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संयुक्त राष्ट्र बड़े वैश्विक संकटों पर बेअसर, जयशंकर ने सुधार की जरूरत बताई

Kavita2
6 Oct 2026 11:53 AM IST
संयुक्त राष्ट्र बड़े वैश्विक संकटों पर बेअसर, जयशंकर ने सुधार की जरूरत बताई
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नई दिल्ली: विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए उसमें व्यापक सुधार की जरूरत बताई है। उन्होंने कहा कि दुनिया के बड़े संकटों और संघर्षों पर निर्णय लेने के मामले में संयुक्त राष्ट्र काफी हद तक “बेअसर” साबित हुआ है। जयशंकर ने यूक्रेन युद्ध, खाड़ी क्षेत्र के संघर्ष, अफ्रीका से जुड़े संकटों और कोविड महामारी जैसे उदाहरणों का जिक्र करते हुए कहा कि इन महत्वपूर्ण मामलों में वैश्विक संस्था प्रभावी भूमिका निभाने में सफल नहीं रही।

विदेश मंत्री ने यह टिप्पणी 5वें कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव में एक संवाद सत्र के दौरान की। उनसे पूछा गया था कि संयुक्त राष्ट्र और दुनिया की अन्य बहुपक्षीय संस्थाओं का भविष्य वह किस तरह देखते हैं। इस सवाल के जवाब में जयशंकर ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह गतिरोध में फंस गया है।

जयशंकर ने कहा कि यदि आज की दुनिया के बड़े मुद्दों को देखा जाए तो संयुक्त राष्ट्र की निर्णय लेने की क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। उन्होंने कहा कि खाड़ी क्षेत्र में जारी संघर्ष हो, यूक्रेन का संकट हो, अफ्रीका में चल रही विभिन्न समस्याएं हों या फिर कोविड महामारी जैसी वैश्विक चुनौती, इन सभी मामलों में संयुक्त राष्ट्र अपेक्षित स्तर पर निर्णायक भूमिका निभाने में असमर्थ रहा।

विदेश मंत्री का कहना था कि यह स्थिति केवल किसी एक संकट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक संस्थाओं की संरचना और कार्यप्रणाली से जुड़ी व्यापक समस्या का संकेत है। आज की दुनिया तेजी से बदल रही है और कई नई आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा चुनौतियां सामने आ रही हैं। ऐसे में वैश्विक संस्थाओं के ढांचे को भी वर्तमान वास्तविकताओं के अनुरूप बदलने की जरूरत है।

जयशंकर ने पिछले महीने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र को भी संबोधित किया था। उस दौरान भी भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सहित विभिन्न वैश्विक संस्थाओं में सुधार की जरूरत पर जोर देता रहा है। भारत का मानना है कि मौजूदा वैश्विक व्यवस्था उस समय की परिस्थितियों पर आधारित है, जब दुनिया की आर्थिक और राजनीतिक तस्वीर आज से काफी अलग थी।

विदेश मंत्री की टिप्पणी ऐसे समय सामने आई है, जब दुनिया कई क्षेत्रों में एक साथ गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। रूस-यूक्रेन संघर्ष का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति और खाद्य सुरक्षा तक देखा गया है। दूसरी ओर खाड़ी क्षेत्र में जारी तनाव ने अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और कूटनीति को नई चुनौतियों के सामने खड़ा किया है।

अफ्रीका में भी कई देशों में संघर्ष, राजनीतिक अस्थिरता और मानवीय संकट देखने को मिले हैं। इन परिस्थितियों में संयुक्त राष्ट्र से शांति स्थापना, मध्यस्थता और मानवीय सहायता जैसे क्षेत्रों में प्रभावी भूमिका की उम्मीद की जाती है। हालांकि जयशंकर का कहना है कि बड़े निर्णयों के स्तर पर संस्था की प्रभावशीलता सीमित दिखाई देती है।

उन्होंने कोविड महामारी का भी उदाहरण दिया। महामारी ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया था और स्वास्थ्य व्यवस्था, अर्थव्यवस्था तथा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर भारी दबाव डाला था। ऐसे संकट के दौरान वैश्विक संस्थाओं की भूमिका पर भी कई सवाल उठे थे। जयशंकर ने इसे उन मामलों में शामिल किया, जहां संयुक्त राष्ट्र और बहुपक्षीय व्यवस्था की सीमाएं सामने आईं।

भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के विस्तार की मांग करता रहा है। भारत का तर्क है कि दुनिया की बदलती आर्थिक और राजनीतिक वास्तविकताओं को देखते हुए विकासशील देशों और उभरती शक्तियों को वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अधिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।

भारत यह भी कहता रहा है कि यदि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व और संतुलन नहीं होगा तो उनकी विश्वसनीयता प्रभावित होगी। नई वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए निर्णय प्रक्रिया को अधिक प्रभावी, समावेशी और प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने की जरूरत है।

जयशंकर की टिप्पणी इसी व्यापक बहस से जुड़ी मानी जा रही है। उन्होंने संकेत दिया कि केवल संयुक्त राष्ट्र के अस्तित्व को बनाए रखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे ऐसा बनाना जरूरी है जो वास्तविक संकटों के समय निर्णय लेने और समाधान खोजने में सक्षम हो।

कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव में हुई बातचीत के दौरान बहुपक्षीय संस्थाओं के भविष्य पर सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में आर्थिक और भू-राजनीतिक बदलाव तेजी से हो रहे हैं। एशिया की आर्थिक ताकत बढ़ी है, कई विकासशील देश वैश्विक मंचों पर अधिक प्रभाव चाहते हैं और पुरानी संस्थाओं की संरचना को लेकर असंतोष भी बढ़ रहा है।

ऐसे माहौल में संयुक्त राष्ट्र सुधार का मुद्दा लगातार प्रमुखता हासिल कर रहा है। भारत समेत कई देश चाहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सहित वैश्विक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व का दायरा बढ़ाया जाए और निर्णय लेने की प्रक्रिया को आधुनिक परिस्थितियों के अनुरूप बनाया जाए।

विदेश मंत्री ने साफ किया कि मौजूदा हालात में संयुक्त राष्ट्र बड़े वैश्विक विवादों पर प्रभावी फैसले लेने में संघर्ष कर रहा है। उनका कहना है कि यह स्थिति लंबे समय तक जारी नहीं रह सकती और वैश्विक व्यवस्था को अधिक कार्यक्षम बनाने के लिए सुधार आवश्यक है।

अब यह बहस और तेज हो सकती है कि संयुक्त राष्ट्र में किस तरह के संरचनात्मक बदलाव किए जाएं, सुरक्षा परिषद का विस्तार किस रूप में हो और विकासशील देशों की भागीदारी किस तरह बढ़ाई जाए।

जयशंकर के बयान ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि भारत वैश्विक संस्थाओं में सुधार को केवल कूटनीतिक मांग नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था की आवश्यकता के रूप में देखता है।

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