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नीतीश कुमार सच्चा समाजवादी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस सर्टिफिकेट ने बिहार की राजनीति के साथ ही समाजवादी आंदोलन को लेकर एक नयी बहस की शुरूआत कर दी है
Faisal Anurag
नीतीश कुमार सच्चा समाजवादी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस सर्टिफिकेट ने बिहार की राजनीति के साथ ही समाजवादी आंदोलन को लेकर एक नयी बहस की शुरूआत कर दी है. बिहार की राजनीति में समाजवादियों की अहमियत रही है. जब कांग्रेस का एकछत्र राज था, तब भी बिहार के समाजवादियों के आंदोलनों की गूंज का असर था. बिहार में कांग्रेस की राजनीति पर भी इसका असर था. लेकिन प्रधानमंत्री ने पांच राज्यों चुनाव के ठीक पहले नीतीश कुमार को सच्चा समाजवादी तब कहा, जब बिहार की एनडीए सरकार में ही सबकुछ अच्छा नहीं चल रहा है. प्रधानमंत्री राजनीतिक परिवारवाद पर भी निशाना साधते रहे हैं. खास की विपक्षी दलों के लिए उनका यह एक प्रमुख जुमला है. नीतीश कुमार को भी "सच्चा समाजवादी" इसी अर्थ में बताया है कि उन्होंने अपने परिवार के किसी सदस्य को राजनीतिक विरासत का हिस्सेदार नहीं बनाया है.
कभी नीतीश कुमार के सहयोगी रहे राष्ट्रीय जनता दल के नेता शिवानंद तिवारी ने इस सर्टिफिकेट को लेकर दिलचस्प टिप्पणी की है. 'विडंबना देखिए. जिन मोदी जी ने 2015 के विधानसभा चुनाव के समय नीतीश जी पर भ्रष्टाचार और घोटालों का आरोप लगाया था, वे ही आज उनको सच्चा समाजवादी का प्रमाणपत्र दे रहे हैं! यह भी देखिए. जिन नीतीश कुमार ने कभी कहा था कि जिस आदमी का नाम लेने से करोड़ों अल्पसंख्यकों के मन में भय समा जाता है. उसके साथ मैं हाथ मिलाऊँगा! वहीं नीतीश जी मोदी जी से सच्चे समाजवादी का प्रमाणपत्र उनकी कृपा मानकर ग्रहण कर रहे हैं.' जदयू ने इसका प्रतिवाद किया है, लेकिन बिहार बीजेपी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस बयान को क्षेत्रीय राजनीति के मजबूत स्वरों को एक तरह से कमजोर करने के बयान के रूप में भी चिन्हित किया जा रहा है. एक राजनैतिक विचारक ने ठीक ही कहा है कि कांग्रेस जो अपने जीवन काल के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है, बावजूद इसके प्रधानमंत्री के लिए वह दु:स्वप्न से कम नहीं है. इसका एक बड़ा कारण तो यही है कि कांग्रेस की विचारधारा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आरएसएस की विचारधारा के बीच न केवल अंतर है, बल्कि वे एक दूसरे के खिलाफ खड़े होते रहे हैं. लेकिन इसी तरह की बात क्या समाजवादियों के बारे में कही जा सकती है?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है कि क्षेत्रीय दलों में जिन ताकतों का मुकाबला भारतीय जनता पार्टी के साथ है, वे विचारधारात्मक स्तर पर कांग्रेस के ज्यादा नजदीक है. दक्षिण भारत में एम के स्टॉलिन हों या फिर आंध्रप्रदेश में वाइएस जगमोहन रेड्डी हों या फिर तेलंगाना के चंद्रशेखर राव दोनों के अतीत की जड़ें कांग्रेस ही रही है. स्टॉलिन द्रविड़ आंदोलन की विरासत में हैं, जो राष्ट्रीय स्तर पर सवर्ण राजनीतिक ताकतों के खिलाफ खड़ी रही हैं. बंगाल की ममता बनर्जी तो कांग्रेस से ही निकली हैं. उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और बिहार में लालू प्रसाद की जड़ें जरूर समाजवादी आंदोलन से है. प्रधानमंत्री ने दरअसल नीतीश के बहाने न केवल बिहार में लालू प्रसाद की विरासत बल्कि यूपी में मुलायम सिंह की विरासत की समाजवादी जड़ों पर प्रहार किया है. लालू प्रसाद भ्रष्टाचार के मामले में भले ही कानूनी नजरिए से दोषी करार दिए गए हैं, लेकिन बिहार की राजनीति में 1990 के बाद के नरेटिव के केंद्र बने हुए हैं. लालू प्रसाद सत्ता में हों या नहीं, लेकिन भारतीय जनता पार्टी उन्हें राजनैतिक खतरा मानती रही है.
बिहार में विपक्ष के नेता और लालू प्रसाद के वारिस तेजस्वी यादव ने फेसबुक पोस्ट लिखा है, 'आप यदि कश्मीर से शुरू करें तो एक दूसरे के विरोधी महबूबा मुफ्ती और फारूक अब्दुल्ला से लेकर तमिलनाडु में एक दूसरे के विरोधी जयललिता और एम करुणानिधि, आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू, और पूर्वी भारत में नवीन पटनायक, ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, राम विलास पासवान, शरद यादव, उत्तर भारत में कांशी राम, मायावती, ओम प्रकाश चौटाला, चौधरी अजीत सिंह, प्रकाश सिंह बादल, उत्तर पूर्व में असम गण परिषद जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय दलों और नेताओं ने बीजेपी से राजनीतिक समझौते किए और केंद्र में उनकी सरकार बनाने में मदद की. किंतु जिस एक बड़े राजनेता ने 1990 के बाद बीजेपी से कभी राजनीतिक समझौते नहीं किए वे लालू यादव हैं.' यही वह संदर्भ है कि जब एक महाबली के सामने सब समझौता करने को तैयार हों, तो एक राज्य में पिछले 18 सालों से सत्ता से बाहर एक नेता आखिर किस तरह प्रतिरोध की शैली में खड़ा है. नीतीश कुमार को दिया गया प्रमाणपत्र वास्तव में इसी की एक अभिव्यक्ति है.'
समाजवाद शब्द को लेकर भी दुनिया भर में अनेक तरह की प्रवृतियां हैं. कार्ल मार्क्स के वैज्ञानिक समाजवाद की अवधारणा से अलग दर्जनों रंग और कई तरह के समाजवादी हैं. इस तथ्य को भी रेखांकित किया जा सकता है कि जर्मनी का एडोल्फ हिटलर ने भी अपनी राजनीति की शुरूआत समाजवाद के नारे के साथ ही की थी. लेकिन भारत में तो समाजवादियों ने समाजवादी आर्थिक नीतियों,वैचारिक संघर्ष और मूल्यों से कब का पीछा छुड़ा लिया है. यहां तक कि लोहियावाद के राजनैतिक वसूल भी अब इतिहास बन कर रह गए हैं. लोहिया के एजेंडे में आर्थिक समानता की उपलब्धि और आर्थिक शोषण का अंत था. वह बड़े उद्योगों का सार्वजनिक स्वामित्व चाहते थे. जोतने वाले को भूमि के साथ भूमि सुधार भारतीय अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण का हिस्सा थे. वह चाहते थे कि आय और व्यय पर सीमाएं लगाई जाएं. 1963 में लोकसभा में आम लोगों और अमीरों की आय में बड़ी असमानता पर उनकी प्रसिद्ध बहस ने उन दिनों काफी तूफान खड़ा कर दिया था. आज के भारत में सरकारी स्वामित्व से पीछा छुड़ाने के नरेंद्र मोदी के अभियान में "सच्चे समाजवादी" नीतीश कुमार बराबर के साझीदार बने हुए हैं.
यहां तक कि हिंदू राष्ट्र के जिस एजेंडे का वे कभी विरोध करते थे, उसपर भी चुप्पी साध लिया है. परिवारवाद के आरोपों से ग्रस्त लालू प्रसाद ने इन सवालों को भले ही हल न ही किया हो, लेकिन समाज के सबसे उत्पीड़ित समूहों को जो स्वर दिया है उसने पहले हिंदी पट्टी की सामंती राजनीति को बदला. प्रधानमंत्री का प्रमाध पत्र यूपी के चुनावों में इन्हें कितना वोट दिला सकेगा, यह तो 10 मार्च को पता चलेगा. लेकिन समाजवाद बनाम संप्रदायवाद की राजनीतिक बहस को तो इन्होंने छेड़ ही दिया है, जिसमें धर्मसत्ता और कॉरपारेट गठजोड़ शामिल है. नीतीश तो बहाना है निशाना अखिलेश यादव हैं.
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