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बेहद खूबसूरत लगती है नॉर्दर्न लाइट्स, क्या आप जानते हैं कैसे बनती है? वैज्ञानिकों ने अब इस राज से हटाया पर्दा

Gulabi
8 Jun 2021 12:12 PM GMT
बेहद खूबसूरत लगती है नॉर्दर्न लाइट्स, क्या आप जानते हैं कैसे बनती है? वैज्ञानिकों ने अब इस राज से हटाया पर्दा
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औरोरा बोरियालिस (Aurora Borealis) या नॉर्दर्न लाइट्स (Northern Lights) प्रकृति की खूबसूरती को दिखाती हैं

औरोरा बोरियालिस (Aurora Borealis) या नॉर्दर्न लाइट्स (Northern Lights) प्रकृति की खूबसूरती को दिखाती हैं. इन्हें पृथ्वी के सबसे बड़े लाइट शो के तौर पर माना जाता है. धरती के उच्च अक्षांशों पर होने वाली इस घटना ने सदियों से वैज्ञानिकों को हैरान किया है. अभी तक ये नहीं मालूम था कि आखिर वो क्या वजह है, जो नॉर्दर्न लाइट्स को पैदा करती है. हालांकि, अब जाकर इस सवाल का जवाब ढूंढ़ लिया गया है.


यूनिवर्सिटी ऑफ आयोवा के फिजिसिस्ट के एक ग्रुप ने आखिरकार ये साबित कर दिया है कि नॉर्दर्न लाइट्स जियोमैग्नेटिक स्टॉर्म के दौरान शक्तिशाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव्स की वजह से पैदा होते हैं. एक नए अध्ययन में इसकी जानकारी दी गई है.


इस अध्ययन में बताया गया है कि इस घटना को अल्फवेन वेव्स (Alfven waves) के तौर पर भी जाना जाता है. ये घटना इलेक्ट्रॉन को पृथ्वी की ओर भेजने लगती है. इस वजह से पार्टिकल्स रोशनी पैदा करने लगते हैं, जिन्हें हम नॉर्दर्न लाइट्स के रूप में जानते हैं.


अध्ययन के सह-लेखक और प्रोफेसर ग्रेग होवेस ने कहा, हमें पता चला कि इलेक्ट्रॉन्स की छोटी आबादी अल्फवेन वेव्स की इलेक्ट्रिक फील्ड से तेजी से गुजरती है. ये कुछ ऐसा है, जैसे एक सर्फर एक लहर को अपने सर्फबोड के जरिए पकड़ने का प्रयास कर रहा है. लेकिन उसकी रफ्तार बढ़ती जा रही है क्योंकि वह लहर के साथ आगे बढ़ रहा है.

इलेक्ट्रिक फील्ड पर इलेक्ट्रॉन्स के सर्फिंग की ये थ्योरी सबसे पहले 1946 में एक रूसी फिजिसिस्ट लेव लैंडो ने दी थी. इसे लैंडो डंपिंग नाम दिया गया. इस तरह अब वैज्ञानिकों ने उनके इस सिद्धांत को साबित कर दिया है.
वैज्ञानिकों ने दशकों से ये समझने का प्रयास किया है कि नॉर्दर्न लाइट्स की सबसे अधिक संभावना कैसे बनती है. लेकिन अब वे इसे पहली बार लैब में तैयार करने में कामयाब भी हुए हैं. उन्होंने UCLA की बेसिक प्लाज्मा साइंस फैसिलिटी में लार्ज प्लाज्मा डिवाइस (LPD) की एक लैब में इसे तैयार किया.


वैज्ञानिकों ने UCLA के LPD पर 20 मीटर लंबे चैंबर का शक्तिशाली मैग्नेटिक फील्ड कॉइल के जरिए पृथ्वी के मैग्नेटिक फील्ड को फिर से बनाने के लिए प्रयोग किया. इस चैंबर के भीतर वैज्ञानिकों ने वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के पास अंतरिक्ष में मौजूद होने वाले प्लाज्मा को तैयार किया.

प्रोफेसर ग्रेग होवेस ने कहा, विशेष रूप से डिजाइन किए गए एंटीना का प्रयोग करके हमने मशीन के नीचे अल्फवेन वेव्स को लॉन्च किया. इस दौरान वेव्स एक नली से यात्रा कर रही थीं. जैसे ही उन्होंने वेव्स को इलेक्ट्रॉन्स के साथ सर्फिंग करते हुए देखा. उन्होंने तुरंत ये मापने के लिए एक विशेष उपकरण का प्रयोग किया कि वे इलेक्ट्रॉन वेव्स कैसे ऊर्जा प्राप्त कर रहे हैं.
हालांकि, इस एक्सपेरिमेंट के जरिए वैज्ञानिक बिल्कुल नॉर्दर्न लाइट जैसी रोशनी को तैयार नहीं कर पाए. प्रोफेसर ग्रेग होवेस ने कहा, लैब में हमारे माप कंप्यूटर सिमुलेशन और गणितीय गणनाओं की भविष्यवाणियों से स्पष्ट रूप से सहमत हैं. ये साबित करते हैं कि अल्फवेन वेव्स पर सर्फ करने वाले इलेक्ट्रॉन इलेक्ट्रॉन्स की गति को तेज कर सकते हैं. इस वजह से ही नॉर्दर्न लाइट्स बनती है.
इस जानकारी के सामने आने के बाद अमेरिका समेत दुनियाभर के वैज्ञानिक काफी उत्साहित हैं. NASA के एक वैज्ञानिक पैट्रिक कोहेन ने कहा कि मैं बहुत ज्यादा उत्साहित हूं. एक लैब में प्रयोग को देखना एक बहुत ही दुर्लभ चीज है जो अंतरिक्ष पर्यावरण से संबंधित सिद्धांत या मॉडल पर आधारित हो.
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