सम्पादकीय

शांति की राह पर आगे बढ़ता असम, उत्तर पूर्व में अलगाववादी मांगों का समाधान

Gulabi
28 Jan 2021 3:22 PM GMT
शांति की राह पर आगे बढ़ता असम, उत्तर पूर्व में अलगाववादी मांगों का समाधान
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बोडो समझौता को गृह मंत्री ने पूवरेत्तर में उग्रवाद के अंत की शुरुआत के रूप में बताया है।

जनता से रिश्ता वेबडेस्क। हाल ही में गृह मंत्री अमित शाह ने असम में पहले बीटीआर समझौता दिवस यानी बोडो टेरिटोरियल रीजन एकॉर्ड डे के अवसर पर बोडो लोगों के विकास, सुरक्षा और अधिकार को मजबूती देने के लिए पिछले साल 27 जनवरी को किए गए बोडो एकॉर्ड के मूल प्रविधानों के तहत ही बोडो लोगों को सुविधा देने के लिए भारत सरकार की प्रतिबद्धता जाहिर की। बोडो समझौता को गृह मंत्री ने पूवरेत्तर में उग्रवाद के अंत की शुरुआत के रूप में बताया है। असम सरकार द्वारा बोडो को असम की सह राज्य भाषा का दर्जा देकर वर्षो पुरानी मांग को समाप्त करने को एक उपलब्धि माना गया है। वहीं इतिहास में जाएं तो उत्तर पूर्वी भारत में नृजातीय पहचान, स्वायत्तता के लिए कई पृथकतावादी हिंसक आंदोलन में से एक प्रमुख बोडोलैंड की मांग का आंदोलन रहा है, जिससे जुड़ी उग्रवादी हिंसक गतिविधियों में हजारों लोगों की जानें जा चुकी हैं। इन्हीं कारणों से बोडो एकॉर्ड को अंजाम दिया गया। बोडो एकॉर्ड के प्रविधानों और उससे असम, बोडो और उत्तर पूर्व के राज्यों पर पड़ने वाले प्रभाव की समीक्षा से पहले संक्षेप में बोडोलैंड की मांग के बारे में जान लेना आवश्यक है।

भारत की आजादी के बाद से ही अपने विशिष्ट सामाजिक सांस्कृतिक, नृजातीय अधिकारों और पहचान के खो जाने से भयभीत उत्तर पूर्व की जनजातियों ने समूचे उत्तर पूर्व में या तो भारतीय संघ या जिस राज्य के वो भाग थे, उससे पृथक होने के लिए हिंसक अलगाववादी आंदोलन चलाया और भारतीय संघ व संविधान को चुनौती देने से भी नहीं चूके। इनमें पृथक नगा देश के लिए ग्रेटर नगालिम की मांग, मिजो राष्ट्रवाद के नाम पर पृथक मिजो राष्ट्र की मांग, स्वतंत्र और संप्रभु त्रिपुरा के लिए त्रिपुरा के उग्रवादी संगठनों की मांग और पिछली सदी के नौवें दशक में स्वतंत्र व संप्रभु असम के निर्माण के लिए उल्फा यानी यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम का गठन शामिल था। इन सभी उत्तर पूर्वी राज्यों में स्थानीय जनजातीय समुदाय के हितों की रक्षा और उससे जुड़ी मांग के लिए क्षेत्रीयतावादी व अलगाववादी मानसिकता को भड़का कर भारत सरकार के विरोध में कार्य कराने की स्थिति बनाई गई। इसी क्रम में असम में जब उल्फा ने भारत से पृथक एक संप्रभु असम के निर्माण का सपना स्थानीय लोगों के लिए देखा तो उससे अन्य क्षेत्रों में भी पृथक राज्य की मांग को बढ़ावा मिला। इसमें बोडोलैंड और एक पृथक कार्बी आंगलांग राज्य की मांग भी शामिल रहे थे।
बोडो क्षेत्रीय परिषद : बोडो एक स्वयं के क्षेत्रीय परिषद के साथ असम में सबसे बड़े मैदानी जनजाति के रूप में है। असम में रहने वाले असमी को इसे उचित तरीके से परिभाषित ही नहीं किया गया है। इसकी परिभाषा में कहा गया है कि असमी वे लोग हैं जिनकी असम में समुदाय, धर्म, जन्मस्थान, भाषा चाहे कुछ भी हो पर वो असमी भाषा को मातृभाषा या अपनी दूसरी प्रमुख भाषा के रूप में स्वीकार करते हों। असम साहित्य सभा ने भी असमी को इसी रूप में परिभाषित किया था। बोडो इस शर्त से असहज थे। लिहाजा मिजोरम और अन्य राज्यों ने भी असम द्वारा असमी भाषा थोपने को प्रमुख आधार बनाकर पृथक राज्य की मांग की पृष्ठभूमि बनाई थी।

पृथक बोडोलैंड की मांग : बोडो असम का सबसे बड़ा जनजातीय समुदाय है जो यहां की कुल जनसंख्या का करीब छह प्रतिशत है। पूर्व में इस समुदाय का असम के एक बड़े हिस्से पर नियंत्रण था। असम के चार जिलों कोकराझार, बक्सा, उदलगुड़ी और चिरांग को मिलाकर बोडो टेरिटोरियल एरिया डिस्टिक्ट (बीटीएडी) बनाया गया है, जहां कई नृजातीय समूह निवास करते हैं। वर्ष 1966 में असम में एक राजनीतिक गुट प्लेन ट्राइबल्स काउंसिल ऑफ असम (पीटीसीए) द्वारा एक पृथक राज्य बोडोलैंड की मांग की गई थी। वर्ष 1987 में ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन ने अपनी मांग को संशोधित करते हुए असम को समान रूप से दो भागों में बांटने की मांग की। असम एकॉर्ड के समय जब असमी लोगों की मांगों के संरक्षण के मुद्दों का समाधान तलाशा जा रहा था, उस समय बोडो लोगों ने भी अपनी खुद की पहचान के संरक्षण के लिए आंदोलन शुरू करने की रणनीति बनाई थी।
ऐतिहासिक बोडो एकॉर्ड 2020 : केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में करीब पांच दशकों से चले आ रहे बोडो मुद्दे के समाधान के लिए 27 जनवरी, 2020 को समझौता किया गया। इस अवसर पर गृह मंत्री ने कहा था कि जिस समस्या के कारण करीब चार हजार लोगों की जानें गईं, आज उसका एक स्थाई एवं सफल निदान हो गया है। इस समझौते में भारत सरकार और राज्य सरकार के विशेष विकास पैकेज द्वारा 1,500 करोड़ रुपये के साथ असम में बोडो क्षेत्रों के विकास के लिए विशिष्ट परियोजनाएं शुरू करना शामिल है। इसके अलावा बोडो आंदोलन में मारे गए लोगों के प्रत्येक परिवार को पांच लाख रुपये बतौर मुआवजा दिए जाने का प्रविधान है। इस समझौता ज्ञापन का उद्देश्य बीटीसी यानी बोडो टेरिटोरियल काउंसिल को कारगर बनाना है। इसके साथ बीटीएडी के बाहर रहने वाले बोडो से संबंधित मुद्दों का समाधान तथा बोडो की सामाजिक, सांस्कृतिक, भाषाई और जातीय पहचान को बढ़ावा देना व उनकी रक्षा करना भी है। समझौते के अन्य बिंदुओं में आदिवासियों के भूमि अधिकारों के लिए विधायी सुरक्षा प्रदान करना और जनजातीय क्षेत्रों का त्वरित विकास सुनिश्चित करने के साथ साथ एनडीएफबी यानी नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड गुटों के सदस्यों का पुनर्वास करना भी शामिल है।
पूर्व में 1993 और 2003 के समझौतों से संतुष्ट न होने के कारण बोडो द्वारा और अधिक शक्तियों की मांग लगातार की जाती रही और असम की क्षेत्रीय अखंडता को बरकरार रखते हुए बोडो संगठनों के साथ उनकी मांगों के लिए व्यापक समाधान के लिए बातचीत की गई। अगस्त 2019 से तमाम बोडो संगठनों के साथ दशकों पुराने बोडो आंदोलन को समाप्त करने के लिए व्यापक समाधान तक पहुंचने के लिए गहन विचार-विमर्श भी किया गया। इस समझौते से संविधान में छठी अनुसूची के अनुच्छेद 14 के तहत एक आयोग का गठन करने का प्रस्ताव है जो बहुसंख्यक गैर-आदिवासी आबादी की बीटीएडी से सटे गांवों को शामिल करने और बहुसंख्यक आदिवासी आबादी की जांच करने का काम करेगा। असम सरकार निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार बीटीएडी के बाहर बोडो गांवों के विकास के लिए एक कल्याण परिषद की स्थापना करेगी। इस समझौते के तहत नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड गुट हिंसा की राह को छोड़, आत्मसमर्पण करेंगे और इस समझौते पर हस्ताक्षर करने के एक महीने के भीतर अपने सशस्त्र संगठनों को खत्म कर देंगे।
कार्बी आंगलांग जिला असम के लगभग मध्य में स्थित है और नगालैंड से इसकी सीमा लगती है। असम में वर्ष 1951 में यूनाइटेड मिकिर एंड नॉर्थ कछार हिल्स नामक एक नए जिले का गठन किया गया था। नवंबर, 1951 में गोलाघाट जिला नगांव, कछार व यूनाइटेड खासी और जयंतिया जिले के भागों के साथ यह जिला बनाया गया था। बाद में मिकिर हिल्स और नॉर्थ कछार जिलों को अलग अलग जिला बनाया गया। फिर 1976 में इसे कार्बी आंगलांग नाम दिया गया। यह असम का सबसे बड़ा जिला है। पिछली सदी के आखिरी दशक में पृथक कार्बी राज्य की मांग के साथ सशस्त्र अतिवाद गतिविधियों की शुरुआत हुई थी। वर्ष 1996 में दो उग्रवादी गुटों कार्बी नेशनल वॉलंटियर्स और कार्बी पीपुल्स फोर्स का गठन किया गया था। वर्ष 1999 में ये दोनों गुट एक बैनर तले आए और इसका एक नाम यूनाइटेड पीपुल्स डेमोक्रेटिक सोलिडैरिटी रखा। इन्होंने पृथक राज्य के नाम पर हिंसा की। अप्रैल 1995 में कार्बी आंगलांग डिस्टिक्ट काउंसिल को एक उन्नत स्तर प्रदान करते हुए कार्बी आंगलांग स्वायत्त परिषद बनाया गया। कार्बी लोगों की आकांक्षाओं को कुछ हद तक पूरा करने की कोशिश की गई। वर्ष 2002 में इसने भारत सरकार के साथ सैन्य विराम समझौता किया, लेकिन इसके वार्ता विरोधी गुट ने कार्बी लोंगरी नॉर्थ कछार हिल्स लिबरेशन फ्रंट का गठन कर पृथक कार्बी प्रदेश की मांग को जारी रखी। वर्ष 2010 में इस नए संगठन ने भी भारत सरकार के साथ सैन्य विराम समझौता किया और इसके 400 से अधिक कैडरों ने आत्मसमर्पण किया था। इसके बाद भी यहां कई अन्य नए संगठन प्रभाव में आए और हिंसक गतिविधियों को जारी रखा।
उत्तर पूर्व की समस्या के समाधान के लिए केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए कुछ कानूनों जैसे सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम, पंचायती राज (आदिवासी क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकारों को मान्यता) अधिनियम, 2006 को तार्किक बनाते हुए नृजातीय समुदायों की हकदारी और अधिकार को सुरक्षा देने के लिए उत्तर पूर्व में स्थानीय निकायों को मजबूती देने का प्रयास किया जाना जरूरी है। इसके साथ ही पूवरेत्तर भारत में चरमपंथी और उग्रवादी मानसिकता को हटाने के लिए राज्यों की स्थानीय जनता के लिए एक ठोस पब्लिक परसेप्शन मैनेजमेंट रणनीति पर कार्य करने की जरूरत है, ताकि गुमराह युवा और अन्य उग्रवादी विकास की मुख्यधारा से जुड़ने के लिए सरकार के कार्यो पर विश्वास करते हुए आत्मसमर्पण कर सकें।
भारत सरकार ने किसी भी उग्रवादी संगठन के विभिन्न धड़ों से अलग अलग स्तरों पर वार्ता की नीति अपनाई है जो काफी हद तक सफल साबित हो रही है। इसके अलावा उत्तर पूर्व में वित्तीय समावेशन की रणनीति, बुनियादी ढांचे का विकास वहां उग्रवाद के खात्मे में कारगर साबित हो रहा है। उत्तर पूर्व की जनजातियों की संस्कृति, सभ्यता, नृजातीय पहचान, धर्म, विवाद समाधान के आदिम तरीकों, नृजातीय समुदायों के भूमि स्वामित्व और हस्तांतरण, विकास परियोजनाओं को आदिवासियों के सुरक्षा के भाव को विकसित करते हुए आगे बढ़ाने जैसी जायज मांगों और हकदारी पर उचित मानवीय मूल्य, संवेदना के साथ ही विधायन किए जाने चाहिए। विश्वास की संस्कृति के विकास से ही उत्तर पूर्व की समस्या का समग्र समाधान संभव है।


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