सम्पादकीय

2024 के चुनावों में अकेले लड़ेंगे अरविंद केजरीवाल, क्यों आप के लिए बेहतर है विपक्षी महागठबंधन से दूर रहना

Gulabi Jagat
10 May 2022 8:37 AM GMT
2024 के चुनावों में अकेले लड़ेंगे अरविंद केजरीवाल, क्यों आप के लिए बेहतर है विपक्षी महागठबंधन से दूर रहना
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आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) एक कुशल और चतुर नेता हैं
अजय झा |
आम आदमी पार्टी (AAP) के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) एक कुशल और चतुर नेता हैं, जो यह अच्छी तरह समझ चुके हैं कि दिल्ली में उनकी पार्टी को जैसे सफलता मिली, वह एक अपवाद था. उसे वह किसी चुनाव का नियम नहीं कह सकते. पंजाब (Punjab) के राजनीतिक किले को भेदने में आप को लगभग आठ साल लगे जिसमें चार चुनाव शामिल थे – दो विधानसभा और दो लोकसभा. अब पार्टी की निगाहें खुद को देश के अन्य हिस्सों में मजबूत करने पर लगी हैं और फिर लक्ष्य होगा केंद्र में सरकार बनाना.
रविवार को नागपुर में केजरीवाल ने जो बयान दिया है कि आप भारतीय विपक्ष के प्रस्तावित महागठबंधन का हिस्सा नहीं होगी, यह पार्टी की भविष्य को लेकर उनकी व्यापक योजनाओं को ही जाहिर करता है. यह उन लोगों के लिए एक झटका हो सकता है जो 2024 के संसदीय चुनावों में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को टक्कर देने के लिए प्रस्तावित महागठबंधन में आप को शामिल करने की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन केजरीवाल जानते हैं कि राजनीति का खेल 2 मिनट में नूडल्स बनाने वाला नहीं है. इसमें अपनी जगह बनाने में ही कम से कम दो साल का समय लग जाता है.
अभी आप कांग्रेस को साफ कर रही है
अब उस परिदृश्य की कल्पना करें जिसमें आम आदमी पार्टी ने महागठबंधन का हिस्सा बनने के लिए अपनी सहमति दे दी होती. जिसका मतलब होता कि उन्हें अपने गढ़ दिल्ली और पंजाब में कुछ अन्य विपक्षी दलों के साथ सीटों को साझा करना होता, राहुल गांधी या किसी अन्य गैर-बीजेपी नेता को अपने नेता के रूप में स्वीकार करना होता और इन नेताओं के नीचे की जगह मंजूर करना होता. बेशक इससे केजरीवाल के अहंकार, गौरव और संभावनाओं- सभी को ठेस पहुंचती.
अगर 'आप' ऐसा करती तो ये निश्चित तौर पर कांग्रेस पार्टी की पिछली गलतियों को दोहराने के समान होता, जब बीजेपी के विजय रथ को रोकने के नाम पर, कांग्रेस पार्टी ने क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन करना शुरू कर दिया, जिससे उसकी जगह और पुराने वोट-दोनों ही कम हो गए. और अंत में पार्टी इतनी कमजोर पड़ गई कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों के चुनावों में पूरी तरह से उसका सफाया ही हो गया.
अगर साफ शब्दों में कहा जाए तो आप अब तक केवल कांग्रेस पार्टी को सत्ता से हटाकर मजबूत हुई है, पहले दिल्ली में और हाल ही में पंजाब में. बीजेपी के साथ केजरीवाल का आमना-सामना होना अभी बाकी है. हालांकि जब भी वे बीजेपी से टकराए हैं, वहां उन्होंने अभी तक मुंह की ही खाई है – चाहे वो 2014 के आम चुनावों में नरेंद्र मोदी से मिली हार हो या फिर दिल्ली में लोकसभा चुनावों में लगातार दो बार की पराजय.
गुजरात और हिमाचल की तैयारी कर रही है आप
इन घटनाओं में केजरीवाल के लिए छोटे सबक छिपे हैं – कि आप अभी अपने शुरुआती दौर में है और बीजेपी की जगह उसके लिए कांग्रेस से मुकाबला कर उसकी जगह लेना आसान है. इस तरह बीजेपी से टक्कर लेने से पहले वह देश की बड़ी विपक्षी पार्टी के रूप में उभर सकती है. हालांकि देश में अगले दो वर्षों में संसदीय चुनाव होने से पहले यह उपलब्धि संभव नहीं है. ऐसे में केजरीवाल का यह कहना कि वे समझ नहीं पा रहे हैं कि एक व्यक्ति (मोदी) को हराने के लिए इतने सारे दलों को एकजुट क्यों होना चाहिए – तार्किक भी है और उचित भी.
इसका मतलब यह नहीं है कि वे बीजेपी को लेकर अलग राय रखते हैं या इस पार्टी से दूरी बनाकर रहना चाहते हैं. हाल के विधानसभा चुनावों में आप ने बीजेपी शासित गोवा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में अपनी चुनौती रखी थी. गोवा में अगर दो सीटों को छोड़ दिया जाए तो बाकी दो राज्यों में आप के पंख खुलने से पहले ही टूट गए. इससे प्रभावित हुए बिना आप इस साल के अंत में बीजेपी शासित राज्यों – गुजरात और हिमाचल प्रदेश में होने वाले चुनावों के लिए आप तैयारियों में जुटी है.
पांच बार लगातार चुनाव जीतकर बीजेपी पिछले 24 वर्षों से गुजरात में सत्ता में है, वहीं हिमाचल प्रदेश भी 1993 से वैकल्पिक रूप से बीजेपी और कांग्रेस पार्टी को चुन रहा है. आप को लगता है कि गुजरात में कांग्रेस की जगह लेकर वहां प्रमुख विपक्षी दल के रूप में उभरने का उसके पास पूरा मौका है, जबकि हिमाचल प्रदेश में भले ही वो नहीं जीते लेकिन अपनी सकारात्मक छवि के साथ राज्य में मौजूदगी तो वह दर्ज करवा ही सकती है. फिर भले ही आप की उपस्थिति बीजेपी विरोधी वोटों को विभाजित करके अप्रत्यक्ष रूप से उसकी मदद ही क्यों न करे. आने वाले समय में इन दोनों राज्यों में या कहां किस सीट पर कौन जीतता है, जब तक 'आप' मजबूत होकर उभरती रहती है – यह उसकी परेशानी का विषय नहीं है और न ही होना चाहिए. और यही उसका अपना मत भी है.
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