सम्पादकीय

Bengal By-Poll: क्या बीजेपी ममता बनर्जी को भवानीपुर से भी पटकनी देने में सफल हो पाएगी?

Tara Tandi
9 Sep 2021 10:56 AM GMT
Bengal By-Poll: क्या बीजेपी ममता बनर्जी को भवानीपुर से भी पटकनी देने में सफल हो पाएगी?
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कांग्रेस (Congress) आलाकमान ने एक बार फिर से पश्चिम बंगाल

जनता से रिश्ता वेबडेस्क| अजय झा | कांग्रेस (Congress) आलाकमान ने एक बार फिर से पश्चिम बंगाल (West Bengal) राज्य इकाई की बात मानने से इंकार करते हुए एक तरफा निर्णय ले लिया है कि वह प्रदेश में होने वाले विधानसभा उपचुनाव में अपना प्रत्याशी नहीं उतारेगी. कुछ ही महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में भी पार्टी आलाकमान ने राज्य इकाई को नज़रअंदाज़ करते हुए एकतरफा फैसला लिया था कि वह वाममोर्चा की डूबती नाव की सवारी करेगी. नतीजा रहा कांग्रेस पार्टी का पश्चिम बंगाल में सफाया. पश्चिम बंगाल के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि विधानसभा में कांग्रेस पार्टी का एक भी विधायक नहीं चुना गया. इसे कांग्रेस आलाकमान का दिवालियापन कहें या फिर उनकी सोच की खोट, चुनाव ही एक ऐसा अवसर होता है जब किसी भी पार्टी को अवसर मिलता है कि वह अपनी शक्ति में वृद्धि करे और अपने कार्यकर्ताओं में नया जोश पैदा करे.

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस पार्टी कभी वामदलों के साथ और अब कुछ ही महीनों के बाद तृणमूल कांग्रेस के संग झूला झूलती नज़र आएगी. तीन क्षेत्रों के उपचुनाव में कांग्रेस पार्टी का तृणमूल कांग्रेस को समर्थन इस बात को दर्शाता है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की नज़र सिर्फ 2024 के लोकसभा पर ही टिकी है. कांग्रेस पार्टी कुछ भी करने को तैयार दिख रही है जिससे पार्टी के बेताज बादशाह राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के सपने में कोई अवरोध ना आ जाए. केंद्र में फिर से कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में सरकार बने इसके लिए विपक्षी एकता जरूरी है, जिसमें तृणमूल कांग्रेस की अहम् भूमिका रहने वाली है.

राज्यों में कमज़ोर कांग्रेस केंद्र में कैसे मजबूत होगी?

कांग्रेस आलाकमान कहीं ना कहीं इस बात को भूल रही है कि जब तक पार्टी की स्थिति विभिन्न राज्यों में नहीं सुधरेगी, राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का सपना कभी पूरा नहीं होगा, क्योंकि उसके लिए उसे लोकसभा में अच्छी खासी संख्या में सीटें भी जीतनी होंगी. पहले वाममोर्चे के सामने समर्पण और अब तृणमूल कांग्रेस की पूंछ पकड़ कर पार्टी कैसे सत्ता में आएगी यह एक सोचनीय विषय है. कहीं ऐसा ना हो जाए कि लोकसभा चुनाव आते-आते कांग्रेस पार्टी के पास पश्चिम बंगाल में कोई कार्यकर्ता ही ना बचे, जिसकी भरपूर संभावना है. जो भी बचे खुचे कांग्रेस के कार्यकर्ता हैं, अगर उन्हें तृणमूल कांग्रेस के लिए ही वोट मांगना है तो वह तृणमूल कांग्रेस में ही शामिल हो जायेंगे, क्योंकि कार्यकर्ताओं की चाहत होती है कि वह सत्ता पक्ष के साथ जुड़े हों.

बहरहाल, कांग्रेस पार्टी पश्चिम बंगाल में उपचुनाव नहीं लड़ेगी. पश्चिम बंगाल में बना संयुक्त मोर्चा अब औपचारिक तौर पर भंग हो गया है और वाममोर्चा ने फैसला ले लिया है कि वह अपने दम पर ही तृणमूल कांग्रेस को चुनौती देगी, हालांकि वामदलों की जीत किसी चमत्कार से कम नहीं होगी. 30 सितम्बर को होने वाले विधानसभा उपचुनाव में टक्कर त्रिकोणीय होगी जिसमें वाममोर्चा की भूमिका सांकेतिक रहेगी और बीजेपी भी एक बार फिर से तृणमूल कांग्रेस को चुनौती पेश करती नज़र आएगी, बावजूद इसके की राज्य चुनाव के बाद बीजेपी से विधायक टूट कर वापस तृणमूल कांग्रेस के साथ जुट गए हैं और बीजेपी की शक्ति में कमी आई है.

ममता बनर्जी को चुनौती देंगे बीजेपी और वामदल

सीपीएम ने कल घोषणा की कि उसके नेता श्रीजिव विश्वास भवानीपुर क्षेत्र से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को चुनौती देंगे. सीपीएम नेता मोहम्मद मुद्दस्सर हुसैन शमशेरगंज से उपचुनाव लड़ेंगे तथा सहयोगी दल आरएसपी के जाने आलम मियां जंगीपुर से अपना नामांकन भरेंगे. बीजेपी की राज्य इकाई ने पार्टी के संभावित प्रत्याशियों की लिस्ट पार्टी आलाकमान को भेज दी है, जिसमें भवानीपुर से 6 संभावित प्रत्याशियों का नाम शामिल है. बीजेपी आलाकमान जल्द ही तीनों क्षेत्रों से प्रत्याशियों की सूची का ऐलान करेगी. बीजेपी ने कांग्रेस पार्टी का उपचुनाव नहीं लड़ने का फैसले का यह कह कर मजाक उड़ाया कि कांग्रेस पार्टी की अब प्रदेश में चुनाव लड़ने की हैसियत ही नहीं बची है.

ममता बनर्जी को उनके गढ़ भवानीपुर से हराना आसान नहीं होगा. यह ममता बनर्जी की जिद थी या फिर अति आत्मविश्वास की वह अपने सुरक्षित भवानीपुर को छोड़ कर पूर्व सहयोगी शुवेंदु अधिकारी को सबक सिखाने नंदीग्राम से चुनाव लड़ने पहुंच गयीं और चुनाव हार गयी. चूंकि ममता बनर्जी को 5 नवम्बर तक विधायक बनना अनिवार्य था, बहुत जद्दोजहद के बाद चुनाव आयोग ने कोरोना संक्रमण के ख़त्म होने से पहले ही विधानसभा उपचुनाव कराने की तृणमूल कांग्रेस की विनती स्वीकार कर ली.

बीजेपी भवानीपुर में कैसे देगी ममता बनर्जी को टक्कर

आमतौर पर विधानसभा उपचुनावों में सत्ताधारी दल को ही फायदा मिलता है. मतदाता किसी विपक्षी दल के प्रत्याशी को वोट दे कर अपने वोट को जाया नहीं करना चाहते, वह भी तब जबकि मैदान में सत्ता पक्ष से स्वयं मुख्यमंत्री प्रत्याशी हों. पर बीजेपी के मुंह में शेर की तरह खून लग चुका है. नंदीग्राम में पार्टी शिकार करने में सफल रही थी. बीजेपी भवानीपुर से किसी ऐसे प्रत्याशी को उतारने की सोच रही है जो मतदाताओं को पूरे बंगाल में चुनाव बाद हुए हिंसा और हत्या की घटनाओं की याद ताज़ा करा दे और एक बार फिर से कुछ अप्रत्याशित हो जाए ताकि 2024 के लोकसभा चुनाव में संयुक्त विपक्ष की संभावित चुनौती को भवानीपुर में ही दफ़न कर दिया जाए.

बीजेपी ने एक बार तो ममता बनर्जी को चित कर दिया था और अब वह दुबारा इसी फ़िराक में लगी है. बीजेपी ना सिर्फ चुनाव बाद हुए हिंसा के नंगे तांडव की भवानीपुर के मतदाताओं को याद दिलाएगी बल्कि उन्हें यह भी बताएगी कि कैसे ममता बनर्जी ने भवानीपुर की जगह नंदीग्राम जा कर उनके विश्वास से धोखा किया था. बीजेपी को यह भी उम्मीद होगी कि चूंकि कांग्रेस पार्टी ने तृणमूल पार्टी के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया है, कांग्रेसी विचारधारा से जुड़े नाराज़ मतदाता दीदी को वोट देने की जगह बीजेपी को वोट देना पसंद करेंगे. भवानीपुर में किसी चमत्कार की उम्मीद भले ही कम हो पर जब चुनाव है तो सम्भावनाएं भी रहेंगी ही.

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