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दिल्ली-एनसीआर
अपहरण और दुष्कर्म केस में 20 साल बाद पलटा फैसला, दिल्ली हाई कोर्ट ने आरोपी को किया बरी
nidhi
24 July 2026 6:38 AM IST

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दिल्ली हाई कोर्ट ने अपहरण और दुष्कर्म के मामले में 20 साल बाद दोषी को किया बरी
DELHI-NCR: दिल्ली हाई कोर्ट ने करीब 20 साल पुराने अपहरण और दुष्कर्म के मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए निचली अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए व्यक्ति को बरी कर दिया। अदालत ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और अभियोजन पक्ष की दलीलों का विस्तृत परीक्षण करने के बाद पाया कि आरोपी के खिलाफ दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि केवल संदेह के आधार पर नहीं की जा सकती। अभियोजन पक्ष को आरोपों को संदेह से परे साबित करना होता है। यदि साक्ष्यों में गंभीर विरोधाभास या संदेह की स्थिति हो, तो उसका लाभ आरोपी को दिया जाना चाहिए।
20 साल पुराने मामले में आया अहम फैसला
यह मामला लगभग दो दशक पहले दर्ज किया गया था, जिसमें आरोपी पर एक महिला के अपहरण और दुष्कर्म का आरोप लगाया गया था। ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को दोषी करार दिया था। हालांकि, आरोपी ने इस फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी।
लंबी कानूनी प्रक्रिया और सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले की समीक्षा की और अंततः आरोपी को बरी कर दिया।
हाई कोर्ट ने किन आधारों पर दी राहत?
फैसले में अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों और गवाहियों का गहन विश्लेषण करने पर कई महत्वपूर्ण विसंगतियां सामने आईं। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को आवश्यक कानूनी मानक के अनुरूप साबित नहीं कर सका।
कोर्ट ने दोहराया कि भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली का मूल सिद्धांत है कि यदि किसी मामले में उचित संदेह की गुंजाइश हो, तो उसका लाभ आरोपी को मिलना चाहिए।
साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर उठे सवाल
हाई कोर्ट ने यह भी देखा कि मामले में प्रस्तुत कुछ गवाहियों और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों में एकरूपता का अभाव था। अदालत ने कहा कि केवल आरोप लग जाना किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है।
न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि दोषसिद्धि के लिए अभियोजन को ऐसा सशक्त और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करना होता है जिससे आरोपी का अपराध संदेह से परे सिद्ध हो सके।
कानूनी सिद्धांतों को दोहराया
अपने फैसले में हाई कोर्ट ने आपराधिक न्याय के स्थापित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि—
आरोपी को तब तक निर्दोष माना जाता है, जब तक उसका अपराध अदालत में सिद्ध न हो जाए।
दोषसिद्धि के लिए अभियोजन पर प्रमाण का दायित्व होता है।
संदेह का लाभ हमेशा आरोपी को दिया जाता है।
न्यायालय केवल कानूनी रूप से स्वीकार्य और विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर ही फैसला देता है।
फैसले का कानूनी महत्व
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला इस सिद्धांत को मजबूत करता है कि न्यायालय हर मामले में तथ्यों और साक्ष्यों का स्वतंत्र मूल्यांकन करता है। गंभीर अपराधों के मामलों में भी अदालत केवल आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर निर्णय देती है।
यह निर्णय इस बात की भी याद दिलाता है कि लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बावजूद अंतिम फैसला साक्ष्यों की गुणवत्ता और कानूनी कसौटी पर ही निर्भर करता है।
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