सम्पादकीय

स्त्री के विरुद्ध

Subhi
30 Sep 2022 6:10 AM GMT
स्त्री के विरुद्ध
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महिला की सुरक्षा के लिए वह कितना खुद को जिम्मेदार मानता है और उसकी आजादी और स्वतंत्रता के लिए वह कितने प्रयास करता है। महिला सुरक्षा और महिला सम्मान एक संवेदनशील और जरूरी मुद्दा है

Written by जनसत्ता: महिला की सुरक्षा के लिए वह कितना खुद को जिम्मेदार मानता है और उसकी आजादी और स्वतंत्रता के लिए वह कितने प्रयास करता है। महिला सुरक्षा और महिला सम्मान एक संवेदनशील और जरूरी मुद्दा है, जिस पर पूरी इच्छाशक्ति के साथ काम किया जाना चाहिए। लेकिन हमारे देश में बार-बार इस तरीके की घटनाएं घटित होती हैं, जिससे हम अपने सभ्य होने का और महिला सुरक्षा का जो ढोल पीटते हैं, वह कोरा लगता है।

हाल ही में उत्तराखंड में हमने देखा कि किस तरीके से रसूखदारों के अपराध को लेकर प्रशासन का रवैया संरक्षण प्रदान करने वाला रहा और एक बेटी की किस तरीके से हत्या कर दी गई। बीते कुछ हफ्तों पर नजर डालें तो कई बातें साफ होती हैं। हाल ही में एनसीआरबी की रिपोर्ट आई है, जिसमें महिलाओं के खिलाफ अपराधों में 15.3 फीसद वृद्धि हुई है। साथ ही यह भी बताया गया है कि महिलाओं के लिए शहर असुरक्षित हैं, जिसमें देश की राजधानी जहां पर कानून का निर्माण होता है, वह इसमें अव्वल नंबर पर है।

अगर राज्यों की बात करें तो जब राजस्थान में सरकार गिराने और बचाने का सिलसिला चल रहा है, वह महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में पहले स्थान पर है, मध्य प्रदेश दूसरे स्थान पर है। इस तरीके से एक लंबी सूची तैयार होती है राज्यों की जो महिला सुरक्षा के प्रति स्थिति खराब ही प्रदर्शित करते हैं। एनसीआरबी रिपोर्ट की मानें तो 24 घंटे में 86 बलात्कारा और 206 महिलाओं का अपहरण होता है। इन आंकड़ों के आईने में 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ', नारी सम्मान, राजनीति में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी, फलां क्षेत्र में महिला का पहला कदम, जैसे नारे खोखले नजर आते हैं।

हर बार सरकारें सुरक्षा के नाम पर औपचारिक या नाममात्र की कार्रवाई कर खानापूर्ति करती रहती है, मगर वास्तविक सुधार के लिए कोई सशक्त और मजबूत प्रयास नहीं करती है, ताकि समाज में इन अपराधी और विकृत मानसिकता वाले लोगों के अंदर कानून का भय बैठ सके। हम सरकार और न्यायपालिका से ऐसी अपेक्षा करते हैं कि वे इन मामलों में ऐसी नजीर पेश करें, ताकि हम इस प्रकार की घटनाओं विराम दे सकें और सभ्य समाज का निर्माण हो सके।

केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने जुलाई 2022 की राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग जारी की है। शीर्ष 200 इंजीनियरिंग कालेजों का विश्लेषण परेशान करने वाली तस्वीर पेश करता है। श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ संस्थान ने 90.04 फीसद अंक प्राप्त किए। लेकिन 50वें सर्वश्रेष्ठ ने केवल 50.11 फीसद अंक प्राप्त किए। 100वें सर्वश्रेष्ठ संस्थान ने मात्र 40.4 फीसद अंक हासिल किए और 200वें स्थान पर रहने वाले संस्थान ने 33.7 फीसद से कम। अब कोई भी कल्पना कर सकता है कि क्या गुणवत्ता होगी शेष 1,049 संस्थानों की, जिन्होंने आवेदन किया, लेकिन उन्हें कोई रैंक नहीं मिला।

इसके अलावा, लगभग 4,500 संस्थानों में स्थिति कितनी भयानक होगी, जिन्होंने रैंकिंग के लिए आवेदन भी नहीं किया था। ये शीर्ष रैंकिंग संस्थान लगभग 30,000 छात्रों को समायोजित करते हैं। शीर्ष 100 संस्थानों में से किसी एक में सीट पाने की गुंजाइश 2.73 फीसद जितनी कम है, केवल 0.9 फीसद शीर्ष 10 संस्थानों में कोई छात्र जगह बना पाता है। लगभग 11 लाख से 12 लाख विद्यार्थी जेईई मुख्य परीक्षा के लिए पंजीकरण कराते हैं।

अब इस तरह की कड़ी प्रतिस्पर्धा में एक तरफ निराशा और लगातार परिवार का दबाव चिंता अवसाद का कारण बनता है और यहां तक कि छात्रों में आत्महत्या की प्रवृत्ति को भी जन्म देता है, पर न तो सीटों की कमी है, क्योंकि हर महानगर में तमाम सरकारी और प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेज हैं और न ही उनमें दाखिला देने की क्षमता की कमी है। पर गुणवत्ता वाली शिक्षा देने वाले संस्थानों की बहुत बड़ी कमी है। अब यह राष्ट्र पर है कि वह सर्वश्रेष्ठ और बाकी इंजीनियरिंग संस्थानों के बीच बढ़ते अंतर को कम करे और गुणवत्तापूर्ण तकनीकी उच्च शिक्षा तक पहुंच में अवसर की समानता सुनिश्चित करे।


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