सम्पादकीय

भारतीय संविधान के केंद्र में 'व्यक्ति' है, परिवार-समुदाय नहीं!

Gulabi
15 Aug 2021 5:07 PM GMT
भारतीय संविधान के केंद्र में व्यक्ति है, परिवार-समुदाय नहीं!
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हम सब जानते हैं कि भारत में रणनीतिक तरीके से संविधान (Constitution) के उपयोग और वजूद को नकारे जाने की कोशिशें होती रही हैं

सचिन कुमार जैन, निदेशक, विकास संवाद और सामाजिक शोधकर्ता।

हम सब जानते हैं कि भारत में रणनीतिक तरीके से संविधान (Constitution) के उपयोग और वजूद को नकारे जाने की कोशिशें होती रही हैं. संविधान के सबसे पहले चार शब्द 'हम, भारत के लोग' ही यह साबित करते हैं कि बाहरी उपनिवेशवाद यानी ब्रिटेन की राजसत्ता से मुक्ति के समानांतर ही हमें अंदरूनी उपनिवेशवाद यानी एक जाति की दूसरी जाति पर सत्ता, एक विचार पर दूसरा विचार की प्रभुता, स्त्री पर पुरुष का संपत्ति के रूप में प्रतिपादन, प्राकृतिक संसाधनों पर संयमित जीवन जीने वाले आदिवासियों का विस्थापन करने की मंशा से मुक्ति भी अनिवार्य होगी. अंदरूनी आज़ादी का यह संघर्ष आज भी जारी है.


संविधान सभा में जब उद्देशिका के अंतिम रूप पर बहस की जा रही थी, तब सभा के सदस्य एम. वी. कामत ने उद्देशिका में ईश्वर का नाम, रोहिणी कुमार चौधरी ने ईश्वर के नाम के साथ देवी का नाम, प्रोफ. शिब्बंलाल सक्सेना ने महात्मा गांधी का नाम जोड़ने के प्रस्ताव दिए. लेकिन इन्हें स्वीकार नहीं किया गया. क्यों? संविधान सभा बहुत सजगता के साथ संविधान को आकार दे रही थी. इस विषय पर कहा गया था कि क्या इस प्रस्ताव (ईश्वर का नाम) से हम विश्वास के विषय में विवश करने की की कोशिश नहीं कर रहे हैं? यह विश्वास की स्वतंत्रता के मूल अधिकार पर प्रभाव डालता है. उनके कहने का अर्थ यह था कि जो लोग नास्तिक होंगे, उनके लिए फिर उद्देशिका का क्या अर्थ होगा? यह बहस इस बात का प्रमाण है कि संविधान सभा ऐसी व्यवस्था की रचना करना चाहती थी, जिसमें हर तरह के विचार, विश्वास, संस्कृति को अपनाने की स्वतंत्रता हो और ऐसा होना तब तक संभव नहीं होता है, जब तक कि हर समुदाय या परिवार को ही नहीं बल्कि हर व्यक्ति को भी पूर्ण स्वतंत्रता हासिल हो.


संविधान लिखने वाले ऐसी कोई व्यवस्था नहीं बनाना चाहते थे, जिसमें किसी भी व्यक्ति के अधिकार और स्वतंत्रता सीमित होती हो. वस्तुतः पूरा संविधान "व्यक्ति" को व्यवस्था आधार मानता है, न कि धर्म को या परिवार को या समुदाय या समाज को. अनुच्छेद 14 के मुताबिक़ राज्य "किसी व्यक्ति" को विधि के समक्ष समता या संरक्षण से वंचित नहीं करेगा. अनुच्छेद 15 कहता है कि राज्य, "किसी नागरिक" के विरुद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा. अनुच्छेद 19 के मुताबिक़ "सभी नागरिकों" को अपनी बात कहने, एकजुट होने, संगठन बनाने, देश में सभी जगह आने-जाने, निवास करने या बस जाने या कोई भी कारोबार करने का अधिकार है. नागरिक एक व्यक्ति के रूप में पहचाना जाता, न कि परिवार या समुदाय या समाज के रूप में. अनुच्छेद 24 कहता है कि 14 साल से कम उम्र के "किसी बच्चे को" कारखाने या खदान में काम के लिए नहीं लगाया जाएगा. इसी तरह अनुच्छेद 25 में उल्लेख है कि "सभी व्यक्तियों" को अंतःकरण की स्वतंत्रता और अपने धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने का समान हक़ होगा. यह प्रावधान बहुत गहरे अर्थ लिए हुए है क्योंकि यह सभी परिवारों या समुदाय की बात नहीं करता, बल्कि सभी व्यक्तियों के धर्म और विश्वास के अधिकार की सुरक्षा की व्यवस्था करता है. इसका अर्थ यह है कि किसी परिवार का कोई सदस्य यदि चाहे तो तय कर सकता है कि वह उस धर्म का परिपालन नहीं करेगा, जिसको अन्य सदस्य मानते हैं. एक ही परिवार में दो धार्मिक विश्वास के व्यक्ति भी हो सकते हैं. संविधान मानता है कि ऐसा जरूरी नहीं है कि व्यक्ति जिस परिवार या समुदाय में जन्मा है, उसे वही धर्म मानते रहना होगा. वह उसी परिवार में रहते हुए भी किसी अन्य धर्म के व्यवहारों को अपना सकेगा. इतना ही नहीं अनुच्छेद 29 तो यह कहता है कि "नागरिकों" को अपनी विशेष भाषा, लिपि और संस्कृति को बनाए रखने का अधिकार होगा.


यही भारतीय संविधान (Indian Constitution) की खूबसूरती है कि वह समाज और राज्य व्यवस्था की मूल और सबसे महत्वपूर्ण इकाई 'व्यक्ति' को मानता है. वह न्याय, स्वतंत्रता, गरिमा, लोकतंत्र, समता और बंधुता को भी 'व्यक्ति' के सन्दर्भ में ही परिभाषित करता है. इस मान से किसी परिवार के भीतर भी एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के साथ शोषण, हिंसा या गुलामी का व्यवहार नहीं कर सकता है.


यह जानना जरूरी है कि संविधान में "व्यक्ति" को केंद्र में क्यों रखा गया है? बात बहुत स्पष्ट सी है. यदि किसी समाज के खुशहाली, सम्पन्नता, समानता और न्याय के मानकों का आंकलन करना हो तो, यह जांचना ही होगा कि क्या सभी बच्चे खुश और सुरक्षित हैं? क्या सभी महिलाएं खुश और सुरक्षित है? क्या सभी मजदूर और किसान खुश और सुरक्षित हैं? एक ही परिवार में महिलायें भी होती हैं, बच्चे भी, किसान और मजदूर भी; इन सबके अपनी-अपनी जरूरतें, चुनौतियां और बेहतरी के मानक है. ऐसा हो सकता है कि सरकार यह घोषणा कर दे कि भारत के 25 प्रतिशत परिवार संपन्न और खुशहाल हैं, लेकिन क्या सरकार यह घोषणा भी कर पाएगी कि इन 25 प्रतिशत संपन्न परिवारों में रहने वाली सभी महिलाएं भी सम्पन्न और स्वतंत्र हैं, उनके साथ किसी तरह का भेदभाव और शोषण नहीं होता है? क्या इन 25 प्रतिशत संपन्न परिवारों में ही रहने वाले सभी बच्चे खुश और सुरक्षित हैं? उनका शोषण नहीं होता है? ऐसा भारत की सरकारें कभी नहीं कह सकतीं क्योंकि व्यावहारिकता में भारतीय राजनैतिक और सामाजिक व्यवस्था ने "व्यक्ति" को सम्पन्नता, खुशहाली और स्वतंत्रता का मूल आधार नहीं माना है.


बहुत सीधी सी बात है कि भारतीय समाज में व्यापक परम्परा यही है कि लड़की की शादी परिवार की तय करता है. परिवार का मतलब होता है, मुख्य रूप से पुरुष और उस पुरुष के रूप में सहयोगी बना दिया गया है महिला को.


संविधान के बनने के समय से ही यह तर्क दिया जाता है कि भारत की पहचान का आधार परिवार, समाज और धर्म है, किन्तु भारतीय संविधान ने इन आधारों को कहीं नहीं अपनाया है, इसलिए यह देश के माकूल संविधान नहीं है. संविधान सभा ने लगभग हर दिन, हर प्रावधान पर चर्चा करते हुए यह साफ़ संकेत दिए थे कि भारतीय व्यवस्था में समाज नाम की इकाई में जातिवादी और वर्ण आधारित व्यवस्था है, जो व्यक्ति और व्यक्ति के बीच में भेद करती है. ऐसी अवस्था में समाज को संविधान की मूल इकाई नहीं माना जा सकता है. इसी तरह जयपाल सिंह सरीखे आदिवासी प्रतिनिधियों ने यह साबित किया था कि भारत में प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रहने वाले मूल निवासियों यानी आदिवासियों को संसाधनों से स्थानीय और बाहरी राज्य व्यवस्थाओं ने बार-बार बेदखल किया है. उनके साथ बर्बर बर्ताव किया गया है. ऐसी अवस्था में यह ख्याल भी करना उचित नहीं समझा गया कि भारत की सामाजिक व्यवस्था को संवैधानिक व्यवस्था का आधार बनाया जाए. जहां तक परिवार नाम की इकाई का सम्बन्ध है, लैंगिक भेदभाव यानी स्त्रियों के साथ शारीरिक स्वतंत्रता, श्रम के वितरण से लेकर विवाह और उत्तराधिकार के मसलों तक असमानता और असभ्य व्यवस्था के प्रमाण आज तक मौजूद हैं. ऐसे में परिवार नाम की व्यवस्था को भी संविधान का आधार बनाने की कल्पना नहीं की गई.


स्वाभाविक तौर पर यह माना गया था कि भारतीय समाज में कुछ बेहद कुरूप व्यवहार और परम्पराएं हैं, जिन्हें बदलना या तोड़ना ही होगा. परिवार, समुदाय या समाज उन कुरीतियों को खुद बदलने की पहल नहीं करेगा. ऐसी स्थिति में इन्हें संवैधानिक व्यवस्था में विशेष व्यवस्थागत अधिकार नहीं दिए गए. यह काम संवैधानिक मूल्यों पर आधारित क़ानून व्यवस्था के माध्यम से किया जाना संभव होगा.


डा. बीआर अम्बेडकर ने 25 नवम्बर 1949 को यानी संविधान को सभा में अंतिम रूप से स्वीकार किए जाने के एक दिन पहले जो कहा था, उसमें भी उन्होंने धर्म, परिवार या समाज का उल्लेख नहीं किया था. उन्होंने कहा था कि 'मैं समझता हूं कि संविधान चाहे जितना भी अच्छा हो यदि उसे कार्यान्वित करने वाले लोग बुरे हैं, तो वह (संविधान) निःसंदेह बुरा हो जाता है. संविधान केवल विधान मंडल, कार्यपालिका और न्यायपालिका जैसे अंगों के लिए व्यवस्था कर सकता है. लेकिन राज्य के इन अंगों का कामकाज जिन पर निर्भर करता है वह है जनता और उसके द्वारा स्थापित किए गए राजनीतिक पक्ष, जो उसकी इच्छा और नीति का पालन करने के साधन होते हैं. यह कौन कह सकता है कि भारत की जनता और उसके पक्ष किस प्रकार का व्यवहार करेंगे?' भारतीय संविधान में राजनीतिक न्याय की अवधारणा के तहत हर वयस्क को मताधिकार प्रदान किया गया ताकि वह अपने लिए और देश की व्यवस्था के संचालन के लिए खुद सरकार चुन सके. यदि व्यक्ति उचित सरकार चुनता है तो ज्यादा संभावना होगी कि वह सरकार संविधान की व्यवस्था का सम्मान करें, किन्तु यदि "व्यक्ति" के द्वारा अनुचित सरकार चुनी जाएगी तो एक अच्छे संविधान में दर्ज व्यवस्थाओं के चरित्र और उसकी भूमिका को तहस-नहस किया जा सकता है. मताधिकार भी एक व्यक्ति का ही अधिकार रहा है, न कि परिवार या समुदाय का. एक ही परिवार के 4 सदस्य चार अलग-अलग उम्मीदवारों के चयन के लिए अपने मत का इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र हैं. यानी व्यक्ति ही केंद्र में है.


स्वतंत्र भारत के इतिहास में इसके उदाहरण सादृश्य मौजूद हैं. डा. अम्बेडकर की दूरदर्शिता में यह दृश्य साफ़ दिखाई दिया था कि भारत में संविधान का हश्र इस सवाल के जवाब पर निर्भर करेगा कि लोग बंधुता, न्याय, समता, स्वतंत्रता, लोकतंत्र सरीखी अवधारणाओं से शिक्षित होंगे, या फिर सदियों से चली आ रही शोषणकारी, जातिवादी, साम्प्रदायिक और लैंगिक भेदभाव के सिद्धांतों को संवैधानिक मूल्यों से ज्यादा महत्व देंगे? एक बार फिर हम अपने देश की आज़ादी के दिन का त्यौहार मना रहे है और यह सच छिपा रहे हैं कि 72 साल गुज़र गए और इसके बाद भी हम संविधान शिक्षा के अभियान में नहीं जुटना चाहते हैं!


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए जनता से रिश्ता किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
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