सम्पादकीय

विधानसभा चुनाव और कोरोना

Subhi
28 Dec 2021 2:10 AM GMT
विधानसभा चुनाव और कोरोना
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अगले वर्ष की प्रथम तिमाही में पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर व पंजाब के विधानसभा चुनाव होना लगभग तय है क्योंकि इनमें से उत्तर प्रदेश को छोड़ कर शेष सभी चार राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल मार्च महीने में समाप्त हो जयेगा

अगले वर्ष की प्रथम तिमाही में पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर व पंजाब के विधानसभा चुनाव होना लगभग तय है क्योंकि इनमें से उत्तर प्रदेश को छोड़ कर शेष सभी चार राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल मार्च महीने में समाप्त हो जयेगा। उत्तर प्रदेश विधानसभा का कार्यकाल मई महीने में समाप्त होगा। मगर देश में कोरोना संक्रमण की संभावित ओमिक्रोन लहर की आशंका को देखते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश श्री शेखर यादव ने प्रधानमन्त्री से अपील की थी कि वह इन चुनावों को कुछ समय आगे बढ़ाने के बारे में विचार करें। श्री यादव के इस मत को केवल उत्तर प्रदेश के सन्दर्भ में रख कर ही इसलिए देखा जा सकता है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय का कार्य क्षेत्र केवल उत्तर प्रदेश तक ही सीमित है। वैसे कोरोना की तीसरी लहर की संभावना राज्यों की सीमाओं को तोड़ कर अखिल भारतीय स्तर पर व्यक्त की जा सकती है। परन्तु असली सवाल यह है कि किसी भी राज्य में चुनाव कराने का फैसला केवल चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में ही आता है और आयोग ही तय करता है कि किसी भी विधानसभा की पांच साल की अवधि समाप्त होने से पहले चुनाव किस समय कराये जाने चाहिएं जिससे नई विधानसभा का गठन समय रहते हो सके।इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मत का ख्याल रखते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त श्री सुशील चन्द्र ने राय व्यक्त की कि आयोग इस बारे मेें अगले सप्ताह ही उत्तर प्रदेश का दौरा करेगा और वहां चुनावी तैयारियों का जायजा लेगा। यह बहुत स्पष्ट है कि चुनाव आयोग ही अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए समस्त चुनावी प्रक्रिया का कर्यक्रम व रूपरेखा तैयार करता है और तदनुसार चुनाव नतीजों की घोषणा करके नई विधानसभाओं का गठन करता है। इन पांच राज्यों के चुनाव समानान्तर रूप से कराने के लिए उसे इस तरह का कार्यक्रम तैयार करना पड़ेगा जिससे मार्च महीने तक चार राज्यों को नई विधानसभा मिल सके जबकि उत्तर प्रदेश को मई महीने तक। सामान्य काल में इन विधानसभाओं के कार्यकाल को आगे बढ़ाने का कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है। अतः चुनाव आयोग को ऐसा रास्ता खोजना होगा जिससे कोरोना संक्रमण की आशंका भी कम से कम हो सके और चुनावी कार्यक्रम भी समय पर पूरा हो सके। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि चुनावी तैयारी के लिए राजनैतिक दल बड़ी-बड़ी चुनाव रैलियां या जनसभाएं करते हैं जिनमें लाखों की संख्या में लोग एकत्र होते हैं। इन जमावड़ों में लोग कोरोना अनुरूप व्यवहार नहीं करते हैं। कोरोना की दूसरी लहर के दौरान हम देख चुके हैं कि किस प्रकार यह संकमण बहुत तेजी के साथ फैला था। अतः चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश का दौरा करने से पूर्व स्वास्थ्य मन्त्रालय के अधिकारियों के साथ विचार-विमर्श करना बेहतर माना है।दूसरी लहर के दौरान जब प. बंगाल में विधानसभा चुनाव हो रहे थे तो आयोग ने रैलियों जैसे आयोजनों के बारे में संशोधनात्मक दिशा निर्देश दिये थे और मतदान केन्द्रों से लेकर मतों की गिनती होने तक के प्रबन्धन को कोरोना अनुरूप व्यवहार से बांध दिया था। हालांकि अभी तक ओमिक्रोन के इक्का-दुक्का मामले ही प्रकाश में आ रहे हैं मगर इस तीसरे कोरोना वेरियंट की भयावहता के बारे में अभी तक चिकित्सा वैज्ञानिक अधिक कुछ बताने की स्थिति में नहीं हैं सिवाय इसके कि यह पिछले वेरियंटों के मुकाबले तीन गुणा गति से फैलता है। इसे देखते हुए ही आयोग ने स्वास्थ्य मन्त्रालय से मन्त्रणा करने का विचार भी किया होगा। दरअसल कोरोना का मुद्दा राजनीति से हट कर है और इस पर किसी प्रकार की राजनीति नहीं होनी चाहिए। मगर यह भी जरूरी है कि चुनाव आयोग को सभी प्रमुख राजनैतिक दलों को बुला कर उनकी राय भी लेनी चाहिए क्योंकि अन्ततः ये राजनैतिक दल ही चुनाव लड़ते हैं।संपादकीय :कानून के दुरुपयोग से खंडित होते परिवारहरिद्वार से वैर के स्वरबच्चों को वैक्सीन का सुरक्षा कवचनया वर्ष नया संकल्पडेल्मीक्रोन : खतरनाक है संकेतम्यांमार-भारत और लोकतंत्रकोरोना निश्चित रूप से स्वतन्त्र भारत के इतिहास में ऐसी नई समस्या है जिसका पहले कोई इतिहास नहीं रहा है, अतः जो भी फैसला किया जाये वह लोकतन्त्र व लोक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए। यह युग टैक्नोलोजी का युग कहा जाता है और हमने देखा है कि किस प्रकार पहले कोरोना की पहली व दूसरी लहर के दौरान इंटरनेट का प्रयोग करते हुए रैलियां आयोजित की गई थीं। अब तो चुनाव आयोग के पास इस सम्बन्ध में पुराना अनुभव भी है। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि ''जान है तो जहान है" मगर इसके साथ यह भी पूरी तरह सच है कि 'जहान जी दारों का ही है।' अर्थात सभी चुनौतियों का मुकाबला करते हुए ही 'जहान' को जीने लायक बनाया जाता है। यह चुनाव आयोग ही है जो हमारे लोकतन्त्र की आधारशिला को मजबूत रखता है जिस पर राजनैतिक शासन व्यवस्था कायम की जाती है जो लोक कल्याण के प्रति समर्पित होती है। इस व्यवस्था को ही हम लोगों की सरकार कहते हैं जिसमें प्रत्येक मतदाता की हिस्सेदारी होती है अतः समय पर चुनाव होना भी लोकतन्त्र के 'लोक परक' रहने की जरूरी शर्त होती है जिसका सीधा सम्बन्ध दुनियादारी अर्थात जहान से ही होता है। इसीलिए मानवीय सभ्यता के विकास में राजनैतिक अधिकारों की महत्ता को सबसे ऊंचा दर्जा प्राप्त है और सच्चा लोकतन्त्र इसी का पर्याय है।

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