सम्पादकीय

महामारी के बाद 'बच्चों की शिक्षा' हमारे सामने एक बड़ी समस्या, जीवन में गुरुतत्व टटोलें

Rani Sahu
15 Sep 2021 12:26 PM GMT
महामारी के बाद बच्चों की शिक्षा हमारे सामने एक बड़ी समस्या, जीवन में गुरुतत्व टटोलें
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एक संसारी और फकीर में क्या फर्क है, यह सवाल सालों से उठता आ रहा है

पं. विजयशंकर मेहता। एक संसारी और फकीर में क्या फर्क है, यह सवाल सालों से उठता आ रहा है। कभी आपके सामने हार्मोनियम आ जाए और यदि बजाना न आता हो, तो भी ठीक वैसा ही करिए जैसा एक अच्छा वादक करता है। आप धम्मन ठीक से चला लेंगे, उंगलियां अच्छे से जमा लेंगे, धुन भी निकलेगी, लेकिन होगी बेसुरी। लेकिन, जब वही सब क्रिया एक कुशल वादक करेगा तो सुर सही निकलेंगे। यही इस सवाल का उत्तर है।

जीवन को बेढंग से चलाना संसारी का काम है, लेकिन उसी जीवन में फकीर सुरों का तालमेल बैठाकर अच्छे-से जी लेता है। 526 साल पहले ऐसे ही एक फकीर हुए श्रीचंद्र भगवान, जिनकी आज जयंती है। अपने साहित्य मात्रावाणी में उन्होंने लिखा है- 'नानकपुता श्रीचंद्र बोले, जुगति पछाणे सो तत्व विरोले।' परमतत्व को टटोलने की युक्ति गुरुकृपा से होती है।
महामारी के बाद अब हमारे सामने एक बड़ी समस्या आ रही है बच्चों की शिक्षा को लेकर। हम भारतीय लोग स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालयों को केवल कैम्पस के रूप में नहीं देखते। इन संस्थाओं में हम गुरुतत्व देखते हैं, जो शायद दुनिया नहीं देखती। जीवन को सही ढंग से टटोलना हो तो गुरुतत्व की आवश्यकता पड़ती है। तो अब जब भी ये संस्थान खुलें, गुरु परंपरा को पुनर्जीवित करके ही खोली जाएं। बच्चों में यह भाव जगाया जाए कि वे केवल पढ़ने नहीं, जीवन को हासिल करने जा रहे हैं।


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