सम्पादकीय

चीन से मुकाबला : अफगानिस्तान पर भारत की पहल

Gulabi
17 Nov 2021 10:29 AM IST
चीन से मुकाबला : अफगानिस्तान पर भारत की पहल
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चीन से मुकाबला
मध्य एशिया में चीन का मुकाबला करने की अपनी दीर्घकालीन महत्वाकांक्षा के अलावा अफगानिस्तान में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए भारत को धैर्यपूर्ण कूटनीतिक नीति को अपनाने की सख्त आवश्यकता है, जो अफगानिस्तान पर क्षेत्रीय सुरक्षा वार्ता की सफलता के बाद व्यावहारिक रूप ले सकती है, जिसमें भारत समेत आठ देशों ने हिस्सा लिया था।
दिल्ली घोषणा भारत की भावी नीति के लिए बहुत महत्व रखती है, क्योंकि यह दोहा वार्ता के विपरीत भारत को हमेशा अफगानिस्तान पर प्रासंगिक वार्ता के दायरे में रखेगी, जब अफगानी उथल-पुथल और हिंसा के युद्धरत गुटों ने पहली बार 23 सितंबर, 2020 को औपचारिक रूप से आमने-सामने बैठकर उस संघर्ष को खत्म करने के लिए बातचीत शुरू की, जिसे अब दुनिया के सबसे घातक संघर्ष के रूप में माना जाता है।
लेकिन इसकी मुख्य पहचान अमेरिका पर दबाव बनाकर भारत को अलग-थलग करने में पाकिस्तान की सफलता थी, जिसका उतना लाभ नहीं मिला, जितनी अपेक्षा थी, क्योंकि तालिबान ने दोहा समझौते का उल्लंघन करके अमेरिका को धोखा दिया। विश्लेषकों का मानना है कि आठों देश काबुल में समावेशी सरकार की आवश्यकता पर जोर देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे, जो सितंबर में दुशांबे में हुई शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक से एक कदम आगे होगा, जिसमें आतंकवाद, आतंकवाद के वित्त पोषण और कट्टरपंथ के खिलाफ तल्ख भाषा का इस्तेमाल किया गया था, जिससे राष्ट्रीय सुलह को बढ़ावा मिला।
विश्लेषकों का यह भी मानना है कि भारत सरकार द्वारा तीसरी क्षेत्रीय सुरक्षा वार्ता के सफल आयोजन से, जिसमें रूस, ईरान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उजबेकिस्तान के सुरक्षा प्रमुखों ने भाग लिया, पाकिस्तान परेशान हुआ होगा। उसने पड़ोसी देशों के सुरक्षा प्रमुखों की इस महत्वपूर्ण बैठक का हिस्सा बनने के निमंत्रण को ठुकरा दिया था, इसलिए उसने तुरंत पाकिस्तान, चीन, रूस और अमेरिका को शामिल करते हुए 'द ट्रोइका प्लस' की बैठक बुलाई थी, जिसने तालिबान से अफगानिस्तान में एक समावेशी और प्रतिनिधि सरकार बनाने के लिए कदम उठाने का आह्वान किया है, जो नए शासन के करीब रहने की जिज्ञासा को दर्शाता है। यह आह्वान तालिबान के रुख के विपरीत किया गया है।
इसने अफगानी समाज के सभी क्षेत्रों में महिलाओं और लड़कियों को भाग लेने के लिए समान अवसर प्रदान करने की आवश्यकता पर भी बल दिया, जो उनके साथ तालिबान के क्रूर व्यवहार की मौजूदा सच्चाई की तुलना में वास्तविकता से बहुत दूर है। चीन ने भी नई दिल्ली में आयोजित सुरक्षा वार्ता में शामिल नहीं होने का एक लचर बहाना दिया था। चीन का यह बहाना ऐसे समय में आया, जब पूर्वी लद्दाख में चल रहे सैन्य गतिरोध को लेकर चीन-भारत द्विपक्षीय संबंध तनावपूर्ण हैं।
चीन हमेशा पाकिस्तान को आगे रखना चाहता है, हालांकि वह अपनी आर्थिक तंगी के कारण अफगानिस्तान की मदद करने की स्थिति में नहीं है और लगातार अपने हितैषी 'चीन' पर निर्भर है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की नकारात्मकता को अमेरिका द्वारा कूटनीति के बुरे उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि भारत द्वारा की गई पहल की सराहना की जानी चाहिए और बाधाएं खड़ी करना अफगानिस्तान के लोगों के कल्याण के लिए प्रतिकूल साबित हो सकता है, जो महामारी का भी सामना कर रहे हैं।
वार्ता के बाद सात देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा परिषदों के प्रमुखों ने सामूहिक रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। प्रधानमंत्री ने उन प्रतिभागियों की प्रशंसा की, जिन्होंने महामारी से उत्पन्न चुनौतियों के बावजूद इसे संभव बनाया। प्रधानमंत्री मोदी ने अफगानिस्तान के संदर्भ में चार पहलुओं पर जोर दिया, जिन पर इस क्षेत्र के देशों को ध्यान देने की आवश्यकता होगी, जिनमें एक समावेशी सरकार की आवश्यकता, अफगान क्षेत्र का आतंकी समूहों द्वारा इस्तेमाल किए जाने के प्रति शून्य-सहिष्णुता का रुख, अफगानिस्तान से मादक पदार्थों एवं हथियारों की तस्करी रोकने की रणनीति और अफगानिस्तान में तेजी से मानवीय संकट को संबोधित करना शामिल था। मोदी का बयान उन लोगों के लिए स्पष्ट संदेश है, जो अफगानिस्तान के लोगों का समर्थन करने और उनके साथ खड़े होने के भारत के प्रयासों को विफल करना चाहते हैं।
भारत ने पिछले 20 वर्षों के दौरान शिक्षा, स्वास्थ्य आदि जैसे विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों में पहले ही 2,300 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश किया है, और इस देश के लोगों की सद्भावना अर्जित की है, जो सबसे भीषण भूख के संकट का सामना कर रहे हैं। भारत ने एक महीने पहले ही पाकिस्तान से भूमि मार्ग से खाद्यान्न के परिवहन की सुविधा देने का अनुरोध किया था, लेकिन उसने मना कर दिया था।
लेकिन अब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने तालिबान से कहा है कि पाकिस्तान अफगान लोगों के अनुरोध पर सहानुभूति पूर्वक विचार करेगा, जिससे वहां के लोग भारत से गेहूं प्राप्त कर सकेंगे। इससे कूटनीतिक रूप से भारत को मदद मिलेगी और पाकिस्तान के बुरे इरादे उजागर होंगे। चीन, तुर्की जैसे कुछ देशों ने पहले ही अफगानिस्तान के भूखे लोगों को भोजन वितरित करना शुरू कर दिया है और पाकिस्तान अब काबुल तक पहुंचने के लिए सड़क मार्ग से ट्रकों की आवाजाही पर काम कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान और चीन द्वारा वार्ता में भाग लेने से इन्कार करना भारत के प्रति उनकी शत्रुता को दर्शाता है, जिसने दुनिया को दिखाया है कि मध्य एशिया में कुछ देशों की दुश्मनी के बावजूद भारत अब भी अफगानिस्तान के मामलों में धैर्य के साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
शीर्ष अधिकारी स्वीकार करते हैं कि एनएसए अजित डोभाल के कुशल प्रबंधन ने भी सुरक्षा बैठक की सफलता में योगदान दिया, जिसे कूटनीति में एक मील का पत्थर माना जा रहा है, क्योंकि भारत की भूमिका अफगानिस्तान में बहुत महत्वपूर्ण है, जिसे पाकिस्तान और चीन द्वारा कमजोर किया जा रहा है। अंत में, यही कहा जा सकता है कि भारत को तालिबान शासन के प्रति तीखे मतभेदों के बावजूद अफगानिस्तान में अपनी स्पष्ट भूमिका को परिभाषित करने की आवश्यकता है, जो अब भी अंतरराष्ट्रीय मान्यता पाने के लिए जूझ रहा है।
अमर उजाला
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