सम्पादकीय

उद्घाटनों की आचार संहिता

Gulabi
2 Nov 2021 5:33 AM GMT
उद्घाटनों की आचार संहिता
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इमारतें जब तमगों की तरह उगने लगं, तो इनकी स्थापना के आदर्श राजनीतिक अचकन पर ही दिखेंगे

दिव्याहिमाचल.

इमारतें जब तमगों की तरह उगने लगं, तो इनकी स्थापना के आदर्श राजनीतिक अचकन पर ही दिखेंगे। हिमाचल हाई कोर्ट में आए एक मामले पर टिप्पणी करते हुए माननीय अदालत ने पंचायत स्तर पर उद्घाटनों की फेहरिस्त पर नजर दौड़ाई है। छोटी-छोटी परियोजनाओं को उद्घाटनों के जंजाल से मुक्त करने की जरूरत पर बल देते हुए अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि कम खर्च की लागत से हुए निर्माण का उपयोग सुनिश्चित करने के लिए इन्हें फिजूलखर्ची से जनता के समक्ष न पेश किया जाए। यानी उपयोग और उपयोगिता के लिए यह मायने नहीं रखता कि परियोजना का सार्वजनिक स्तर पर उद्घाटन ही किया जाए। अदालत ने सरकार को एक नीति के तहत यह स्पष्ट करने को कहा है कि किस लागत तक इमारतों व परियोजनाओं के उद्घाटन किए जा सकते हैं या इनके लिए प्रधान एवं उपप्रधान किस सीमा तक अधिकृत होंगे भी या नहीं। यह फैसला घुमारवीं विकास खंड अधिकारी के फैसले को चुनौती देती एक याचिका पर आया, जिसमें संबंधित अधिकारी ने स्थानीय निकाय चुनावों से पूर्व तमाम पंचायत प्रधानों एवं उपप्रधानों के नाम से सजी उद्घाटन पट्टिकाएं हटाने को कहा था।

उद्घाटन समारोहों की फेहरिस्त अब निचले स्तर तक पहुंच गई है जहां प्रधान भी सार्वजनिक धन का प्रयोग करते हुए किसी राजा की तरह अपनी प्रजा को उद्घाटन पट्टिकाओं से संबोधित करते हैं। विडंबना यह है कि उद्घाटन समारोहों की मूंछें पूरी परियोजना को ही फिजूलखर्ची का अड्डा बना देती हैं। जब से राजनीति इवेंट बनती जा रही है, हर बजट की पपड़ी केवल तामझाम में उतरने लगी है। आश्चर्य तब होता है जब हैंडपंप के उद्घाटन तक के लिए विधायक खुद को रेखांकित करते हैं। यह मसला उद्घाटन समारोह तक ही नहीं, बल्कि भूमि पूजन और शिलान्यास पट्टिकाओं की हसरत का भी है। पूरे प्रदेश की छाती पर सजी ऐसी अनेक अप्रासंगिक शिलान्यास पट्टिकाएं देखी जा सकती हैं, जिनके नाम पर एक भी ईंट नहीं लगी, लेकिन प्रचार के लिए व्यय जरूर हो गया। ऐसे भी अवसर आए हैं जहां एक ही इमारत या परियोजना के अनेक बार शिलान्यास हो गए, लेकिन इनका उद्देश्य पूरा नहीं हुआ। उदाहरण के लिए जल शक्ति विभाग की कई परियोजनाएं वक्त के साथ खत्म हो गईं, लेकिन वहां शिलान्यास व उद्घाटन पट्टिकाओं की जद में याददाश्त जिंदा है। बेशक उद्घाटन पट्टिकाओं के जरिए इमारत और परियोजनाओं की आवश्यक सूचनाओं का आवरण हट सकता है, लेकिन ऐसा अकसर होता नहीं। कमोबेश हर इमारत का डिजाइन एक सरीखा होने लगा है और इस पर भी श्रेय की परिपाटी तैयार की जाती है। विडंबना यह भी कि अतीत में जनसहयोग से उभरा विकास आज याद नहीं किया जाता और न ही इनके अतिक्रमण से बचा जा रहा है। हर पंचायत प्रधान को अपने नाम सहित यह पट्टिका लगाने की अनुमति मिले कि उसके कार्यकाल में स्वच्छता अभियान के तहत क्या हुआ।


कितने अतिक्रमण हटाए, पर्यावरण सुरक्षा में क्या किया और इसका भी उल्लेख हो कि प्राकृतिक जल संसाधन बचाने में क्या हुआ। सार्वजनिक निर्माण के इश्तिहार लगाने की परंपरा में राजनीति नित संकीर्ण होती जा रही है। इमारतों-परियोजनाओं के उपयोग से कहीं अधिक इनके प्रोपेगंडा में व्यक्तिवाद खड़ा किया जा रहा है। पहले श्रमदान से जनता गांव के भीतर खुद ही खेल मैदान, श्मशानघाट, जंजघर, जल आपूर्ति तथा सिंचाई व्यवस्था की स्थापना करती थी। आज हर साल जल शक्ति विभाग करोड़ों खर्च करके प्राकृतिक जलस्रोतों की सफाई करवाने में जाया करता है। गांव में नवनिर्माण के खेल में व्यस्त राजनीति कब पर्दे के पीछे अतिक्रमण की मशीनरी में तबदील हो जाती है, किसी को मालूम नहीं। बहरहाल पंचायत परिदृश्य के उद्घाटनों में ही फिजूलखर्ची नहीं, बल्कि बडे़ स्तर पर इसी तरह के आयोजन अब राजनीतिक और सामुदायिक विद्वेष के कारक बन रहे हैं। विडंबना यह भी है कि सत्ता पलटते ही निर्माणाधीन भवनों-परियोजनाओं को बर्फ में लगा दिया जाता है या उनके उद्घाटन न होने से उपयोग रोक दिया जाता है। पिछले लगभग चार सालों से शिलान्यास की बाट जोह रहा धर्मशाला जिलाधीश परिसर का एक टायलट इसी तरह की विडंबना में लाखों की बर्बादी का सबूत बनकर जनभावनाओं को ठेंगा दिखा रहा है। इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि जनसुविधाओं से जुड़े भवन भी उद्घाटनों के ताले में तब तक बंद रहेंगे, जब तक ये राजनीतिक लाभ न दें।


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