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शी जिनपिंग की 7 साल बाद वापसी भारत भी नया चीन भी बदला

Ratna Netam
12 Sept 2026 3:11 PM IST
शी जिनपिंग की 7 साल बाद वापसी भारत भी नया चीन भी बदला
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नई दिल्ली। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग करीब सात साल बाद भारत पहुंचे हैं। उनकी यह यात्रा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछली भारत यात्रा के बाद से न केवल भारत-चीन संबंधों में भारी उतार-चढ़ाव आया, बल्कि पूरी दुनिया की भू-राजनीतिक और आर्थिक तस्वीर भी बदल चुकी है। 2019 में जब शी जिनपिंग भारत आए थे, तब चेन्नई के पास महाबलीपुरम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी अनौपचारिक शिखर बैठक हुई थी। उस समय दोनों देशों के बीच मतभेद जरूर थे, लेकिन रिश्तों में संवाद और सहयोग की संभावनाएं भी मजबूत दिखाई दे रही थीं।
सात साल बाद परिस्थितियां बिल्कुल अलग हैं। इस दौरान पूर्वी लद्दाख में सीमा तनाव हुआ, गलवान घाटी में हिंसक झड़प हुई, दोनों देशों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC पर बड़ी संख्या में सैनिक तैनात किए और द्विपक्षीय संबंध दशकों के सबसे कठिन दौर से गुजरे। दूसरी तरफ भारत आर्थिक, सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर बदला है तो चीन को भी घरेलू अर्थव्यवस्था, अमेरिका के साथ प्रतिस्पर्धा और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव जैसी नई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।
यानी शी जिनपिंग जिस भारत में इस बार आए हैं, वह कई मायनों में 2019 वाला भारत नहीं है और जिस चीन का वह नेतृत्व कर रहे हैं, उसकी परिस्थितियां भी सात साल पहले जैसी नहीं हैं।
2019 में कैसा था भारत-चीन रिश्ता?
अक्टूबर 2019 में शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महाबलीपुरम में मुलाकात हुई थी। यह दोनों नेताओं के बीच दूसरी अनौपचारिक शिखर बैठक थी। इससे पहले 2018 में चीन के वुहान में दोनों नेता मिले थे।
उस दौर में भारत और चीन सीमा विवाद के बावजूद रिश्तों को स्थिर रखने की कोशिश कर रहे थे। व्यापार बढ़ रहा था और दोनों देश BRICS, शंघाई सहयोग संगठन तथा G20 जैसे बहुपक्षीय मंचों पर साथ काम कर रहे थे।
डोकलाम विवाद के बाद वुहान और फिर महाबलीपुरम की बैठकों को रिश्तों में स्थिरता लाने की कोशिश के रूप में देखा गया था। लेकिन महाबलीपुरम बैठक के कुछ ही महीनों बाद परिस्थितियां तेजी से बदलने लगीं।
2020 के गलवान संघर्ष ने बदल दिए रिश्ते
भारत-चीन संबंधों में सबसे बड़ा बदलाव 2020 में पूर्वी लद्दाख में आया। LAC के कई क्षेत्रों में दोनों देशों की सेनाओं के बीच तनाव बढ़ गया।
15 जून 2020 की रात गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई। इसमें भारत के 20 सैनिक शहीद हुए। चीन ने बाद में अपने चार सैनिकों की मौत की आधिकारिक जानकारी दी।
इस घटना ने भारत-चीन संबंधों को गहरा झटका दिया। दशकों बाद सीमा पर इस तरह की जानलेवा हिंसा हुई थी।
इसके बाद भारत ने स्पष्ट किया कि सीमा पर शांति और स्थिरता के बिना दोनों देशों के व्यापक संबंध सामान्य नहीं हो सकते। सैन्य कमांडर और राजनयिक स्तर पर कई दौर की बातचीत शुरू हुई और कुछ टकराव वाले क्षेत्रों से सैनिक पीछे हटे।
अब सीमा को लेकर भारत का रुख ज्यादा स्पष्ट
2019 की तुलना में भारत अब चीन के साथ संबंधों में सीमा के मुद्दे को कहीं ज्यादा प्रमुखता देता है। नई दिल्ली का लगातार कहना रहा है कि द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने के लिए सीमा क्षेत्रों में शांति आवश्यक है।
यह भारत की चीन नीति में महत्वपूर्ण बदलाव है। आर्थिक संबंधों और सीमा विवाद को पूरी तरह अलग-अलग रखकर आगे बढ़ना अब पहले जितना आसान नहीं माना जाता।
सीमा पर भारत ने सड़कों, पुलों, सुरंगों और दूसरी रणनीतिक बुनियादी सुविधाओं के निर्माण की गति भी तेज की है। सीमावर्ती इलाकों तक सैन्य बल और उपकरण तेजी से पहुंचाने की क्षमता बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया है।
आर्थिक रूप से भी बदल चुका है भारत
2019 के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था ने कोविड महामारी सहित कई वैश्विक झटकों का सामना किया। इसके बावजूद भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश करता रहा है।
मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव यानी PLI जैसी योजनाएं लाई गईं। इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल फोन निर्माण में भारत की भूमिका बढ़ी। सरकार सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन और स्वच्छ ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में घरेलू क्षमताओं के विस्तार पर जोर दे रही है।
चीन पर अत्यधिक निर्भरता कम करने और सप्लाई चेन में विविधता लाने की वैश्विक कोशिशों ने भी भारत के लिए नए अवसर पैदा किए हैं।
हालांकि भारत और चीन का व्यापारिक रिश्ता अब भी बेहद बड़ा है और कई औद्योगिक क्षेत्रों में चीनी आयात की महत्वपूर्ण भूमिका बनी हुई है।
चीन को लेकर निवेश नीति भी हुई सख्त
2020 के बाद भारत ने पड़ोसी देशों से आने वाले निवेश के लिए सरकारी मंजूरी की व्यवस्था को कड़ा किया। इसका प्रभाव चीनी निवेश पर भी पड़ा।
इसके अलावा भारत ने राष्ट्रीय सुरक्षा और डेटा संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए कई चीनी मोबाइल ऐप पर प्रतिबंध लगाए। टेलीकॉम और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में भी चीनी कंपनियों की भूमिका को लेकर ज्यादा सावधानी दिखाई गई।
इससे साफ हुआ कि आर्थिक संबंधों में भी राष्ट्रीय सुरक्षा भारत की नीति का बड़ा हिस्सा बन चुकी है।
अमेरिका के साथ भारत के रिश्ते हुए मजबूत
2019 के बाद भारत और अमेरिका के रणनीतिक संबंधों में भी तेजी आई है। रक्षा, महत्वपूर्ण तकनीक, सेमीकंडक्टर और इंडो-पैसिफिक जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ा है।
भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के समूह Quad की गतिविधियां भी इस दौरान अधिक प्रमुख हुईं। चीन Quad को अपने रणनीतिक हितों के संदर्भ में संदेह की नजर से देखता रहा है।
हालांकि भारत अपनी विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता पर जोर देता है। रूस के साथ उसके पुराने संबंध बने हुए हैं और BRICS तथा SCO जैसे मंचों पर वह चीन के साथ भी काम करता है।
यही बहुस्तरीय विदेश नीति आज के भारत को 2019 की तुलना में अलग स्थिति में खड़ा करती है।
लेकिन सिर्फ भारत नहीं, चीन भी बदल चुका है
इन सात वर्षों में चीन के भीतर भी काफी बदलाव आया है। कोविड महामारी और कठोर प्रतिबंधों के बाद चीनी अर्थव्यवस्था को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। प्रॉपर्टी सेक्टर की समस्याएं, स्थानीय सरकारों का कर्ज, कमजोर घरेलू मांग और जनसांख्यिकीय दबाव चीन के सामने प्रमुख आर्थिक मुद्दे बने।
चीन की अर्थव्यवस्था अभी भी दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और उसका विशाल औद्योगिक आधार बरकरार है। इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, सोलर पैनल और कई उन्नत तकनीकी क्षेत्रों में चीन ने अपनी क्षमता और बढ़ाई है।
यानी चीन कमजोर नहीं हुआ है, लेकिन उसके सामने चुनौतियों का स्वरूप 2019 की तुलना में बदल चुका है।
अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा हुई कहीं ज्यादा तीखी
2019 में भी अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वॉर चल रहा था, लेकिन बाद के वर्षों में यह मुकाबला तकनीक और राष्ट्रीय सुरक्षा तक फैल गया।
सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, उन्नत चिप निर्माण और महत्वपूर्ण खनिजों तक पहुंच दोनों देशों की प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बन गई। ताइवान और दक्षिण चीन सागर भी लगातार संवेदनशील मुद्दे बने रहे।
इस माहौल में चीन ने ग्लोबल साउथ, BRICS और अन्य बहुपक्षीय मंचों पर अपनी कूटनीतिक सक्रियता बढ़ाई है। भारत भी इन्हीं मंचों पर बड़ी भूमिका चाहता है।
BRICS भी अब पहले जैसा नहीं
2019 के बाद BRICS का स्वरूप भी बदल चुका है। समूह का विस्तार हुआ और नए देशों को इसमें शामिल किया गया। इससे BRICS की वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक भूमिका पर चर्चा बढ़ी है।
भारत BRICS को विकासशील देशों के हितों और वैश्विक संस्थाओं में सुधार की आवाज उठाने के मंच के रूप में देखता है। वहीं चीन भी इसे पश्चिम-केंद्रित वैश्विक व्यवस्था के विकल्पों को मजबूत करने के लिए महत्वपूर्ण मानता है।
दोनों देशों की सोच हर मुद्दे पर समान नहीं है, लेकिन कई वैश्विक विषयों पर उनके हित एक-दूसरे से मिलते भी हैं।
प्रतिस्पर्धा भी और सहयोग की जरूरत भी
भारत और चीन के रिश्ते की सबसे बड़ी जटिलता यही है कि दोनों एक साथ पड़ोसी, प्रतिस्पर्धी, बड़े व्यापारिक साझेदार और कई अंतरराष्ट्रीय मंचों के सदस्य हैं।
दोनों के बीच सीमा विवाद है और एशिया में रणनीतिक प्रभाव को लेकर प्रतिस्पर्धा भी है। दूसरी तरफ जलवायु परिवर्तन, वैश्विक अर्थव्यवस्था, व्यापार और बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार जैसे विषयों पर दोनों को एक-दूसरे से संवाद करना पड़ता है।
इसी वजह से भारत-चीन संबंधों को केवल दोस्ती या दुश्मनी के चश्मे से समझना मुश्किल है।
सात साल बाद शी की यात्रा क्यों खास?
शी जिनपिंग की सात साल बाद भारत यात्रा उस समय हो रही है जब दोनों देश 2020 के तनाव के बाद रिश्तों को स्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इस बार बातचीत की पृष्ठभूमि महाबलीपुरम से बिल्कुल अलग है।
भारत अब सीमा पर यथास्थिति और शांति को रिश्तों के लिए महत्वपूर्ण मानता है। चीन अमेरिका के साथ बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच भारत जैसे बड़े पड़ोसी के साथ संबंधों को संभालना चाहता है। दोनों देश वैश्विक अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण खिलाड़ी हैं और ग्लोबल साउथ में अपनी भूमिका बढ़ाना चाहते हैं।
इसलिए शी की यह यात्रा प्रतीकों से आगे वास्तविक परिणामों की कसौटी पर देखी जाएगी।
2019 से 2026: सात वर्षों में बदल गई पूरी तस्वीर
2019 में मोदी और शी की महाबलीपुरम मुलाकात के दौरान बातचीत का जोर आपसी विश्वास बढ़ाने पर था। 2026 में दोनों देशों के सामने उस विश्वास को दोबारा बनाने की बड़ी चुनौती है।
गलवान के बाद भारत में चीन को लेकर रणनीतिक सोच बदली है। सीमा पर बुनियादी ढांचा मजबूत हुआ है, अमेरिका और अन्य इंडो-पैसिफिक देशों के साथ सहयोग बढ़ा है तथा महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता पर जोर बढ़ा है।
दूसरी तरफ चीन भी आर्थिक चुनौतियों, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और अमेरिका के साथ लंबे रणनीतिक मुकाबले के नए दौर में प्रवेश कर चुका है।
यही वजह है कि सात साल बाद शी जिनपिंग का भारत आना केवल एक और कूटनीतिक यात्रा नहीं है। यह दो ऐसे एशियाई दिग्गजों की मुलाकात है जो 2019 के मुकाबले ज्यादा शक्तिशाली, ज्यादा प्रतिस्पर्धी और एक-दूसरे को लेकर ज्यादा सतर्क हैं। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या दोनों देश पिछले सात वर्षों के तनाव से आगे निकलकर रिश्तों के लिए कोई स्थायी रास्ता खोज पाएंगे या रणनीतिक प्रतिस्पर्धा आने वाले वर्षों में भी भारत-चीन संबंधों की दिशा तय करती रहेगी।
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