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नाबालिग मांओं और बच्चों की नीति पर सवाल
लंबे समय से संवेदनाओं के धरातल पर बलात्कार की शिकार बनी नाबालिग बच्चियों के गर्भ को बचाने के सवाल पर बहस जारी है। सवाल यह है कि क्या दुर्व्यवहार का दंश झेलने वाली बच्ची के स्वास्थ्य और भविष्य को जोखिम में डालना उचित है! हाल ही में उच्चतम न्यायालय द्वारा एक नाबालिग बलात्कार पीड़िता की तीस सप्ताह की गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति पर आया निर्णय समग्र समाज के लिए विचारणीय है। इस मामले में न्यायालय ने न केवल समय के साथ कानून में बदलाव लाने की बात कही, बल्कि यह भी स्पष्ट कहा कि जब गर्भधारण बलात्कार के कारण हुआ हो, तो समय सीमा नहीं होनी चाहिए। ऐसे में अगर गर्भपात की अनुमति नहीं दी गई, तो पीड़िता को जीवनभर मानसिक आघात झेलना पड़ेगा।
अनचाहा मातृत्व और नाबालिग पीड़िता का अधिकार
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने गर्भपात की अनुमति देते हुए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान को निर्देश दिया कि वह पीड़िता के माता-पिता को इस मुद्दे पर उचित परामर्श दे। अगर मां को स्थायी शारीरिक हानि नहीं होती है, तो गर्भपात किया जाना चाहिए।
इस विषय में अंतिम निर्णय पीड़िता और उसके परिवार का होना चाहिए। अदालत ने केंद्र सरकार से भी कहा कि कानून में संशोधन कर बलात्कार पीड़िताओं को बीस सप्ताह से अधिक समय के बाद भी गर्भपात की अनुमति देने पर विचार किया जाए। देखा जाए तो शोषण और सामाजिक आक्षेपों से उपजी भावनाओं और उलझनों को समझने वाली इस टिप्पणी का एक मजबूत व्यावहारिक धरातल है।
गौरतलब है कि एम्स द्वारा उच्चतम न्यायालय की ओर से पंद्रह साल की लड़की को तीस सप्ताह की गर्भावस्था को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने की अनुमति दिए जाने के आदेश को रद्द करने के लिए यह याचिका दाखिल की गई थी। मगर पीठ ने कहा कि ‘यह एक उपचारात्मक याचिका है। किसी पर अनचाहा गर्भ नहीं थोपा जा सकता। सोचिए कि वह एक बच्ची है, जिसे इस समय पढ़ाई करनी चाहिए, लेकिन हम उसे मां बनाना चाहते हैं।
उसने जो पीड़ा और अपमान सहा है, उसकी कल्पना कीजिए।’ निश्चित रूप से मातृत्व एक बड़ी जिम्मेदारी और मन से जिया जाने वाला भाव है। समझना कठिन नहीं कि किसी नाबालिग की अवांछित गर्भावस्था को जबरन जारी रखने के मामले इस भाव से कोसों दूर होते हैं। बलात्कार के कारण हुई अनचाही गर्भावस्था जीवन के हर पक्ष पर दीर्घकालिक प्रतिकूल प्रभाव डालती है।
मानसिक-शारीरिक स्वास्थ्य ही नहीं शिक्षा और सामाजिक-पारिवारिक जीवन भी बुरी तरह प्रभावित होता है। इसके बावजूद गर्भावस्था को कायम रखना सीधे-सीधे नागरिक अधिकारों का हनन है। ऐसे में शीर्ष अदालत ने भी कहा कि प्रजनन संबंधी स्वायत्तता, निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित मौलिक अधिकार है… ऐसे मामलों में राहत नहीं दी गई, तो अवैध तथा असुरक्षित गर्भपात केंद्रों की ओर रुख करने की समस्या बढ़ सकती है।
मानसिक आघात से सामाजिक उपेक्षा तक
बलात्कार जैसे जघन्य आपराधिक घटना की बदौलत हिस्से आए ऐसे हालात नाबालिग लड़कियों के भीतर अवसाद, चिंता और आत्महत्या की मन:स्थिति तक बना देते हैं। बहुत सारी पीड़ित महिलाओं को मनोवैज्ञानिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। पढ़Þाई छूट जाती है।
अपनों के व्यवहार में उनके प्रति सहजता का भाव नहीं रहता। सामाजिक परिवेश में भी उपेक्षा और उलाहने ही मिलते हैं। भविष्य हर मोर्चे पर असुरक्षित प्रतीत होता है। ज्ञात हो कि पिछले साल बंबई हाईकोर्ट ने भी पंद्रह वर्षीया बलात्कार पीड़िता को गर्भ हटाने की अनुमति दी थी। इस मामले में पीड़िता ने कहा था कि वह भावनात्मक, आर्थिक और सामाजिक रूप से बच्चे की देखभाल नहीं कर पाएगी।
असल में बलात्कार की घटनाओं का परिणाम गर्भाधान के रूप में सामने आना पूरी दुनिया में चिंता का विषय बना हुआ है। अलग-अलग देशों में इससे जुड़े कानून अलग-अलग हैं। ऐसी घटनाओं से मिली मानसिक-शारीरिक प्रताड़ना और अनचाही जिम्मेदारी का बोझ झेलने का दर्द सभी जगह एक-सा ही है। समझना आवश्यक है कि बलात्कार की शिकार नाबालिगों को गर्भावस्था के लक्षणों की कोई समझ नहीं होती।
अधिकतर बच्चियों को इस बारे में पता चलने या स्वजनों को बताने में देरी हो जाती है। कुछ समय पहले शिमला में बलात्कार की शिकार एक नाबालिग पीड़िता द्वारा अपनी माता से पेट में दर्द की शिकायत करने पर गर्भवती होने का पता चला। कम उम्र में शारीरिक शोषण करने वालों में पचास फीसद आरोपी बच्चों के परिचित और परिवार के भरोसे वाले लोग होते हैं। नाबालिग बच्चियां डर की वजह से भी इनकी शिकायत नहीं कर पातीं। उत्पीड़न को लेकर अभिभावकों को कुछ नहीं बता पातीं।
कानून से ज्यादा जरूरी सामाजिक संवेदनशीलता
ऐसे मामलों में कानून के साथ-साथ समाज की सोच में भी बदलाव आवश्यक है। उत्पीड़न की शिकार नाबालिग के लिए यह स्थिति बिना कोई अपराध किए दंड मिलने जैसी होती है। ऐसे में न केवल परिवार का सहयोग और संबल जरूरी है, बल्कि कानूनी बदलाव भी वक्त का तकाजा है। आमतौर पर पहले से ही शोषण का दुख झेल रहीं बच्चियां बिल्कुल अकेली पड़ जाती हैं।
पीड़ित बच्चियों के भविष्य पर अब भी अधूरा कानून
बलात्कार के परिणामस्वरूप जन्म लेने वाले बच्चों के लिए फिलहाल कोई कानून नहीं है। कुछ साल पहले इलाहबाद हाईकोर्ट ने कहा था कि नाबालिग से बलात्कार के बाद जन्मे बच्चे का दोषी पिता की संपत्ति पर अधिकार होगा। दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा भी ऐसे बच्चे को मां से अलग मुआवजा देने का आदेश दिया जा चुका है। बंबई हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा था कि पीड़िताओं को मुआवजा देना पर्याप्त नहीं, उनसे जन्मे बच्चों के लिए भी नीति बने। विचारणीय है कि यह स्थिति खुद नाबालिग मां या उसके परिवार के लिए ही सहज नहीं होती।
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