सम्पादकीय

वायु सेना दिवस विशेष : शौर्य की बुलंदी पर भारतीय वायु सेना

Rani Sahu
7 Oct 2023 7:05 PM GMT
वायु सेना दिवस विशेष : शौर्य की बुलंदी पर भारतीय वायु सेना
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‘नभ: स्पृशं दीप्तम’ अर्थात आकाश को छूने वाले दीप्तिमान। भारतीय वायुसेना का यह आदर्श वाक्य श्रीमद्भागवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय के 24वें श्लोक का भाग है तथा कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर महाभारत युद्ध से पूर्व श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश का अंश है। भारतीय वायुसेना की स्थापना ब्रिटिश साम्राज्य के दौर में आठ अक्तूबर 1932 को हुई थी। एक अप्रैल 1933 को कराची में भारतीय वायुसेना की नंबर एक स्क्वाड्रन का गठन किया गया था जिसमें छह भारतीय अधिकारी शामिल हुए थे। उन्हीं अधिकारियों में शामिल ‘सुब्रतो मुखर्जी’ ने एक अप्रैल 1954 को आजाद भारत के प्रथम भारतीय वायुसेना प्रमुख के रूप में कमान संभाली थी। दूसरी जंगे अजीम से लेकर कारगिल युद्ध तथा कई सैन्य अभियानों में भारतीय वायुसेना महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा चुकी है। द्वितीय विश्व युद्ध में उत्तरी थाईलैंड के मोर्चे पर जापानी सैन्य ठिकानों पर जोरदार हमलों को अंजाम देकर भारतीय वायुसेना के पायलटों ने अपने शौर्य पराक्रम की तस्दीक कर दी थी। भारतीय पायलटों की बहादुरी से प्रभावित होकर बर्तानिया बादशाही ने भारतीय वायुसेना को ‘रॉयल’ की उपाधि दी थी, मगर आजादी के बाद सन् 1950 में रॉयल शब्द हटा दिया गया था।
भारतीय वायुसेना की स्थापना भले ही 1932 में हुई थी, मगर भारत के चार पायलटों कृष्ण चंद्र वेंलिकर, हरिदत्त सिंह मलिक, एरोल सुवो चंद्र सेन व इंद्र लाल रॉय ने प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश वायुसेना का हिस्सा बनकर जंग में अपने जौहर दिखाए थे। प्रथम विश्व युद्ध में दुश्मन के कई फाइटर प्लेन को मार गिराकर फ्लाइट लेफ्टिनेंट इंद्र लाल रॉय 22 जुलाई 1918 को फ्रांस के वेस्टर्न फं्रट पर शहीद हो गए थे। युद्ध में वीरता का परिचय देकर शहीद हुए इंद्र लाल रॉय को बर्तानिया हुकूमत ने अपने तीसरे प्रतिष्ठित गैलेंट्री अवार्ड ‘विशिष्ट फ्लाइंग क्रॉस’ (मरणोपरांत) से अलंकृत किया था। इंद्र लाल रॉय ‘डीएफसी’ सम्मान प्राप्त करने वाले प्रथम भारतीय थे। 30 जून 1918 को कृष्ण चंद्र वेलिंकर भी प्रथम विश्व युद्ध में शहीद हो गए थे। भारत सरकार ने इंद्र लाल रॉय के सम्मान में सन् 1998 में डाक टिकट भी जारी किया था। वायुसेना दिवस के अवसर पर हिमाचल के शूरवीर वायुवीरों का जिक्र करना भी जरूरी है। हिमाचल के रणबांकुरों ने देश रक्षा के महाज पर शूरवीरता के शिलालेख लिखकर पहाड़ के शौर्य को हमेशा सर्वश्रेष्ठ साबित किया है। हिमाचल के साहसी पायलट बलदेव सिंह डोगरा ने सन् 1942 में इंडियन एयर फोर्स में भर्ती होकर दूसरी जंगे अजीम में भाग लिया था। सन् 1947-48 में कश्मीर पर पाक सेना के हमले के दौरान स्क्वाड्रन लीडर बलदेव सिंह डोगरा ने कश्मीर के ‘कोहला बाग रोड’ पर पाक लाव लश्कर पर जोरदार हवाई हमले करके पाक पेशकदमी को ध्वस्त करके कश्मीर को बचाने में अहम किरदार निभाया था। कश्मीर युद्ध में शूरवीरता का परिचय देने वाले बलदेव सिंह डोगरा को भारत सरकार ने सन् 1950 में ‘वीर चक्र’ से नवाजा था। सन् 1965 की भारत-पाक जंग में भारतीय वायुसेना का प्रंचड रूप देखने को मिला था। 1965 युद्ध में पाक सेना जम्मू के अखनूर पुल पर कब्जा करने के लिए आगे बढ़ रही थी। युद्ध में पाक थलसेना की पेशकदमी को पाक एयरफोर्स की पूरी मदद मिल रही थी। उस वक्त हिमाचल के जांबाज लड़ाकू पायलट ‘वीरेंद्र सिंह पठानिया’ ने चार सितंबर 1965 के दिन अपने फॉलैंड ग्नैट जैट के साथ छंब सेक्टर में पाकिस्तानी सेबर जेट को मार गिराकर अखनूर पुल को कब्जा करके कश्मीर फतह का ख्वाब देख रहे पाक सिपहसालारों के अरमानों को ध्वस्त कर दिया था।
रणक्षेत्र में पाक सेबर जेट के नेस्तनाबूद होने से पाक वायुसेना का एक बड़ा हमला विफल हुआ था। मैदाने जंग में अदम्य साहस का परिचय देने वाले वीरेंद्र सिंह पठानिया को ‘वीर चक्र’ से सरफराज किया गया था। 14 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान के छह एफ-86 लड़ाकू विमानों ने श्रीनगर एयरफील्ड पर हमला बोल दिया था। उस समय स्कवाड्रन लीडर वीरेंद्र सिंह पठानिया श्रीनगर एयरबेस पर टै्रफिक कंट्रोल का कार्यभार संभाल रहे थे। श्रीनगर एयरबेस पर हुए उस पाक फिजाई हमले को फ्लाइंग ऑफिसर ‘निर्मल जीत सिंह शेखों’ ने चुनौती पेश करके पाकिस्तान के दो एफ- 86 विमानों को मार गिराकर श्रीनगर एयरबेस को महफूज बचा लिया था। मगर दुश्मन के लड़ाकू विमानों का सामना करते वक्त निर्मलजीत शेखों रणभूमि में ही बलिदान हो गए थे। दुश्मन के समक्ष उच्चकोटी के शौर्य के लिए निर्मलजीत सिंह शेखों को सर्वोच्च सैन्य पदक ‘परमवीर चक्र’ (मरणोपंरात) से अलंकृत किया गया था। श्रीनगर एयरबेस पर पाक हमले को नाकाम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए विंग कमांडर वीरेंद्र सिंह पठानिया को भी ‘वायुसेना मेडल’ से सम्मानित किया गया था। कीलर बंधुओं का जिक्र किए बिना वायुसेना का इतिहास अधूरा रहेगा। स्क्वाड्रन लीडर ‘टे्रवर कीलर’ ने तीन सितंबर 1965 को छंब सेक्टर में पाक लड़ाकू एयरक्राफ्ट को जमींदोज कर दिया था। टे्रवर के बड़े भाई ‘डेंजिल कीलर’ ने 19 सितंबर 1965 को अखनूर सेक्टर में पाक सेबर जेट को मार गिराया था। दुश्मन के समक्ष बहादुरी के लिए दोनों कीलर भाईयों को ‘वीर चक्र’ प्रदान किए गए थे। 1965 की जंग में पाकिस्तान का पहला लड़ाकू एयरक्राफ्ट मार गिराने वाले पायलट टे्रवर कीलर थे तथा उसी युद्ध में पाकिस्तान का दूसरा सेबर जेट वीरेंद्र सिंह पठानिया ने ध्वस्त किया था।
नतीजतन भारतीय वायुसेना की मारक क्षमता से पाक बख्तरबंद सेना लडख़ड़ा गई थी। अफसोस रणभूमि में सदैव अपना वर्चस्व सिद्ध करने वाले वायुवीरों को भुला दिया गया। मौजूदा दौर में जंग की सूरत में वायुसेना की भूमिका बेहद अहम है। अत: आसमान की परवाज पर अदम्य साहस का परिचय देने वाली भारतीय वायुसेना का अत्यधुनिक जंगी विमानों से लैस होना अति आवश्यक है। बहरहाल वायुसेना की विजयगाथा में दास्तान-ए-शुजात की एक समृद्ध विरासत स्थापित करने वाले जांबाज वायुवीरों की शूरवीरता का इतिहास यदि शिक्षा पाठ्यक्रम में शामिल हो तो छात्र वर्ग को यकीनन प्रेरणा मिलेगी। विश्व की चौथी ताकतवर इंडियन एयर फोर्स को 91वें वायुसेना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
प्रताप सिंह पटियाल
स्वतंत्र लेखक
By: divyahimachal
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