सम्पादकीय

PoK में विरोध-प्रदर्शनों पर बेरहमी से कार्रवाई

nidhi
18 Jun 2026 8:08 AM IST
PoK में विरोध-प्रदर्शनों पर बेरहमी से कार्रवाई
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विरोध-प्रदर्शनों पर बेरहमी से कार्रवाई
जिस देश ने दूसरे देशों में गड़बड़ी फैलाने के लिए आतंकवाद को सरकारी नीति का हथियार बनाया, उसे अब दशकों की गलतियों का नतीजा भुगतना पड़ रहा है। पाकिस्तान को अब अपने किए का फल मिल रहा है; कब्जे वाले कश्मीर इलाके में बड़े पैमाने पर जनता विरोध-प्रदर्शन कर रही है।
हालांकि, इस नए विरोध पर इस्लामाबाद का रवैया वही पुराना और निराशाजनक रहा है: दमन, इनकार और ध्यान भटकाना। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में प्रदर्शनकारियों पर पाकिस्तानी सुरक्षा बलों की बेरहम कार्रवाई में 30 से ज़्यादा लोग मारे गए और कम से कम 200 घायल हुए। मरने वाले आतंकवादी नहीं, बल्कि आम नागरिक और 'जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी' (JAAC) के सदस्य हैं।
यह नागरिक समाज का एक संगठन है जो संसाधनों से भरपूर इस इलाके के लोगों के लिए आर्थिक अधिकारों और राजनीतिक सम्मान की शांतिपूर्ण मांग कर रहा है। पहले के विरोध-प्रदर्शनों में भी ऐसा ही रवैया देखा गया था।
हर बार इस्लामाबाद ने वादे तो किए, लेकिन बाद में उनसे मुकर गया। यह सिलसिला इसलिए जारी है क्योंकि इसकी बुनियादी वजहें — बिना प्रतिनिधित्व के संसाधनों का दोहन, संवैधानिक दर्जे से इनकार, और मुज़फ़्फ़राबाद के बजाय रावलपिंडी के प्रति जवाबदेह दूर बैठे नौकरशाहों द्वारा शासन — वैसी की वैसी बनी हुई हैं। पाकिस्तान सरकार चाहे कितनी भी बेरहमी से इन विरोध-प्रदर्शनों को कुचलने की कोशिश करे, ये कब्जे वाले कश्मीर में फैलते जा रहे हैं। इस अशांति ने शासन की गहरी नाकामियों को उजागर किया है और जनता का भरोसा तोड़ा है।
JAAC के विरोध की तत्काल वजह एक संवैधानिक विसंगति है, जो दिखाती है कि इस्लामाबाद PoK के चुनावी लोकतंत्र को कितनी कम अहमियत देता है: 27 जुलाई को होने वाले विधानसभा चुनावों में देश के दूसरे हिस्सों से आए शरणार्थियों के लिए 12 आरक्षित सीटें तय करना।
PoK विधानसभा में 45 सीटें हैं। इनमें से 12 सीटें उन लोगों के लिए आरक्षित हैं जो वहां नहीं रहते, बल्कि पूरे पाकिस्तान में, खासकर पंजाब और सिंध प्रांतों में फैले हुए हैं। कब्जे वाले कश्मीर विधानसभा की कुल सीटों में से एक-चौथाई से ज़्यादा सीटें इन्हीं की हैं। इन 12 सदस्यों के समर्थन के बिना, कब्जे वाले कश्मीर में कोई भी सरकार स्थिर नहीं रह सकती।
यह साफ है कि इस्लामाबाद इन सीटों का इस्तेमाल कब्जे वाले कश्मीर के शासन और प्रशासन में सीधे दखल देने के लिए कर रहा है। पहले के विरोध-प्रदर्शन मुख्य रूप से किसी खास क्षेत्र या आर्थिक मुद्दों से जुड़े थे, लेकिन यह आंदोलन अब कई पक्षों को शामिल करने वाला अभियान बन गया है। इसमें विधायी सुधार, जवाबदेही और संसाधनों पर स्थानीय नियंत्रण जैसे शासन से जुड़े बुनियादी मुद्दों को उठाया जा रहा है। PoK प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर इलाका है, लेकिन यहाँ के ज़्यादातर लोग घोर गरीबी में जी रहे हैं। हज़ारों आम नागरिक शिकायत कर रहे हैं कि उन्हें विकास के मौकों से अन्यायपूर्ण तरीके से वंचित रखा गया है; लोग बुनियादी अधिकारों से महरूम किए जाने के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं। अगर PoK के साथ पाकिस्तान का रिश्ता किसी औपनिवेशिक ताकत की तरह संसाधनों के दोहन (exploitation) पर आधारित है, तो चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) के ज़रिए चीन के आने से यह दोहन और भी बढ़ गया है और गहरा हो गया है। पाकिस्तान के सामने अपनी वैधता (legitimcay) का जो संकट है, उसे सुलझाने के बजाय, CPEC, ग्वादर और शक्सगाम के ज़रिए चीन की बढ़ती मौजूदगी ने उन शोषणकारी तौर-तरीकों को और मज़बूत कर दिया है जिनकी वजह से स्थानीय लोग सड़कों पर उतरने को मजबूर हुए हैं।
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