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सूर्य के रहस्यों से उठा पर्दा आदित्य-L1 की बड़ी कामयाबी
Ratna Netam
16 Oct 2026 2:24 PM IST

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नई दिल्ली। अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत को एक और महत्वपूर्ण सफलता मिली है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के आदित्य-L1 मिशन और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के प्रोबा-3 मिशन ने संयुक्त रूप से सूर्य पर होने वाले शक्तिशाली विस्फोटों के अध्ययन में नई उपलब्धि हासिल की है। पहली बार दोनों मिशनों से प्राप्त वैज्ञानिक आंकड़ों का एक साथ विश्लेषण किया गया है। इस अध्ययन से सूर्य के नजदीक होने वाले विस्फोटों के द्रव्यमान, घनत्व और ऊर्जा से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है।बेंगलुरु स्थित भारतीय खगोलभौतिकी संस्थान (IIA) के वैज्ञानिकों ने आदित्य-L1 के VELC और प्रोबा-3 के ASPIICS उपकरणों से प्राप्त आंकड़ों को मिलाकर कोरोनल मास इजेक्शन (CME) का अध्ययन किया। इस शोध को अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका 'एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स' में प्रकाशित किया गया है।
सूर्य के विस्फोटों को समझने में मिली बड़ी सफलता
वैज्ञानिकों के अनुसार, कोरोनल मास इजेक्शन सूर्य से निकलने वाले विशाल विस्फोट होते हैं। इनमें बड़ी मात्रा में चुंबकीय प्लाज्मा अंतरिक्ष में फैलता है। जब ये विस्फोट पृथ्वी की दिशा में आते हैं, तो आसपास के अंतरिक्ष वातावरण को प्रभावित कर सकते हैं।इनका प्रभाव उपग्रह संचार, जीपीएस प्रणाली और बिजली आपूर्ति से जुड़ी व्यवस्थाओं पर भी पड़ सकता है। इसलिए वैज्ञानिक लंबे समय से इन विस्फोटों की शुरुआती गतिविधियों को समझने का प्रयास कर रहे हैं।सूर्य की सतह के बेहद नजदीक होने वाली गतिविधियों का अध्ययन करना आसान नहीं है। पुराने उपकरण हल्के विस्फोटों के शुरुआती विकास को पूरी तरह दर्ज नहीं कर पाते थे।
दो विस्फोटों के अध्ययन में सामने आए अहम नतीजे
वैज्ञानिकों ने 14 और 16 सितंबर 2025 को हुए दो सौर विस्फोटों का संयुक्त अध्ययन किया। पहले विस्फोट की गति लगभग 645 किलोमीटर प्रति सेकंड दर्ज की गई, जबकि दूसरे की गति करीब 145 किलोमीटर प्रति सेकंड थी।अध्ययन में पता चला कि दोनों विस्फोटों की ऊर्जा का वितरण अलग-अलग था। पहले विस्फोट में तापीय ऊर्जा कुल ऊर्जा का लगभग एक प्रतिशत थी, जबकि दूसरे विस्फोट में तापीय ऊर्जा बढ़ते हुए गतिज ऊर्जा के बराबर पहुंच गई।वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि चुंबकीय ऊर्जा की भूमिका दोनों घटनाओं में महत्वपूर्ण थी। इन परिणामों से सौर विस्फोटों के शुरुआती विकास को समझने में मदद मिलने की उम्मीद है।
आदित्य-L1 मिशन ने निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
भारत का पहला समर्पित सौर मिशन आदित्य-L1 दो सितंबर 2023 को पीएसएलवी-C57 रॉकेट से लॉन्च किया गया था। छह जनवरी 2024 को इसे सूर्य और पृथ्वी के बीच स्थित L1 बिंदु के आसपास हेलो ऑर्बिट में सफलतापूर्वक स्थापित किया गया।इस विशेष स्थिति से अंतरिक्ष यान सूर्य की गतिविधियों का लगातार अध्ययन कर सकता है।आदित्य-L1 में लगा विजिबल एमिशन लाइन कोरोनोग्राफ (VELC) सूर्य के बाहरी वातावरण यानी कोरोना का अध्ययन करता है। इसे भारतीय खगोलभौतिकी संस्थान ने इसरो के सहयोग से विकसित किया है।यह उपकरण 5303 एंगस्ट्रॉम की ग्रीन कोरोनल लाइन का उपयोग करके सूर्य के कोरोना में होने वाले बदलावों की जानकारी जुटाता है।
यूरोप के प्रोबा-3 मिशन ने भी दिया अहम योगदान
यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी का प्रोबा-3 मिशन पांच दिसंबर 2024 को श्रीहरिकोटा से लॉन्च किया गया था। इसकी खासियत यह है कि इसके दो अंतरिक्ष यान लगभग 150 मीटर की दूरी पर एक निश्चित संरचना में उड़ते हैं।इनमें से एक अंतरिक्ष यान दूसरे पर छाया डालकर अंतरिक्ष में कृत्रिम सूर्यग्रहण जैसी स्थिति बनाता है। इससे सूर्य के चमकीले हिस्से की रोशनी को रोककर उसके बाहरी वातावरण का बेहतर अवलोकन किया जा सकता है।प्रोबा-3 का ASPIICS उपकरण सूर्य के कोरोना की स्पष्ट तस्वीरें उपलब्ध कराता है, जबकि आदित्य-L1 का VELC उपकरण स्पेक्ट्रोस्कोपिक आंकड़े प्रदान करता है।
अंतरिक्ष मौसम की भविष्यवाणी में मिलेगी मदद
दोनों उपकरणों के आंकड़ों को मिलाने से वैज्ञानिक सौर विस्फोटों की संरचना, तापमान, घनत्व और ऊर्जा का अधिक व्यापक अध्ययन कर सकते हैं।इस शोध से भविष्य में अंतरिक्ष मौसम संबंधी पूर्वानुमानों को बेहतर बनाने की दिशा में मदद मिल सकती है। साथ ही यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष सहयोग और भारत के आदित्य-L1 मिशन की वैज्ञानिक उपयोगिता को भी दर्शाता है।
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