सम्पादकीय

अफगानिस्तान संकट : पड़ोसियों को चिंता किसकी लंका लगाएगा तालिबान

Tara Tandi
17 Aug 2021 12:35 PM GMT
अफगानिस्तान संकट : पड़ोसियों को चिंता किसकी लंका लगाएगा तालिबान
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हर कोई चिंतित है कि अफगानिस्तान

जनता से रिश्ता वेबडेस्क | शंभूनाथ शुक्ल | हर कोई चिंतित है कि अफगानिस्तान (Afghanistan) में कुछ उपद्रवी लड़ाकों की सरकार बनने से पता नहीं क्या हो. वे कोई अफगानिस्तान से ही तो संतुष्ट हो नहीं जाएंगे, आसपास के देशों में भी घुसने की चेष्टा करेंगे. भारत भी चिंतित है क्योंकि अफगानिस्तान की सीमा और भारत के बीच सिर्फ़ पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) है. पाकिस्तान (Pakistan) पर यूं भी भारत आरोप लगाता है कि वह भारत में आतंकवादियों को बढ़ावा देता है, फ़ंडिंग करता है. आशंका है कि अब वह सीधे तालिबान (Taliban) को भी भेज सकता है. मध्य एशिया के देश, रूस और ईरान भी आशंकित हैं. बस चीन ही कुछ ख़ास प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त कर रहा, जबकि ख़तरा उसको भी है. कुछ लोगों का कहना है, कि तालिबान को वह पीछे से सपोर्ट कर रहा है, उसे उम्मीद है कि ऐसा करने से उसकी उईगर मुसलमानों की समस्या समाप्त होगी. पाकिस्तान को सबसे अधिक ख़तरा है क्योंकि उसकी न सिर्फ़ सीमा मिलती है बल्कि उसके एक प्रांत ख़ैबर पख़्तूनवा पर तो अफगानिस्तान का दावा बहुत पहले से रहा है. उसका कहना है, कि अंग्रेजों ने डूरंड लाइन खींच कर अफगानिस्तान का बहुत सा इलाक़ा दाब लिया था. मगर चीन के साथ दोस्ती की ख़ातिर पाकिस्तान सरकार ने सबसे पहले इन तालिब लड़ाकों की सरकार को मान्यता दे दी है.

भले 'हम उम्मा' (पैन इस्लाम) मानने वाले दुनिया भर के मुसलमानों में परस्पर भाईचारा होने और एक-दूसरे की हां में हां मिलाने का दावा करें किंतु सत्य यह है कि हर मुस्लिम देश का पड़ोसी देश तक से याराना नहीं है. मोटे तौर पर पांच देश मुस्लिम वर्ल्ड पर अपनी हुकूमत या वर्चस्व बनाना चाहते हैं. ये हैं पाकिस्तान, अरब, टर्की और इजिप्ट या मिस्र. टर्की की एक जमाने एशिया के कई मुल्कों में हुकूमत थी और पूर्वी योरोप में भी उसका दख़ल था. अरब देशों को लगता है कि पैग़म्बर मोहम्मद का जन्म उनके मुल्क में हुआ था इसलिए इस्लामी देश उसे ही श्रेष्ठ मानें. ईरान की अभिलाषा है कि उसकी संस्कृति, इतिहास और सभ्यता अरब से श्रेष्ठ है किंतु उसे ख़िलाफ़त तक का अधिकार नहीं दिया गया. उधर इजिप्ट वह देश है जहां सभ्यताएं सबसे पहले पनपीं. पाकिस्तान इन सब में सबसे नया है मगर वह परमाणु हथियारों से लैस है इसलिए वह ख़ुद को नेता मानता है. मलयेशिया, इंडोनेशिया, मालदीव, ब्रुनेई जैसे इस्लामी देशों को ये कुछ समझते ही नहीं. इन देशों में मलयेशिया के अलावा बाक़ी किसी में इस्लाम को लेकर न कट्टरता है न वे वर्चस्व की रेस में हैं.
पाकिस्तान चौधरी बनने की कोशिश भले करे किंतु उसकी फटेहाली उसकी महत्त्वाकांक्षा के आड़े आती है. इसीलिए उसे कभी अमेरिका तो कभी चीन के समक्ष हाथ फैलाना पड़ता है. अरब देश उस पर भरोसा नहीं करते क्योंकि यमन युद्ध के दौरान उसने अरब को सैन्य मदद करने से इनकार कर दिया था. ईरान भी उस पर भरोसा नहीं करता और इसकी वज़ह है पाकिस्तान में शिया मुसलमानों के साथ हो रहा भेदभाव. टर्की अपने को एथिनिक रूप से यूरोप से जोड़ता है, इसलिए उसे भी पाकिस्तान से कोई अनुराग तो नहीं लेकिन पाकिस्तान की परमाणु क्षमता उसे आकर्षित करती है. पर वर्चस्व वह पाकिस्तान के हाथों में देने से रहा. ऐसे में पाकिस्तान की मजबूरी है कि वह कम्युनिस्ट चीन के ख़ेमे में जाए. उसे वहां से भले ज़्यादा ब्याज पर हो क़र्ज़ की उम्मीद है.
पाकिस्तान की अंदरूनी स्थिति यह है कि न तो वहां सिविलियंस की हुकूमत है न सेना की. वहां पर सारे लोकप्रिय नेताओं को या तो मार दिया गया है या वे ख़ुद पाकिस्तान से बाहर चले गए. सेना की साख भी धूल-धूसरित है. भ्रष्टाचार ने उसके अंदर ऐसी पैठ बना ली है कि जनरल बाजवा ख़ुद मुंह छिपाए हैं. इमरान ख़ान की जनता के बीच पैठ नहीं है, वे एक कठपुतली शासक हैं. ऐसे में अगगानिस्तान में तालिबान की निंदा उनको भारी पड़ सकती है. इसलिए उन्होंने तालिबान की खुल कर प्रशंसा की है. उनको लगता है कि कोई संकट में पड़ा तो चीन उसे बचाएगा.
अफगानिस्तान में कबीलों का शासन है. बीसवीं सदी की शुरुआत में वहां पर जो भी सामाजिक सुधार के कार्यक्रम चले वे सब के सब बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में ही बिखर चुके थे. और यह कोई आज से नहीं मध्य काल से ही अफ़ग़ान कबीले इसके या उसके लिए लड़ते रहे. कभी वे ईरान के शासकों के लिए लड़ते तो कभी ओटोमन साम्राज्य के लिए. उन्होंने लड़ने के अलावा और कुछ सीखा ही नहीं. उनकी इस हालत के लिए अफगानिस्तान का भूगोल भी सहायक रहा है. कृषि के लिए यहां की भूमि सर्वथा अनुपयुक्त है. बर्फ़ है, पठार है, ऊंची-ऊंची पर्वत श्रेणियां हैं. अभी तक कोई तेल या खनिज का पता वहां नहीं चला है. इसलिए अफगानिस्तान का इस्तेमाल सदैव बफ़र स्टेट के रूप में हुआ है. उसकी सामरिक स्थिति ऐसी है कि यह देश महाशक्तियों के मध्य में है. अरब, ईरान, चीन और रूस पर नज़र रखने के लिए यह अमेरिका की ज़रूरत है तो चीन और रूस के बीच भी यह एक ऐसा स्टेट है जिसके ज़रिए एक-दूसरे की गतिविधियों पर नज़र रखी जा सकती है. यही कारण है कि मानवाधिकार का कोई भी पैरोकार तालिबान के विरुद्ध कुछ नहीं बोल रहा.
भारत ने भी अभी तालिबान को लेकर कोई फ़ैसला नहीं किया है, जबकि किसी भी क्षण तालिबान वहां सरकार बना सकती है. कोई भी देश अफगानिस्तान के इस अंदरूनी खून-ख़राबे पर कुछ नहीं बोलना चाहता. जिन अशरफ़ गनी पर अफ़ग़ानी जनता को भरोसा थे, वे पहले ही अपने हवाई जहाज़ में नोटों से भरी अटैचियां रख कर भाग निकले. इससे भी ज़ाहिर है कि पिछली तालिबान सरकार से अमेरिका की सेना निपट नहीं पाई थी. न कूटनीति रूप से न राजनीतिक रूप से. मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अचानक अमेरिकी सेना को अफगानिस्तान से हटाने का फ़ैसला कर एक तरह से संकेत दे दिया था कि वे अब अफगानिस्तान को उसके हाल पर छोड़ देना चाहते हैं.
अब यह फ़ैसला उन्होंने चीन के बढ़ते दबाव में आ कर किया या उन्हें लग गया था कि उनकी अफगानिस्तान नीति नाकाम रही है, यह साफ़ नहीं हुआ है. लेकिन जब तालिबान ने कहा था कि अमेरिकी सेना के हटते ही 15 दिन के भीतर ही अशरफ़ गनी सरकार को उखाड़ फेकेंगे तब जो बाइडेन ने जवाब दिया था कि अफगानिस्तान की सरकार और सेना तालिबान से निपट लेगी. यह उनका बड़बोलापन था. उन्हें हालात की ज़मीनी जानकारी नहीं थी. नतीजा यह हुआ कि अमेरिकी सेना के हटने के ढाई महीने बाद ही अफगानिस्तान के राष्ट्रपति भाग निकले. ज़ाहिर है अफगानिस्तान के लोगों को अमेरिकी राष्ट्रपति समझ नहीं पाए और अफ़ग़ानी लोगों को भंवर में छोड़ गए.
कोरोना के बाद जिस तरह से दुनिया में शक्ति और धन का जो खेल शुरू हुआ है, उसमें अमेरिका की यह सबसे क़रारी हार है. अब भविष्य में कोई देश कैसे अमेरिका पर भरोसा करेगा! चीन के पाले में उसने गेंद डाल दी है. पूरी दुनिया को पता है कि चीन न अपने विरोधियों पर भरोसा करता है न दोस्तों पर. वह सिर्फ़ अपनी चलाता है. चीन की एक परंपरा सदियों पुरानी है और वह यह कि संसाधनों पर क़ब्ज़ा सिर्फ़ सर्वोच्च शासक का होता है. लोकतंत्र की भावना चीन के खून में नहीं है. पाकिस्तान की हालत चीन की इसी मानसिकता को स्पष्ट करती है. जब से वह चीन के पाले में आया है तब से वह कठपुतली बनता जा रहा है. उसे समझ नहीं आ रहा कि तालिबान की तरफ़दारी से वह चीन का करीबी भले बन जाए पर चीन उसकी मदद करने से रहा. उधर ये तालिबानी लड़ाके पाकिस्तान से उसके एटमी हथियार हड़पने की जुगत में हैं.


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