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आज ही के दिन भारत में हुई थी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना

Gulabi
24 May 2021 4:59 PM GMT
आज ही के दिन भारत में हुई थी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना
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अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना

भारत के उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ (Aligarh) में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) केवल मुस्लिम समुदाय के लिए ही प्रमुख यूनिवर्सिटी नहीं हैं बल्कि ये देश की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर है. इसकी स्थापना ऐसे में हुई थी जब मुस्लिम समुदाय में आधुनिक शिक्षा को बहुत सम्मान के नजरिए से नहीं देखा जाता था. ऐसे में सर सैयद अहमद खान (Sir Syed Ahmed Khan) के प्रयासों से अलीगढ़ में मुस्लिमों के कॉलेज की स्थापना की गई जो 24 मई 1920 को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में बदल गई.


को यूनिवर्सिटी में बदला गया कॉलेज

सर सैयद अहमद खान आधुनिक मुस्लिम शिक्षा के बहुत बड़े पैरोकार थे. उन्होंने 1857 की क्रांति के बाद मुसलमानों के लिए स्कूल खोलने से शुरुआत की. इसके बाद 1877 में उन्होंने अलीगढ़ में मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना की. यही कॉलेज 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में तब्दील हो गया.

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से आया विचार
मुस्लिमों के लिए यूनिवर्सिटी खोलने का विचार सर सैयद अहमद को ब्रिटेन में आया था. वे जब आधुनिक शिक्षा के समझने के लिए ब्रिटेन गए तो वहां वे डेढ़ साल तक ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में रहे और शिक्षा पद्धतियों को समझा. इसके बाद वहां से कॉलेज खोलने का इरादा लेकर वे भारत लौटे और पांच साल में ही कॉलेज की स्थापना की.

अलीगढ़ ही क्यों

सर सैयद अहमद का इरादा था कि यूनिवर्सिटी ऐसी जगह बनाई जाए जहां का वातावरण बहुत ही अच्छा हो. इसके लिए उन्होंने एक तीन सदस्यीय कमेटी बनाई जिसने अलीगढ़ का चुनाव किया. जो आवागमन की सुविधाओं के लिहाज से बढ़िया था. यहां ग्रांड ट्रंक रोड बन चुकी थी. रेलवे ट्रैक पहले से ही था. इसके अलावा हजरत अली का नाम पर बने शहर को मुस्लिमों के लिए प्रेरक तत्व माना गया जिन्हें इस्लाम में ज्ञान का द्वार माना जाता है.

चंदा लेने के लिए नए-नए तरीके

सर सैयद अहमद को यूनिवर्सिटी खोलने का बहुत जुनून था. इसके लिए उन्होंने नाटकों का मंचन कराया और कई जगहों से चंदा लिया. चंदे के लिए उन्होंने कई तरीके तक ईजाद किए. यहां तक की उन्होंने भीख तक मांगी और ऐसी जगह चंदा लेने चले जाते थे जहां आम लोग जाना पसंद नहीं करते थे. इसमें तयावफों के कोठे तक शामिल थे. बताया जाता है कि इसके लिए वे एक लैला-मंजनू नाटक में लैला का किरदार तक निभा गए थे.
हिंदुओं के लिए भी यूनिवर्सिटी

वैसे तो बहुत सारे ऐसे किस्से हैं जिनसे लगता है कि सर सैयद अहमद मुस्लिमों की पैरवी के लिए हिंदुओं तक का विरोध किया करते थे. लेकिन उन्होंने अपने अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में हिंदुओं के लिए भी दरवाजे खोले और हिंदू और मुसलमानों में किसी तरह के भेद नहीं किया. उनकी यूनिवर्सिटी की पहला ग्रेजुएट ईश्वरी प्रसाद नाम का हिंदू शख्स था.
बहुत सारे फतवे झेलते रहे

जब सर सैयद अहमद ने मुस्लिमों को अंग्रेजी के साथ आधुनिक शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए कॉलेज की नींव डाली तो खुद धार्मिक मुसलमानों ने उनकी बहुत आलोचना की. मुसलमान उन्हें कुफ्र का फ़तवा देते रहे. तब उन्हें मौलवी काफिर भी कहते थे. उन्हें उर्दू भाषा का बहुत बड़ा पैरोकार माना जाता है. वे खुद गणित, चिकित्सा और साहित्य सहित कई विषयों में पारंगत थे.

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उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दो दशक अलीगढ़ में बिताए थे. अलीगढ़ में कॉलेज स्थापित करने के बाद 1898 में उनका निधन हो गया और वे अपनी आंखो के सामने यूनिवर्सिटी बनते नहीं देख सके थे जिसका सपना उन्होंने ऑक्सफोर्ड में देखा था. वे चाहते थे कि उनकी यूनिवर्सटी को ऑक्सफोर्ड ऑफ द ईस्ट का दर्जा मिले.
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