सम्पादकीय

लड़कों के साथ भी चाइल्‍ड सेक्‍सुअल अब्‍यूज कम नहीं होता, लेकिन हम उसके बारे में कभी बात नहीं करते

Nidhi Singh
13 Oct 2021 7:17 AM GMT
लड़कों के साथ भी चाइल्‍ड सेक्‍सुअल अब्‍यूज कम नहीं होता, लेकिन हम उसके बारे में कभी बात नहीं करते
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मेल और फीमेल चाइल्‍ड में जेंडर भेदभाव उस तरह से नहीं होता, जैसाकि एक वयस्‍क मर्द और औरत के बीच होता है.

जनता से रिश्ता वेबडेस्क। एनसीआरबी का साल 2020 के आंकड़ों को बाहर से देखने पर जो तस्‍वीर दिखाई दे रही है, वो तो यही कहती है कि पिछले साल चाइल्‍ड सेक्‍सुअल अब्‍यूज का शिकार होने वालों में 99 फीसदी लड़कियां हैं. 2020 में पॉक्‍सो (प्रोटेक्‍शन ऑफ चिल्‍ड्रेन अगेन्‍स्‍ट सेक्‍सुअल ऑफेंस) के तहत बाल यौन शोषण के कुल 28,327 केस दर्ज हुए, जिनमें से 28,058 केस ऐसे थे, जिनमें यौन हिंसा का शिकार होने वाली लड़की थी. लड़के सिर्फ 269 थे.

लेकिन जो ये आंकड़ा कह रहा है, क्‍या वह हकीकत है. आंकड़ों की मानें तो सिर्फ वयस्‍क मर्द ही नहीं, एक छोटा बच्‍चा भी, अगर उसका जेंडर मेल है तो वह इस समाज में एक लड़की के मुकाबले ज्‍यादा सुरक्षित है. लेकिन क्‍या सचमुच ऐसा है? क्‍या सचमुच बचपन में होने वाले यौन शोषण की घटनाओं में जेंडर गैप इतना ज्‍यादा है या उन मामलों में पुलिस और न्‍यायालय तक पहुंचने के रास्‍ते में कोई गैप है. सच
आखिर है क्‍या ?
रजत पेशे से पत्रकार हैं और एक बड़े अंग्रेजी अखबार में संपादक हैं. पिछले 19 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय रजत जब सिर्फ 5 साल के थे तो उनके सगे मामा ने कई बार उनके साथ वो सबकुछ किया, जो पॉक्‍सो की परिभाषा के तहत यौन अपराध की श्रेणी में आता है. घर में बड़ों की अनुपस्थिति का फायदा उठाकर उसके यौन अंगों को छूना और अपने अंग छुआने की कोशिश करना उन सारी हरकतों में शामिल था. रजत के साथ ऐसा कई बार हुआ. जब तक कि उनके पिता का ट्रांसफर नहीं हो गया और वो परिवार के साथ दूसरे शहर रहने नहीं चला गया. उसके बाद भी 4-5 साल में वो मामा कभी घर आता तो रजत की तबीयत खराब हो जाती. वो तबीयत खराब होने का बहाना नहीं कर रहा होता था. उसे सचमुच बुखार चढ़ जाता. मां-पिता इसे सामान्‍य बुखार समझते थे. वो कभी उस आदमी के घर आने और रजत के बीमार पड़ने की दोनों घटनाओं को आपस में जोड़ नहीं पाए.
"मर्दों के वॉयलेंट होने की एक वजह ये भी है कि एक बच्‍चे के रूप में
परिवार और समाज उनके साथ एक खास तरह का वॉयलेंस
कर रहा होता है. लड़कों को रोने या कमजोर होने
के लिए शर्मिंदा किया जाता है.
– सुधीर कक्‍कड़
आज रजत की उम्र 43 साल है और आज तक उसने अपने माता-पिता या किसी दोस्‍त तक से उस घटना का कभी जिक्र नहीं किया. अपनी पत्‍नी को उसने जरूर बताया, लेकिन वो भी बहुत साल बाद. रजत की पत्‍नी जो एक फेमिनिस्‍ट एनजीओ में जेंडर सेंसटाइजेशन के मुद्दे पर काम करती हैं, के इतने लंबे साथ के बाद बचपन की उस घटना को लेकर रजत का शर्म और संकोच दोनों टूटा है.
रजत कहते हैं, "बहुत सारे लड़कों के साथ भी बचपन में यौन शोषण की घटनाएं होती हैं, लेकिन लड़के इसके बारे में कभी बात नहीं करते. अपनी पत्‍नी के साथ इतने सालों में मुझे समझ में आया कि शुरुआती डर और संकोच से निकलने के बाद औरतें फिर भी इस बारे में बात कर पाती हैं. अपनी कहानी सुना पाती हैं, लेकिन 43 साल में मैंने कभी अपने किसी दोस्‍त से अपने मामा के बारे में कोई बात नहीं की. न ही किसी और दोस्‍त ने कभी ये बताया कि बचपन में उसके साथ भी कोई अब्‍यूज हुआ था."
अमेरिका के एक नॉन प्रॉफिट ऑर्गेनाइजेशन RAINN (रेप, अब्‍यूज एंड इंसेस्‍ट नेशनल नेटवर्क) का एक सर्वे कहता है कि एक मेल और फीमेल चाइल्‍ड में जेंडर भेदभाव उस तरह से नहीं होता, जैसाकि एक वयस्‍क मर्द और औरत के बीच होता है. छोटे बच्‍चे, चाहे वह लड़का हो या लड़की, दोनों ही एक बराबर वलनरेबल होते हैं. लड़कों के साथ भी चाइल्‍ड सेक्‍सुअल अब्‍यूज की घटनाएं बहुत बड़े पैमाने पर होती हैं, लेकिन वह उतनी रिपोर्ट नहीं होतीं. उसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि लड़के इस बारे में कभी बात नहीं करते. उनके भीतर की शर्म और गिल्‍ट लड़कियों से कहीं ज्‍यादा होता है क्‍योंकि एक मर्द के रूप में उन पर ताकतवर दिखने का बोझ लड़कियों से कहीं ज्‍यादा होता है.
"जिस तरह समाज स्त्रियों से एक खास तरह के व्‍यवहार की अपेक्षा करता है, वैसे ही मर्दों से भी हमेशा ताकतवर होने, शासन करने और नियंत्रक की भूमिका में होने की उम्‍मीद की जाती है. जिस पर बचपन से ही ये जिम्‍मेदारी थोप दी गई हो कि वह रक्षक है, उसका काम अपने से कमजोर लड़कियों की रक्षा करना है, उसके लिए यह स्‍वीकार करना कितना मुश्किल होगा कि वह भी कमजोर और वलनरेबल है. उसे भी मदद की जरूरत है. उसे भी जरूरत है कि कोई उसको प्रोटेक्‍ट करे."
– पैट्रीजिया रिकार्दी , प्रोफेसर डिपार्टमेंट ऑफ साइकिएट्री, मर्सर यूनिवर्सिटी, जॉर्जिया
मर्सर यूनिवर्सिटी, जॉर्जिया में डिपार्टमेंट ऑफ साइकिएट्री में प्रोफेसर पैट्रीजिया रिकार्दी का एक पेपर कुछ समय पहले एनसीबीआई (नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्‍नोलॉजी इंफॉर्मेशन) की मैगजीन में छपा. उसकी हेडलाइन थी- Male Rape: The Silent Victim and the Gender of the Listener.
इस पेपर में प्रो. रिकार्दी बताती हैं कि बचपन में यौन शोषण का शिकार होने वाले लड़के किस तरह की भावनात्‍मक, सामाजिक और निजी चुनौतियों का सामना करते हैं और ये चुनौतियां उनके मानसिक और शारीरिक स्‍वास्‍थ्‍य को किस तरह प्रभावित करती हैं. जिस तरह समाज स्त्रियों से एक खास तरह के व्‍यवहार की अपेक्षा करता है, वैसे ही मर्दों से भी हमेशा ताकतवर होने, शासन करने और नियंत्रक की भूमिका में होने की उम्‍मीद की जाती है. जिस पर बचपन से ही ये जिम्‍मेदारी थोप दी गई हो कि वह रक्षक है, उसका काम अपने से कमजोर लड़कियों की रक्षा करना है, उसके लिए यह स्‍वीकार करना कितना मुश्किल होगा कि वह भी कमजोर और वलनरेबल है. उसे भी मदद की जरूरत है. उसे भी जरूरत है कि कोई उसको प्रोटेक्‍ट करे.
अभी कुछ दिन पहले ही हमारे समय की प्रखर फेमिनिस्‍ट एक्टिविस्‍ट कमला भसीन का निधन हुआ. कुछ साल पहले मुझे दिए एक लंबे रिकॉर्डेड इंटरव्‍यू में कमला भसीन ने कहा था, "मर्दों का अपने मन, अपने इमोशन के साथ ही कोई कनेक्‍शन नहीं होता. वो सिर्फ औरतों की ही भावनाओं के प्रति गैरजिम्‍मेदार और असंवेदनशील नहीं होते, वो अपनी भावनाओं के प्रति भी उतने ही कठोर होते हैं. मर्द ताकतवर होते हैं, मर्द रोते नहीं हैं, मर्द कमजोर नहीं हो सकते, ये बातें बचपन से उनके दिमाग में इतनी ठूस-ठूसकर भर दी जाती हैं कि ये खुद उनकी मनुष्‍यता को भी खा जाती हैं. जिसने इंसान का अपनी भावनाओं के साथ तार न जुड़े, उसका दूसरों की भावनाओं के साथ कैसे तार जुड़ेगा."
"वो सिर्फ औरतों की ही भावनाओं के प्रति गैरजिम्‍मेदार और असंवेदनशील नहीं होते, वो अपनी भावनाओं के प्रति भी उतने ही कठोर होते हैं."
– कमला भसीन
रजत अपने स्‍कूल के दिनों को याद करते हुए कहते हैं, "मैं पटना के एक कॉन्‍वेंट बॉयज स्‍कूल में पढ़ता था. मुझे याद है, क्‍लास में अगर कोई थोड़ा कमजोर, काइंड या वलनरेबल बच्‍चा होता तो बाकी लड़के उसका भी बहुत मजाक उड़ाते थे. बॉयज स्‍कूलों में यह चीज बहुत कॉमन है कि कुछ माचो टाइप लड़के कमजोर लड़कों को सेक्‍सुअली अब्‍यूज करने की कोशिश करते हैं. अगर किसी लड़के के बारे में ऐसी कोई बात पता चले तो बाकी लड़कों के बीच वो मजाक का पात्र बन जाता था. लड़के उसकी हंसी उड़ाते. उसे 'चीकू बॉय' कहकर चिढ़ाते. कमजोर होने से ज्‍यादा शर्म की बात एक लड़के के लिए कुछ और नहीं हो सकती थी."
रजत कहते हैं, "न लड़कियों और न ही किसी और के प्रति दयालु होना, नर्मी का बरताव करना हमें कभी नहीं सिखाया गया. मर्द होने का मतलब ही यही था कि हम हमेशा ऐंठ में ही रहेंगे. अब तो ये स्थितियां काफी बदल गईं हैं क्‍योंकि मैं अपने बेटे को देखता हूं. लेकिन मेरे बचपन में लड़कियों के प्रति सॉफ्ट होना और नर्मी का बरताव करना भी कमजोरी मानी जाती थी. ऐेसे लड़कों का स्‍कूल में बहुत मजाक उड़ता था."
भारत के जाने-माने साइकोलॉजिस्‍ट सुधीर कक्‍कड़ कहते हैं, "मर्दों के वॉयलेंट होने की एक वजह ये भी है कि एक बच्‍चे के रूप में परिवार और समाज उनके साथ एक खास तरह का वॉयलेंस कर रहा होता है. लड़कों को रोने या कमजोर होने के लिए शर्मिंदा किया जाता है. एक ओर उनकी भावनाओं की कद्र नहीं होती, वहीं दूसरी ओर परिवार और समाज उन्‍हें बेलगाम अधिकार दे देता है. जाहिर है, संतुलन तो
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