीय संविधान सभी मतावलंबियों को अपने मत-मजहब का प्रचार करने का अधिकार देता है। इस अधिकार में कोई समस्या नहीं। समस्या इसमें है कि इसका जमकर दुरुपयोग किया जा रहा है। इस दुरुपयोग का उदाहरण है पूवरेत्तर भारत के साथ-साथ देश के आदिवासी बहुल इलाके। इन इलाकों में बड़ी संख्या में दलितों और आदिवासियों का मतांतरण वैसे ही गैर सरकारी संगठनों की ओर से किया जा चुका है, जैसे कुछ संगठनों पर रह-रहकर पाबंदी लगाने का सिलसिला कायम है। मतांतरण में लिप्त संगठन कितने दुस्साहसी हैं, इसका एक प्रमाण है कुछ माह पहले उत्तर प्रदेश पुलिस की ओर से उस इस्लामिक दावा सेंटर का भंडाफोड़, जो मूक-बधिर छात्रों को मतांतरित करने में लगा हुआ था। ऐसे ही तमाम संगठन ईसाई मिशनरियों की शक्ल में सक्रिय हैं। ये इतने ढीठ हैं कि लोगों को बरगलाने के लिए हिंदू देवी-देवताओं की आड़ लेने में भी संकोच नहीं करते। ऐसे संगठन अब सारे देश में सक्रिय हैं। उनकी अवांछित सक्रियता से सरकारें अच्छी तरह अवगत हैं, लेकिन वे कुछ करने से बचने में ही अपनी भलाई समझती हैं। यह खतरनाक प्रवृत्ति है, क्योंकि मतांतरण अभियान कुल मिलाकर राष्ट्रांतरण का काम कर रहा है। जब कभी मतांतरण में लिप्त तत्वों के खिलाफ कार्रवाई की बात उठती है तो खुद को सेक्युलर-लिबरल कहने वाले सक्रिय हो उठते हैं। ऐसे लोग तब भी सक्रिय हो जाते हैं, जब कोई संगठन घर वापसी की बात करता है। जिन सेक्युलर-लिबरल तत्वों को छल-छद्म से चल रहे मतांतरण अभियानों से कोई समस्या नहीं होती, वे घर वापसी जैसे कार्यक्रमों पर आपत्ति जताते हैं। यही नहीं, वे दलितों और आदिवासियों को हिंदू न मानने की वकालत करने वालों का साथ देते हैं। यह ऐसे तत्वों की सक्रियता का प्रमाण है कि अब मीडिया के एक हिस्से में ऐसा विमर्श दिखाई देने लगा है कि किस क्षेत्र में कितने हिंदू, मुसलमान और दलित एवं आदिवासी हैं। यह और कुछ नहीं दलितों और आदिवासियों को हिंदू समाज से अलग बताने का कुचक्र है।

मतांतरण में लिप्त तत्व इसलिए बेलगाम हैं, क्योंकि अल्पसंख्यकों को अपने धार्मिक एवं शिक्षा संस्थानों को अपने हिसाब से संचालित करने का अधिकार है। इस अधिकार का भी बेजा इस्तेमाल हो रहा है। यह अधिकार बहुसंख्यकों को प्राप्त नहीं है और इसी कारण यह मांग उठती रहती है कि मंदिरों को सरकारी कब्जे से मुक्त किया जाए। ज्ञात हो कि देश के ज्यादातर बड़े मंदिरों का प्रबंधन सरकारों की ओर से किया जाता है। उनके चंदे और चढ़ावे का पैसा सरकारी कोष में जाता है। इसका कहीं कोई औचित्य नहीं कि अपने धार्मिक स्थलों और शिक्षा संस्थानों के प्रबंधन का जैसा अधिकार अल्पसंख्यकों को हासिल हो, वैसा बहुसंख्यकों को न हो, लेकिन यह अंधेरगर्दी जारी है। इसके बाद भी यह कहा जाता है कि भारतीय संविधान की निगाह में सभी बराबर हैं। यह निरा झूठ है। सच यह है कि हमारा संविधान समानता के सिद्धांत की घोर अनदेखी करता है। पता नहीं क्यों संसद, सरकार और सुप्रीम कोर्ट को यह विसंगति दिखाई नहीं देती। यह विसंगति शिक्षा अधिकार कानून में भी नत्थी हो गई है। माना जाता है कि इसी कारण हिंदू समाज का अंग माने जाने वाले जैन समाज ने खुद को अल्पसंख्यक घोषित किए जाने की पहल की। एक तरह से भारतीय संविधान ही भारतीय समाज के विघटन-विखंडन को बढ़ावा दे रहा है।


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