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संसार का सबसे सुखी व मनमौजी प्राणी जीजा के अस्तित्व पर इन दिनों प्रबल संकट है तथा वह वर्तमान में घोर उपेक्षा का शिकार है। इस संकट को मद्देनजर रखते हुये मेरी राय में अखिल भारतीय जीजा संघ का गठन किया जाना चाहिए तथा उचित व हितकारी यह हो कि उसका चेयरमैन मुझे बनाया जाये। वह जीजा, जिसे देखते ही सालियां लाज शर्म से दोहरी हो जाती थीं। साले बल्लियों उछल जाते थे, वही जीजा आज अपमान की जिन्दगी जीने को मजबूर है। ससुराल में वह आज सर्वाधिक उपहास, मजाक तथा बेहूदगी का प्रतीक बनकर रह गया है। उसकी परवाह न ससुराल में साले करते हैं और न सालियां। यहां तक कि उसकी स्वयं की ब्याहता भी उसे घास नहीं डालती। यूं देखा जावे तो जीजाओं का सुनहरा काल कोई ज्यादा पुराना नहीं है। अभी पन्द्रह बीस बरस पहले तक भी जीजा मान-सम्मान तथा खुशहाल जीवन जी रहा था। आखिर जीजाओं पर यह विपदा क्यों आई व क्यों कर उपेक्षित हो गया, इस पर विचार करने पर जो तथ्य हाथ लगते हैं, उनमें प्रमुख रूप में यही बात है कि इन सब हालात के लिए वह स्वयं जिम्मेदार है। आजकल सामान्य रूप से जीजा बेकार व बेरोजगार पाये जाते हैं। इससे उसकी साख ससुराल में नहीं जम पाती। वे साले-सालियों के लिए कुछ भी जुगाड़ नहीं कर पाते, अपितु वे शादी के बाद अपना ज्यादा समय ससुराल में गुजारते हैं। इसलिए वे अपने हाथों ही अपना मान-सम्मान खोने के जिम्मेदार हैं।
पहले जीजा ससुराल जाता था तो फल-मिठाई, कुछ न कुछ उपहार ले जाता था। परन्तु आज का जीजा, अपने दायित्वों को भुला बैठा है तथा उसकी अपेक्षाएं ससुराल वालों से बढ़ गई हैं। खुद की इज्जत खुद संभालो, बच जाये तो बच जाये वरना अपमानित होने में तो कसर है नहीं। इसके अलावा भी आज के जीजा स्वभाव रूप में तुलसीदास के काफी करीब हैं। धर्मपत्नी ससुराल गई कि पीछे पालतू कुत्ते की तरह दुम हिलाते जा धमकेंगे। अब देखिये ससुराल में पड़े हैं, नहा रहे हैं, धो रहे हैं, खा रहे हैं तथा अपमान का घूंट पी रहे हैं। तो भाई पूछिये इस साले-जीजा से कि लाला क्यों नाक कटवाने पर तुले हो। परन्तु नकटा इतना हो गया है कि जूं तक नहीं रेंगती। आदत से बाज नहीं आता। मैं एक ऐसे जीजा को जानता हूं जो सदैव ससुराल वालों के चूना लगाने पर तुला रहता है। एक दिन मैंने उस जीजा से कहा-'भाई, तुमने यह क्या आलम पाल रखा है? तुम गधे के बराबर भी नहीं रहे, तुम अकेले बैठे-बैठे रसोईघर की तरफ ताकते रहते हो। क्यों नहीं अपनी भुजाओं पर विश्वास करते। आखिर कब तक इस तरह दण्ड पैलते रहोगे?' असली जीजा था, सो बोला-'अच्छे आदमी किसी के जीजा बनो तो जानो कि जीजा होता क्या है? ऐसे घर में जाकर शादी करो जहां साले-सालियां हों तो पता चले कि जीजा का वीजा कैसे मिलता है?' 'लेकिन मैं यह कहता हूं कि तुम जीजा हो, परन्तु अमां यार तुमने तमाम जीजाओं की छवि पर दाग लगा दिया है। मैं स्वयं जीजा बनता हिचकिचा रहा हूं। किसी औरत का पति बन जाना सहज है। परन्तु किसी साले अथवा साली का जीजा बनना टेढ़ी खीर है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि तुम अपनी आदतों से बाज आओ।' मैंने कहा।
पूरन सरमा
स्वतंत्र लेखक
By: divyahimachal
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