सम्पादकीय

बंगाल चुनाव : क्या ममता बनर्जी सरकार को ले डूबेगा दलितों के अपमान का मुद्दा

Gulabi
13 April 2021 12:16 PM GMT
बंगाल चुनाव : क्या ममता बनर्जी सरकार को ले डूबेगा दलितों के अपमान का मुद्दा
x
प्रधानमंत्री मोदी

प्रधानमंत्री मोदी (PM Modi) बंगाल की रैलियों में ममता बनर्जी पर खूब निशाना साध रहे हैं. खासकर दलित और पिछड़ी जातियों के मुद्दे पर वो ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) और उनकी पार्टी पर राजनीतिक हमले कर रहे हैं. सोमवार को पश्चिम बंगाल (West Bengal) के कल्याणी में हुई एक रैली में पीएम मोदी ने कहा कि दीदी के लोग खुलेआम अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी वर्ग के लोगों को गाली देने में लगे हैं. पीएम मोदी ने कहा कि दीदी आपके साथी बंगाल के अनुसूचित जाति को भिखारी कहकर अपमान कर सकते हैं लेकिन हमारे लिए अनुसूचित जाति का मान सम्मान सर्वोपरि है. उन्होंने कहा कि 10 वर्षों से ममता बनर्जी बंगाल के दलितों, पीड़ितों, शोषितों और वंचितों से नफरत दिखा रही हैं, ये देश देख रहा है. पीएम मोदी ने कहा कि ममता बनर्जी ने ना ही मतुआ समाज के मेरे भाई-बहनों के लिए कुछ किया और ना ही नामशुद्र समाज के लिए.


पीएम मोदी ये बातें हाल ही में टीएमसी नेता सुजाता मंडल के दिए एक बयान का वीडियो वायरल होने को लेकर कह रहे थे. वायरल हुए वीडियो में सुजाता मंडल अनुसूचित जाति के लोगों की तुलना भिखारियों से करती दिख रही हैं. बीजेपी ने इस वीडियो को ट्विटर पर शेयर किया है. इसमें सुजाता मंडल कहती दिख रही हैं कि अनुसूचित जाति के लोग स्वभाव से ही भिखारी होते हैं. ममता बनर्जी ने उनके लिए बहुत कुछ किया लेकिन कुछ रुपयों के लिए वो बीजेपी के पीछे जा रहे हैं. वो अपना वोट बीजेपी को बेच रहे हैं. सुजाता मंडल के इस बयान को बीजेपी ने अपना मुद्दा बना लिया है. गृहमंत्री अमित शाह भी अपनी रैलियों में इस वीडियो का जिक्र कर ममता सरकार पर हमले कर रहे हैं. टीएमसी को दलितों और ओबीसी के खिलाफ दिखाकर बीजेपी की नजर दलितों और ओबीसी के बड़े वोट बैंक पर है.


पश्चिम बंगाल में कितना बड़ा वोट बैंक हैं दलित
पश्चिम बंगाल में एक बड़े वोटबैंक के तौर पर मुसलमानों को देखा जाता है. 2011 की जनगणना के मुताबिक राज्य में उनकी जनसंख्या करीब 27 फीसदी है. इसक बाद दूसरा बड़ा अंक अनुसूचित जाति का है. राज्य में इनकी आबादी करीब 23.5 फीसदी है. बीजेपी की नजर इस बड़े वोट बैंक पर है. जनसंख्या के लिहाज से पश्चिम बंगाल सबसे ज्यादा अनुसूचित जाति की आबादी वाला तीसरा राज्य है. पश्चिम बंगाल के 9 जिलों में इनकी आबादी 25 फीसदी से भी ज्यादा है. इन 9 जिलों में 127 विधानसभा सीटें आती हैं. इसके अलावा राज्य के 6 जिलों की 78 विधानसभा सीटों पर इनकी आबादी 15 से लेकर 25 फीसदी तक है. पश्चिम बंगाल की 68 विधानसभा सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है.

2019 में बीजेपी को मिला था दलित वोट बैंक का साथ
पश्चिम बंगाल के दलित वोट बैंक पर बीजेपी की नजर काफी वक्त से है. 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को इस वोटबैंक का साथ भी मिला था. दलितों के समर्थन की वजह से ही बीजेपी बंगाल की 18 सीटें झटकने में कामयाब रही थी. 2019 के लोकसभा चुनाव में राज्य की 68 अनुसूचित जाति आरक्षित विधानसभा सीटों में 33 पर बीजेपी आगे रही थी. इन 33 सीटों में से 26 सीटें मतुआ समुदाय के असर वाली हैं. इस नतीजे को देखकर ही बीजेपी विधानसभा चुनाव से पहले ही मतुआ समुदाय को लुभाने की कोशिश में लग गई.

क्या टीएमसी से छिटक गया दलित वोटबैंक
2019 के लोकसभा चुनाव नतीजों से साफ पता चलता है कि राज्य का दलित वोटबैंक टीएमसी से छिटका है. 2019 के चुनाव में टीएमसी दलितों के असर वाली 34 विधानसभा सीटों पर आगे रही थी. लेफ्ट और कांग्रेस सिर्फ 3 सीटों पर आगे रही थीं. जबकि 2016 के विधानसभा चुनाव में हालात बिल्कुल अलग थे. उस चुनाव में टीएमसी को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 50 सीटों पर कामयाबी मिली थी. लेफ्ट को 10 सीटें मिली थीं और कांग्रेस 8 सीटें जीतने में कामयाब रही थीं. बीजेपी को अनुसूचित जाति आरक्षित एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं हुई थी. इस लिहाज से देखा जाए तो दलित वोटबैंक ने 2019 के लोकसभा चुनाव में अपना रुख पूरी तरह से बदला और ये बीजेपी के पाले में गया.

2016 के चुनाव में अनुसूचित जाति ने टीएमसी का जबरदस्त समर्थन दिया था. इतना समर्थन 2011 के विधानसभा चुनाव में भी नहीं मिला था. 2011 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी को अनुसूचित जाति आरक्षित 37 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. लेफ्ट को 20 और कांग्रेस को 8 सीटों पर कामयाबी मिली थी. पश्चिम बंगाल में उस वक्त बीजेपी अपना वजूद ही तलाश रही थी.

दलितों को अपने पाले में रखने की जद्दोजहद
बीजेपी और टीएमसी शुरुआत से ही दलित और आदिवासी समुदाय को अपने पाले में रखने की कोशिश में लगी हैं. दोनों पार्टियों ने अपने-अपने घोषणापत्र में दलित और आदिवासी समुदाय के हितों का ख्याल रखा है. टीएमसी ने अपने घोषणापत्र में वादा किया है कि अगर उनकी सरकार बनती है तो दलित और आदिवासी परिवार को हर साल 12 हजार रुपए देगी. वहीं बीजेपी ने दलित और पिछड़े वर्ग की छात्राओं को 3 से 5 हजार रुपए की आर्थिक मदद देने का ऐलान किया है. साथ ही एससी समुदाय के लोगों को सर्टिफिकेट देने की बात कही है. बीजेपी ने वादा किया है कि उनकी सरकार आई तो गरीब समुदाय के लोगों के लिए बोर्ड बनाएगी, जिनसे उन्हें हर तरह की मदद दी जाएगी.

इस लिहाज से प्रधानमंत्री मोदी के बांग्लादेश दौरे की भी खूब चर्चा रही. पीएम मोदी ने बांग्लादेश दौरे के दौरान मतुआ समुदाय के ओरकांडी के मंदिर में पूजा अर्चना की थी. ओरकांडी वो जगह है, जहां मतुआ समुदाय के संस्थापक हरिशचंद्र ठाकुर का जन्म हुआ था. इसे दलित समुदाय में आने वाले मतुआ समुदाय को लुभाने की कोशिश के तौर पर देखा गया.


Next Story