सम्पादकीय

कैप्टन अमरिंदर बनाम नवजोत सिद्धु : क्या पंजाब कांग्रेस में 'सिलेक्टेड बनाम इलेक्टेड' की लड़ाई है?

Tara Tandi
19 July 2021 10:41 AM GMT
कैप्टन अमरिंदर बनाम नवजोत सिद्धु : क्या पंजाब कांग्रेस में सिलेक्टेड बनाम इलेक्टेड की लड़ाई है?
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कांग्रेस हाई कमान ने नवजोत सिंह सिद्धू को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष सिलेक्ट कर लिया है.

जनता से रिश्ता वेबडेस्क | मनोज सिंह| कांग्रेस हाई कमान ने नवजोत सिंह सिद्धू को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष सिलेक्ट कर लिया है. इसी के साथ 'इलेक्टेड' मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और 'सिलेक्टेड' अध्यक्ष के बीच की दुश्मनी एक नए दौर में एन्ट्री ले चुकी है. इसके बाद, अब पंजाब में विधान सभा चुनाव से ठीक पहले, पार्टी और सरकार के बीच का तालमेल बिल्कुल ही खत्म होने की कगार पर है. कहते हैं कि पंजाबी कौम एक जज्बाती कौम है, और सिद्धू तो अपने जज्बातों के लिए ही मशहूर हैं. ऐसे में आपसी रंजिशें और गुटबाजी का सबसे बड़ा खेल चुनाव से पहले टिकट बंटवारे को लेकर होगा. तो ऐसा लगता है कि – कांग्रेस आला कमान ने अभी से अपने लिए एक नई मुसीबत हाथ में ले ली है.

अमरिंद और सिद्धू गुट के बीच विधान सभा चुनाव में टिकट बंटवारे का झगड़ा निपटा पाना किसी के बस का नहीं होगा. अमरिंदर सिंह यही झगड़ा टालने के लिए सिद्धू को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के खिलाफ थे. लेकिन अब अमरिंदर और सिद्धू दोनों ही अपने-अपने वफादारों को विधान सभा चुनावों में टिकट दिलवाने के लिए पानीपत की लड़ाई में उतरेंगे. इस लड़ाई की पहली तस्वीर तब दिखेगी जब सिद्धू अपना चार्ज संभालने पार्टी कार्यालय पहुंचेगे.

'सिलेक्टर्स' राजी तो क्या करेगा 'कैप्टन' पाजी!

नवजोत सिंह सिद्धू को पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष बनाए जाने के आखिरी वक्त तक, अमरिंदर सिंह अपनी नाराजगी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी तक पहुंचाते रहे. मगर आला कमान की नजर में नवजोत ही पंजाब में कांग्रेस का भविष्य हैं. इसके पीछे अमरिंदर सिंह भी काफी हद तक वजह हैं. मगर वो अलग चर्चा है. वैसे थोड़ा सा विश्लेषण करें तो – 'सिलेक्टेड बनाम इलेक्टेड' की यह स्थिति काफ़ी हद तक सिद्धू के परम मित्र पाकिस्तान के वज़ीर-ए-आज़म इमरान ख़ान की स्टोरी से मेल खाती है. इमरान ख़ान और सिद्धू की गाढ़ी दोस्ती पहले से ही अमरिंदर सिंह को खटकती रही है. मगर सिद्धू ने कभी इसकी परवाह नहीं की. वो इमरान ख़ान के शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तान गए. और फिर करतारपुर कॉरिडॉर के उद्घाटन समारोह में भी वो इमरान के मेहमान बने. ना सिर्फ मेहमान बने बल्कि उन्होंने इमरान ख़ान की तारीफ़ में उतने ही कसीदे पढ़े, जितने कसीदे वो पहले नरेन्द्र मोदी और फिर राहुल गांधी की तारीफ़ में पढ़ चुके हैं. कैप्टन ने खुलकर सिद्धू के पाकिस्तान जाने पर ऐतराज जताया – मगर सिद्धू भी क्रिकेट के खिलाड़ी रहे हैं. सिद्धू बखूबी जानते हैं कि कप्तान से ज्यादा ताकतवर सिलेक्टर्स होते हैं. और अगर 'चीफ सिलेक्टर' आप के साथ है तो कप्तान चाहे जितना भी जोर लगा ले, आप टीम में अवश्य होंगे. सिद्धू टीम में आ भी गए मगर कप्तान ने उन्हें 'प्लेइंग इलेवन' में शामिल करने से इंकार कर दिया. फिर ज़ोर लगा तो उन्हें 12 वें खिलाड़ी की तरह ऐसी पोजिशन दे दी जिससे उन्हें खेलने का मौका ही ना मिले. सिद्धू अपनी इस नाकद्री से तैश में आ गए और उन्होंने तय कर लिया कि अब तो उन्हें कप्तान को ही 'रिप्लेस' करना है. पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष बनकर सिद्धू अपना पहला कदम बढ़ा चुके हैं. बाकी का काम टिकट बंटवारे में अपने खिलाड़ियों को आगे कर के वो कर ही लेंगे. इस वक्त सिद्धू के पास वफादार विधायकों की संख्या नहीं है. वो उम्मीद करते हैं कि चुनावों के बाद उनके पास वफादार विधायकों की बड़ी संख्या होगी. अगर सरकार नहीं भी बनी तो वो कम से कम विधायक दल के नेता तो बन ही जाएंगे. ऐसा हुआ तो आगे के लिए वो निर्विवाद रूप से पंजाब में कांग्रेस का मुख्यमंत्री चेहरा होंगे. इस दौरान कैप्टन अमरिंदर सिंह की राजनीतिक जमीन वो खिसकाने में कामयाब हो जाएंगे. और अगर सरकार बन गई तो, और भी बल्ले बल्ले.

यूपी वाली कहावत पंजाब में!

इन सब के बावजूद नवजोत सिंह सिद्धू क्या भविष्य में कांग्रेस के गले की हड्डी बन सकते हैं? इस सवाल की सबसे बड़ी वजह है उनका अपना स्वभाव. भोजपुरी में एक कहावत है – 'जहां गइनी डाढ़ो रानी, उहां पड़ल पाथर पानी'. पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में यह कहावत उन लोगों के लिए कही जाती है जो जहां भी जाते वहां क्लेश खड़ा कर देते हैं. नवजोत सिंह सिद्धू जब से कांग्रेस में शामिल हुए हैं, पंजाब कांग्रेस में क्लेश और सियापा ही पड़ा हुआ है. उधर पाकिस्तान में इमरान ख़ान के लिए कहा जाता है कि वो कभी किसी को साथ लेकर नहीं चल सकते. और कभी कभी वो भी अपने आला कमान को भी परेशानी में डाल देते हैं. डिप्लोमेसी का सी भी उनकी डिक्शनरी में नहीं है. तो इधर उनके यार सिद्धू पाजी के पास भी धैर्य, डिप्लोमेसी कम और जज्बात ज्यादा हैं. अब कांग्रेस आला कमान ने उन्हें एक बड़ा ओहदा दिया है, मगर क्या वो ये समझते हैं कि कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी बड़ी है. पार्टी मैनेज करना और पार्टी के भीतर विरोधियों को अपने साथ लेकर चलना सिद्धू के स्वभाव के तो विपरीत ही लगता है. डर बस इसी बात का है कि कहीं सिलेक्टर्स भी उनसे जल्द ही परेशान ना हो जाएं. वैसे उधर, बॉर्डर पार की टीम में तो यही चर्चा है कि 'सिलेक्टर्स' अपने कप्तान खिलाड़ी से पीछा छुड़ाने के उपाय तलाश रहे हैं. मगर यहां अपने साइड वाले पंजाब में 'पिक्चर अभी बाकी है'. अभी तो यारों – बस ठोंको ताली!

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