सम्पादकीय

वेस्ट यूपी में गन्ने का मुद्दा क्या बीजेपी को डाल सकता है मुश्किल में, कृषि बिल वापसी का कितना है यहां असर

Gulabi
25 Nov 2021 5:26 PM GMT
वेस्ट यूपी में गन्ने का मुद्दा क्या बीजेपी को डाल सकता है मुश्किल में, कृषि बिल वापसी का कितना है यहां असर
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वेस्ट यूपी में गन्ने का मुद्दा क्या बीजेपी को डाल सकता है मुश्किल में
संयम श्रीवास्तव। बीते कई महीनों से किसान नए कृषि कानूनों को लेकर आंदोलन कर रहे थे, सियासी गलियारे में खबर थी कि इस आंदोलन की वजह से भारतीय जनता पार्टी को आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों में नुकसान उठाना पड़ सकता है, हालांकि बीजेपी ने चुनाव से पहले मास्टर स्ट्रोक खेलते हुए इन नए कृषि कानूनों को वापस लेने का फैसला कर लिया. राजनीतिक पंडितों का मानना है कि ऐसा बीजेपी गवर्नमेंट ने किसानों को अपनी तरफ करने और नाराजगी दूर करने के लिए किया है. आने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में पश्चिमी यूपी के किसानों को सरकार नाराज नहीं रखना चाहती थी. दरअसल किसान आंदोलन में उत्तर प्रदेश के इस हिस्से से ज्यादातर किसानों की भागीदारी है.
हो सकता है कि ये सही हो पर शायद भारतीय जनता पार्टी को अंदाजा नहीं है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में केवल कृषि कानून ही मुद्दा नहीं हैं, बल्कि गन्ना भी एक बड़ा मुद्दा है. क्षेत्र के किसान गन्ने की कम खरीद कीमत, भुगतान में देरी और डीएपी यानि उर्वरक की कमी से जूझ रहे हैं. जानकारों का मानना है कि पश्चिम उत्तर प्रदेश की लगभग 100 विधानसभा सीटों पर गन्ने का मुद्दा प्रभावी रहेगा. दरअसल क्षेत्र के गन्ना किसान राज्य सरकार द्वारा तय की गई खरीद कीमत यानि एसएपी को लेकर खुश नहीं हैं. हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने गन्ना के खरीद मूल्य में प्रति क्विंटल 25 रुपए की वृद्धि की थी, लेकिन गन्ना किसानों का कहना है कि यह वृद्धि भी बेहद कम है क्योंकि 25 रुपए बढ़ाने के बाद भी फसल की खरीद कीमत 340 रुपए प्रति क्विंटल ही होती है. जबकि उनकी मांग है इसे 425 रुपए प्रति क्विंटल करने की है. इसके साथ ही गन्ना किसानों की मांग है कि हर साल सरकार को न्यूनतम 5 रुपए प्रति क्विंटल की दर से खरीद कीमत को बढ़ाना चाहिए.
45 लाख गन्ना किसानों की नाराजगी भारी पड़ सकती है
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक सूबे में करीब 45 लाख किसान और उनके परिवार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से गन्ने की खेती से जुड़े हैं. जबकि अगर देश में गन्ना किसानों की तादाद देखें तो यह 5 करोड़ के आसपास जाती है. आंकड़ों के मुताबिक देश में करीब 5 करोड़ परिवार और लगभग 5 लाख मजदूर गन्ने की खेती से प्रत्यक्ष तौर पर जुड़े हैं. आने वाले कुछ महीनों में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव हैं, ऐसे में अगर बीजेपी यह सोच कर आगे बढ़ती है कि सिर्फ कृषि कानूनों को वापस ले लेने से किसानों की नाराजगी का मसला हल हो जाएगा तो शायद वह भ्रम में है. क्योंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा है और अगर समय रहते इसे हल नहीं किया गया तो आने वाले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है.
पश्चिमी यूपी में चुनाव गन्ने के मुद्दे पर हारे और जीते जाते हैं
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनाव अक्सर गन्ने के मुद्दे पर जीते और हारे जाते हैं. 2012 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव की जीत हो या फिर 2017 में योगी आदित्यनाथ की जीत, हर विधानसभा चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. पश्चिम उत्तर प्रदेश में फिलहाल डीजल की बढ़ी कीमतें, बिजली की ऊंची दरें और न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग के साथ-साथ गन्ने का बकाया भी बड़ा मुद्दा है. और इन्हीं मुद्दों पर यहां चुनाव लड़ जाते हैं. क्योंकि यह क्षेत्र मुख्य रूप से जाट और मुसलमानों का क्षेत्र कहा जाता है और यहां की ज्यादातर आबादी किसानी ही करती है.
2017 के विधानसभा चुनाव में जाट समुदाय पूरी तरह से बीजेपी के साथ खड़ा था. यही वजह थी कि पश्चिमी यूपी के 14 जिलों के 71 विधानसभा सीटों में से बीजेपी को 2017 में 51 सीटें मिली थीं. लेकिन इस बार किसान आंदोलन और गन्ने के मुद्दे को लेकर जाट समुदाय बीजेपी से बिफरा हुआ है. ऊपर से समाजवादी पार्टी और आरएलडी का गठबंधन जो फिलहाल आधिकारिक रूप में नहीं है लेकिन हो सकता है, बीजेपी के लिए एक और मुसीबत खड़ी करता दिख रहा है.
क्या बीजेपी ने गन्ना किसानों के लिए कुछ नहीं किया
अब सवाल उठता है कि क्या बीते 4 सालों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों के लिए कुछ नहीं किया? गांव कनेक्शन में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव, चीनी उद्योग एवं गन्ना विकास संजय आर भूसरेड्डी कहते हैं कि मौजूदा सरकार ने बीते 4 सालों में गन्ना किसानों के लिए और ग्रामीण क्षेत्र में लघु एवं कुटीर उद्योगों के विकास और स्थानीय रोजगार के मद्देनजर कई बड़े काम किए हैं.
उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए उत्तर प्रदेश राज्य चीनी निगम के अधीन बंद चीनी मिलों को फिर से शुरू करने का निर्णय लिया गया है. इसके साथ ही मुंडेरवा एवं पिपराइच में 5,000 टीसीडी छमता की नई चीनी मिलें और सल्फरलेस शुगर उत्पादन का संयंत्र स्थापित किया गया है. इसके साथ ही 27 मेगावॉट का नया कोजन प्लांट भी लगाया गया है. वहीं निगम क्षेत्र की मोहिद्दीनपुर चीनी मिल की पेराई क्षमता को 2500 से बढ़ाकर 3500 टीसीडी कर दिया गया है और यहां 15 मेगावाट का कोजन लगाया गया है. जिस पर लगभग 165 करोड़ रुपए का निवेश किया गया है.
मेरठ में करीब 30 सालों से गन्ना किसानों की समस्याओं को उठा रहे पत्रकार प्रेमदेव शर्मा कहते हैं कि सरकार पह दोहरा दबाव है जिसके चलते गन्ना की कीमतें स्थिर हैं. पहला चीनी मिल का एक बहुत बड़ा हिस्सा कोला कंपनियों और चॉकलेट कंपनियों को जाता है, ये कंपनियां नहीं चाहती हैं कि चीनी का दाम बढ़े. दूसरे चीनी मिलों की लॉबी भी उन्हें ऐसा करने से रोकती हैं. अगर गन्ने की कीमतें बढ़ती हैं तो इन सबका नुकसान होगा. प्रेमदेव शर्मा पूछते हैं कि इधर कुछ वर्षों में चीनी कंपनियां एथेनॉल और सैनेटाइजर बनाकर भी कमाई कर रही हैं फिर भी इन्हें गन्ने के दाम बढ़ने में क्यों दिक्कत होती है?
हालांकि चुनावों में माहौल के बारे में उनका कहना है कि तीनों कृषि बिलों की वापसी के बाद बीजेपी को लेकर किसानों में नाराजगी कम हो रही है. वेस्ट यूपी में बन रहे हाइवे और हाईस्पीड रेल के चलते लोगों को लगता है इस सरकार में खूब काम हो रहा है. दूसरे गन्ना किसानों के लिए जितना भुगतान इस सरकार में हुआ है पहले कभी नहीं हुआ है. इन सब बातों के चलते बीजेपी को खारिज करना लोगों के लिए मुश्किल हो रहा है.
खाप पंचायतें भी तय करती हैं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दिशा
जाटलैंड के नाम से मशहूर उत्तर प्रदेश का पश्चिमी इलाका चुनावों में किसकी तरफ रहेगा, कुछ हद तक इसकी रूपरेखा खाप पंचायतें भी तय करती हैं. 2017 के विधानसभा चुनाव में यह खाप पंचायतें भारतीय जनता पार्टी की तरफ थीं. लेकिन किसान आंदोलन के समय यह खाप पंचायतें पूरी तरह से आंदोलन के समर्थन में किसानों के साथ खड़ी थीं. हालांकि अब जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद घोषणा करके नए कृषि कानूनों को वापस ले लिया है तो खाप पंचायतों में भी दो धड़े दिखाई दे रहे हैं. एक धड़ा है भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत का और दूसरा धड़ा है गठवाला खाप के चौधरी राजेंद्र सिंह का. गठवाला खाप और 24 खाप के नेताओं ने एक तरफ जहां किसानों से घर वापसी की बात करनी शुरू कर दी है, वहीं दूसरी तरफ राकेश टिकैत जैसे किसान नेता अभी भी बीजेपी के खिलाफ अपना कड़ा रुख अख्तियार किए हुए हैं.
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