सम्पादकीय

शराब के विरुद्ध अभियान: आंदोलन चलाने वालों के बीच जगी एक उम्मीद

Rounak Dey
8 Feb 2022 7:23 AM IST
शराब के विरुद्ध अभियान: आंदोलन चलाने वालों के बीच जगी एक उम्मीद
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शराब की प्रत्यक्ष-परोक्ष भूमिका होती है। ऐसे में, शराब-विरोधी अभियान को मजबूती से बढ़ाना जरूरी है।

शराब के बारे में बुरी खबर तो सभी जानते हैं। वह यह कि देश और दुनिया, दोनों स्तरों पर शराब का इस्तेमाल बढ़ रहा है। पर तथ्य यह भी है कि विश्व स्तर पर शराब छोड़ने वालों का आंकड़ा भी करोड़ों में है। शराब के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर पर रिपोर्ट तैयार करते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस बारे में आंकड़े उपलब्ध किए हैं कि विभिन्न देशों में ऐसे कितने लोग हैं, जो पहले शराब पीते थे, पर जिन्होंने पिछले 12 महीनों में शराब नहीं पी। आम तौर पर केवल पीने वाले या न पीने वाले के ही आंकड़े मिलते हैं, पर इस नई श्रेणी के आंकड़े मिलना खासकर उनके लिए बहुत उपयोगी है, जो नशे के दुश्चक्र से बाहर निकलना चाहते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की इस स्टेट्स रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2016 में ऐसे 68 करोड़ लोग पाए गए, जो पहले तो शराब पीते थे, पर जिन्होंने पिछले एक साल से शराब नहीं पी थी। शराब के बारे में एक मिथक यह है कि जिसे एक बार इसकी लत लग जाती है, वे इसे नहीं छोड़ पाते। लेकिन यह आंकड़ा इस मिथक को ध्वस्त करता है और शराब के खिलाफ आंदोलन चलाने वालों में उम्मीद पैदा करता है। हालांकि इनमें से कुछ लोग ऐसे भी रहे होंगे, जिन्होंने अपने स्वास्थ्य को तबाह कर लेने के बाद डॉक्टर की लगातार सलाहों पर ही शराब छोड़ी होगी। इनमें से बहुतेरे लोग ऐसे भी होंगे, जिन्होंने अपनी इच्छा शक्ति, परिवार व मित्रों के समर्थन, किसी की प्रेरणा से व डॉक्टरी सहायता के बल पर शराब छोड़ी होगी। इससे शराब पीने वाले अनेक लोगों को शराब छोड़ने की प्रेरणा मिलेगी कि जब करोड़ों लोग ऐसा कर सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं कर सकता?
एक अन्य जानकारी भी महत्त्वपूर्ण है कि जहां विश्व स्तर पर शराब की खपत बढ़ रही है, वहीं कुछ देशों ने शराब की प्रति व्यक्ति उपभोग में कमी करने में सफलता पाई है। इसमें संभवतः सबसे अधिक कमी हाल के समय में रूस ने प्राप्त की। हालांकि आज भी रूस में शराब की खपत अनेक देशों से अधिक है, पर पिछले वर्षों में वहां शराब की खपत जिस भीषण स्तर पर पहुंच गई थी, उसमें जरूर उल्लेखनीय कमी आई है। यह भी एक आशाजनक खबर है कि जिन देशों में उल्लेखनीय प्रयास हुए हैं, वहां शराब की खपत में कमी लाने में सफलता मिली है। जिन भी देशों में ऐसा हुआ है, वहां सरकारी प्रयासों के अलावा महिलाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। इस तरह के जन-अभियानों को जब कई स्तरों पर सरकार व प्रशासन का सहयोग प्राप्त होता है, तब उनकी ताकत और बढ़ जाती है। ऐसे अभियानों की सफलता के लिए जरूरी शर्त यह है कि इन्हें निरंतरता से चलाया जाए। वर्ष में एक दिन शराब-विरोधी दिवस घोषित किया जाए व इसके आसपास तीन-चार दिन विशेष नशा-विरोधी प्रचार किया जाए, तो ऐसे प्रयासों का बहुत सीमित असर होता है।
दूसरी ओर, व्यापक प्रयास यदि वर्षों तक निरंतरता से चलते रहें, तो इसका बहुत ठोस व महत्वपूर्ण असर होता है। अतः हमें ऐसे कदम उठाने होंगे, जिनसे ऐसे प्रयास निरंतरता से चलते रहें। जिस तरह पंचायतों में शिक्षा समिति होती है, वैसे स्थायी तौर पर नशा-विरोधी समिति का गठन भी सभी पंचायतों में हो सकता है, जिसमें मुख्य स्थान महिलाओं को दिया जाना चाहिए। इस तरह के कानून बनाने चाहिए कि यदि 50 प्रतिशत से ऊपर गांववासी किसी गांव में शराब का ठेका न लगाने के लिए स्वीकृति प्रदान कर दें, तो उसे स्वीकार कर लिया जाएगा। इस तरह पर्याप्त हस्ताक्षर एकत्र कर गांववासी शराब के ठेकों से मुक्त हो सकेंगे व महिलाओं द्वारा भी शांतिपूर्ण विरोध दर्ज करवाने का एक अपेक्षाकृत आसान रास्ता उपलब्ध हो जाएगा।
भारत में स्थिति यह है कि सड़क दुर्घटनाओं, लीवर की बीमारी व कैंसर के जरिये शराब 2.6 लाख जीवन लील रही है, पर इसके अतिरिक्त दर्जनों अन्य बीमारियों व हिंसक वारदातों में शराब की भूमिका है। यदि इन सबकी गिनती की जाए, तो शराब से देश में इससे दोगुने से अधिक मौतें होती हैं यानी पांच लाख से भी अधिक। महिलाओं पर हिंसा व यौन-हिंसा की अधिकांश वारदातों में भी शराब की प्रत्यक्ष-परोक्ष भूमिका होती है। ऐसे में, शराब-विरोधी अभियान को मजबूती से बढ़ाना जरूरी है।

सोर्स: अमर उजाला

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