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विधानसभा चुनाव 2022
पिछले कुछ समय से 2024 लोकसभा चुनाव के मद्देनजर विपक्षी एकता की चर्चा बड़े जोरों से चल रही थी, विपक्षी दलों की कई बैठकें भी हुईं, पर जैसी की आशंका थी, पहले अवसर पर ही विपक्षी एकता की बात धूल चाटती नज़र आई. अगले महीने की 10 तारीख से पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव का दौर शुरू हो रहा है. विपक्षी एकता के लिए गोवा का चुनाव एक प्रयोगशाला सा बन गया था. कारण था कि अन्य चार राज्यों के मुकाबले गोवा में किसी एक दल को प्रमुख विपक्षी दल नहीं माना जा सकता और उन चार राज्यों में अन्य विपक्षी दलों का कोई आधार ही नहीं है. उदाहरण के लिए पंजाब में कांग्रेस पार्टी सत्ता में है और वहां विपक्ष के नाम पर वे दल हैं जो शायद ही भविष्य में कांग्रेस पार्टी के साथ दिखना पसंद करेंगे, जैसे कि शिरोमणि अकाली दल और आम आदमी पार्टी.
कांग्रेस से समझौता करके आज तक पछतावे में है समाजवादी पार्टी
उत्तर प्रदेश में प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी है और कांग्रेस पार्टी प्रदेश में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है. कहते हैं कि दूध का जला छाछ भी फूंक फूंक कर पीता है, समाजवादी पार्टी 2017 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी से समझौता करके आज भी पछता रही है. इसलिए समाजवादी पार्टी ने उत्तरप्रदेश में समझौता करने से पहले ही साफ़ मना कर दिया था. उत्तराखंड में कांग्रेस पार्टी प्रमुख विपक्ष दल है और आम आदमी पार्टी वहां अपना पैर ज़माने के कोशिश में लगी है. समाजवादी पार्टी, एनसीपी या तृणमूल कांग्रेस का वहां नामोनिशान नहीं है और मणिपुर में बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर है.
गोवा में स्थिति भिन्न है, इसीलिए प्रदेश को विपक्षी एकता के प्रयोगशाला के रूप में देखा जा रहा था. 2017 में गोवा के खंडित जनादेश में कांग्रेस पार्टी सबसे बड़ा दल बन कर उभरी थी और कांग्रेस आलाकमान की वजह से वहां कांग्रेस की सरकार बनते बनते रह गयी. पर कांग्रेस पार्टी पिछले पांच वर्षों में गोवा में इतनी कमजोर हो चुकी है कि राज्य में कम से कम तीन ऐसे दल हैं जो सबसे बड़े विपक्षी दल बनने की लड़ाई लड़ रहे हैं. जिसमे कांग्रेस पार्टी के साथ आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस भी सबसे बड़े विपक्षी दल बनने की दौर में शामिल हो गए हैं. गोवा में कांग्रेस के दो सहयोगी दल नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी और शिवसेना का भी थोड़ा ही सही पर आधार है और दोनों दल वहां पूर्व में भी चुनाव लड़ते रहे हैं.
आम आदमी पार्टी का स्टैंड अभी भी क्लीयर नहीं
अभी हाल ही में तृणमूल कांग्रेस ने गोवा में विपक्षी एकता की बात की और गेंद कांग्रेस पार्टी के पाले में डाल दी थी. तृणमूल कांग्रेस में विपक्ष की कमजोरी को सामने रख दिया और साफ़ साफ़ शब्दों में कहा कि प्रदेश में बीजेपी को बिना विपक्षी एकता के हराना संभव नहीं है. आम आदमी पार्टी का इसमें नाम नहीं था क्योकि आप ने अभी तक यह साफ नहीं किया है कि 2024 के प्रस्तावित विपक्षी एकता में वह शामिल होगी या नहीं, पर गोवा में तो कदापि नहीं. तृणमूल कांग्रेस के प्रस्ताव की वकालत एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार भी करते दिखे थे. पर कांग्रेस पार्टी तृणमूल कांग्रेस से इतनी नाराज़ है कि रविवार को कांग्रेस पार्टी ने गोवा में विपक्षी एकता से साफ़ साफ़ मना कर दिया. कांग्रेस पार्टी का गुस्सा जायज भी है. गोवा में तृणमूल कांग्रेस का सितम्बर के पहले नामोनिशान तक नही था. लुइज़िन्हो फलेरियो को कांग्रेस पार्टी से तोड़ कर पार्टी में शामिल किया और फिर प्रदेश में वह कांग्रेस पार्टी को कमजोर करके अपनी ताकत बढ़ाने में जुट गयी. पर जब तृणमूल कांग्रेस को लगने लगा कि अभी वह इतनी मजबूत नहीं हुयी है कि बीजेपी को चुनौती दे पाए तो विपक्षी एकता की बात छेड़ दी. ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस की मंशा यह भी लग रही है कि अगर भविष्य में विपक्षी एकता संभव ना हो सके तो इसके लिए दोषी कांग्रेस पार्टी को माना जाए.
गोवा में बीजेपी को 4 विपक्षी दल चुनौती देंगे
तृणमूल कांग्रेस की गोवा में बीजेपी के खिलाफ मोर्चा खोलने की बात और कांग्रेस पार्टी द्वारा प्रस्ताव ख़ारिज कर देने से इतना तो साफ़ हो गया है कि चाहे कांग्रेस पार्टी कितनी भी कमजोर हो चुकी हो, पर बिना कांग्रेस पार्टी के देश में विपक्षी एकता संभव नहीं है. अब कांग्रेस पार्टी द्वारा तृणमूल कांग्रेस के प्रस्ताव को ठुकराने के बाद गोवा में 14 फरवरी को होने वाले चुनाव में एक रोचक मोड़ आ गया है. लगभग सभी 40 सीटों पर कम से कम चार विपक्षी दल बीजेपी को चुनौती देते देखेंगे. कांग्रेस पार्टी और उनकी सहयोगी क्षेत्रीय दल गोवा फॉरवर्ड पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और उसकी सहयोगी क्षेत्रीय दल महाराष्ट्रवादी गोमंतक पार्टी, आमआदमी पार्टी और अगर यह पर्याप्त नहीं था तो रंग में भंग करने अब एनसीपी-शिवसेना का गठबंधन भी मैदान में होगा.
शिवसेना-एनसीपी भी दांव आजमाएंगे
तृणमूल कांग्रेस ने एनसीपी के एकलौते विधायक चर्चिल अलेमाओ को हड़प लिया, फिर भी पवार विपक्षी एकता की वकालत करते दिखे. पर जब वह कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच समझौता करवाने में असफल रहे तो अब एनसीपी और शिवसेना ने एक साथ गोवा में चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है. खबर है कि 18 जनवरी को दोनों दलों की बैठक होगी जिसमे यह तय होगा कि कौन, कितनी सीट लड़े. अभी यह नहीं पता कि एनसीपी के साथ तृणमूल कांग्रेस ने समझौता करने से मना कर दिया या फिर एनसीपी ने तृणमूल कांग्रेस से कन्नी काट ली है. भले ही एनसीपी-शिवसेना गठबंधन को गोवा में विफलता ही हाथ लगे, पर वह अन्य विपक्षी दलों का वोट को काटेगी ही. वैसे बता दें कि कुछ समय पहले ही तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी मुंबई गयीं थीं और वहां एनसीपी और शिवसेना के नेताओं से उनकी विपक्ष की एकता के बारे में चर्चा हुयी थी.
बहरहाल, कारण जो भी रहा हो, विपक्षी दलों में पहले पड़ाव पर ही फूट बीजेपी के लिए गोवा में और अगले लोकसभा चुनाव के लिए किसी शुभ समाचार से कम नहीं है. साथ ही साथ यह भी तय हो गया है कि विपक्षी एकता एक सपना है जिसे सच साबित करने की राह में अभी कई और भी अड़चने आएंगी. वैसे भी सपने टूटते ही रहते हैं. गोवा से शुरुआत हुयी है और अगले लोकसभा चुनाव तक हर उस राज्य में जहां विधानसभा चुनाव होने वाला है, बार बार विपक्षी दल आपस में टकराते दिखेंगे और केंद्र में बीजेपी की जीत की तिकड़ी का मार्ग प्रशस्त होता जाएगा.
(डिस्क्लेमर: लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं. आर्टिकल में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)
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