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सम्पादकीय

मिलकर करें कोरोना महामारी से मुकाबला: प्रशासन भीड़ पर सख्ती बरते और करे तालाबंदी, लॉकडाउन स्थायी हल नहीं

Gulabi
4 May 2021 5:50 AM GMT
मिलकर करें कोरोना महामारी से मुकाबला: प्रशासन भीड़ पर सख्ती बरते और करे तालाबंदी, लॉकडाउन स्थायी हल नहीं
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कोरोना की दूसरी लहर ने भारत को किंकर्तव्यविमूढ़ कर दिया है

ऋतु सारस्वत: कोरोना की दूसरी लहर ने भारत को किंकर्तव्यविमूढ़ कर दिया है। चारों ओर हाहाकार मचा हुआ है, परंतु कोई भी इस प्रश्न का उत्तर गंभीरता से ढूंढने का प्रयास नहीं कर रहा है कि कुछ समय पूर्व जो स्थिति नियंत्रण में थी, वह यकायक अनियंत्रित कैसे हो गई? इसमें संदेह नहीं कि एक वर्ग महामारी की वर्तमान विकरालता का जिम्मेदार सरकारी व्यवस्थाओं को ठहरा रहा है और यह कोई नई बात नहीं है। दुनिया में जब महामारी का कोई भी रूप मानवीय विध्वंस करता है तो चारों तरफ आरोप-प्रत्यारोप का खेल शुरू हो जाता है। यह प्रवृत्ति सदियों से चली आ रही है। सफलता का श्रेय लेने के लिए सभी तत्पर रहते हैं और असफलताओं की जिम्मेदारी लेने का साहस किसी में नहीं होता। हम भूल जाते हैं कि समाज का एक अभिन्न भाग होने के कारण सफलताओं और विफलताओं में हमारी सामूहिक भूमिका होती है। सरकारें क्या कर सकती हैं और सरकार की क्या खामियां हैं? आज चारों ओर विमर्श का विषय यही है। ऐसा होना भी चाहिए। लोकतंत्रात्मक व्यवस्था की सबसे बड़ी खूबी ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, परंतु कहीं कोई यह स्वीकारने को तैयार नहीं है कि व्यवस्थागत कमियों से इतर कुछ हमारी भी जिम्मेदारियां हैं, जिसे निभाने में हमसे भारी चूक हुई है।


कोरोना की पहली लहर: मानवीय जीवन की रक्षा के लिए लगा लॉकडाउन, अर्थव्यवस्थाएं चरमरा गई थी

दुनिया में जब कोविड-19 की पहली लहर ने दस्तक दी थी तो कोई समझ ही नहीं पाया था कि यह सब क्यों और किन कारणों से हो रहा? महामारी के अचानक हमले के लिए कोई तैयार नहीं था। नतीजतन सरकारों ने कठोर लॉकडाउन सहित कई कदम उठाए। उससे अर्थव्यवस्थाएं चरमरा गईं, परंतु ज्यादा जरूरी था मानवीय जीवन की रक्षा। दुनिया भर में जिन सरकारों ने लॉकडाउन में देरी की वहां अधिक जानें गईं, परंतु पिछले साल और वर्तमान में महामारी के स्वरूप में जो अंतर है वह व्यवस्थागत से कहीं अधिक हमारी जागरूकता की विफलताओं का है, क्योंकि अभी तक हम सब जान चुके हैं कि कोविड-19 क्या है, उससे लड़ने और बचाव के तरीकों से भी लगभग सभी परिचित हो चुके हैं।
घोर लापरवाही: मास्क नहीं पहिनना, शारीरिक दूरी का नजरअंदाज करना, साफ-सफाई की अवहेलना

हमारी विफलता हमारी घोर लापरवाही है। ऐसे लोगों की संख्या बहुतायत में है, जो यह मानकर चल रहे हैं कि उन्हें कोरोना नहीं हो सकता इसलिए न तो उन्हें वैक्सीन की जरूरत है, न मास्क की और न ही शारीरिक दूरी की। ऐसे लोगों की तादाद भी खूब है, जो वैक्सीन लगवाने के बाद स्वयं को कोरोना से पूरी तरह सुरक्षित मान बैठे। प्रश्न यह उठता है कि क्या बिना मास्क के प्रयोग, साफ-सफाई की अवहेलना और शारीरिक दूरी को नजरअंदाज करते हुए सिर्फ और सिर्फ स्वास्थ्य संसाधनों पर निर्भर रहा जाए। ऐसा विकासशील देशों में ही नहीं, विकसित देशों में भी संभव नहीं है। अमेरिका स्थित लोयोला विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की एक टीम ने 1918-19 में स्पेनिश फ्लू के अध्ययन में पाया कि उस महामारी से दुनिया की करीब एक तिहाई आबादी प्रभावित हुई थी। उस दौरान भी अनिवार्य रूप से मास्क पहनना, मरीजों को पृथक रखना और साफ-सफाई जैसे उपाय बीमारी को नियंत्रित करने में बहुत प्रभावी साबित हुए थे। अमेरिका के सैनफ्रांसिस्को, सेंट लुइस, मिलवाको और कंसास में उन शहरों के मुकाबले मृत्यु दर में 30 से 50 प्रतिशत की कमी रही, जहां एहतियाती कदम बाद में उठाए गए।
प्रशासन भीड़ पर सख्ती बरते और कोरोना को रोकने के लिए करे तालाबंदी, लॉकडाउन स्थायी हल नहीं

आत्मानुशासन और स्वचेतना से इतर हम प्रशासन से यह अपेक्षा करते हैं कि वह भीड़ पर सख्ती बरते और कोरोना को रोकने के लिए तालाबंदी करे। क्या यह न्यायोचित होगा, क्योंकि बीते साल तालाबंदी ने तमाम लोगों का रोजगार छीन लिया था। लॉकडाउन स्थायी हल नहीं हो सकता। कोरोना खत्म होने में कितना समय लगेगा, वैज्ञानिक इस पर अभी कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हैं। इसलिए कोरोना के प्रति सावधानी बरतना और उस मार्ग को अपनाना जरूरी हो जाता है, जहां मानव जीवन की रक्षा के साथ-साथ जीविकोपार्जन के साधनों पर भी कुठाराघात न हो।
अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाए बिना महामारी को फैलने से रोकने में सफलता पाई

'लैजरेटो इन ड्यूब्रोन्विक : द बिगनिंग ऑफ द क्वारंटाइन रेगुलेशन इन यूरोप' नामक एक शोध में वर्तमान परिस्थितियों का हल दिखाई देता है। 14वीं शताब्दी में यूरोप में फैले प्लेग को रोकने के लिए तत्कालीन रगुजा (आधुनिक ड्यूब्रोन्विक) की महापरिषद ने महामारी को फैलने से रोकने के लिए 1377 में एक कानून बनाया, जिसके मुताबिक रगुजा आने वाले हर जहाज और व्यापारियों के काफिले को 30 दिनों तक आइसोलेशन में रहना होता था। ड्यूब्रोन्विक ने इस तरह अपनी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाए बिना महामारी को फैलने से रोकने में सफलता पाई।

जहाजों और व्यापार पर रोक लगा देने से जीवन और अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई

दूसरी तरफ उसी समय वेनिस में सभी जहाजों और व्यापार पर रोक लगा दी गई। इससे वहां का जीवन और अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई। स्वाभाविक रूप से इसका प्रत्यक्ष और नकारात्मक प्रभाव वहां के नागरिकों पर पड़ा।

लॉकडाउन के बगैर स्वयं को अनुशासित करके कोरोना महामारी से लड़ने की तैयारी करनी होगी

कोरोना की मौजूदा रफ्तार को देखते हुए देश में इस समय सबसे अधिक जरूरत घरेलू स्तर पर संवाद को मजबूत बनाने की है। साथ ही ऐसे बहुआयामी पक्षों को सामने लाने की भी है, जिससे इस महामारी का मुकाबला सकारात्मकता को बनाए रखते हुए किया जा सके। वर्तमान परिदृश्य में 'रिटोरिकल अरीना थ्योरी' कारगर सिद्ध हो सकती है। यह संवाद का वह तरीका है, जिसके तहत अलग-अलग क्षेत्र के लोग एवं संकट से निपटने में जुड़े तमाम विभाग अपने-अपने तरीके से जनता से ऐसे संवाद करते हैं कि उनके बीच आपसी समन्वय बना रहे। लॉकडाउन के बगैर स्वयं को अनुशासित करके महामारी से लड़ने की तैयारी हमें करनी ही होगी, वरना आने वाले समय में लोग दूसरी अघोषित महामारी अवसाद के शिकार हो जाएंगे, जिसका मुकाबला करना किसी भी व्यवस्था के लिए असंभव होगा।
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