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Fortis के दो डॉक्टरों को बच्चों के सुपर स्पेशलिस्ट कहने पर रोक

New Delhi.नई दिल्ली। दिल्ली मेडिकल काउंसिल (डीएमसी) ने शालीमार बाग स्थित फोर्टिस अस्पताल के दो डॉक्टरों को आदेश दिया है कि वे नियोनेटोलॉजी में सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टर होने का दावा नहीं कर सकते। क्योंकि डीएमसी के पास उनके सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टर होने की डिग्री का रिकॉर्ड नहीं है। इसलिए वे बच्चों के सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टर के तौर पर प्रैक्टिस नहीं कर सकते। डीएमसी ने 21 मई को जारी आदेश में अस्पताल के डॉ. अखिलेश सिंह और डॉ. विवेक जैन को खुद को सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टर कहने पर रोक लगा दी है। खुद को नियोनेटोलॉजिस्ट कहने वाले डॉक्टर के लिए एक महीने तक के बच्चों का इलाज करने के लिए सुपर स्पेशलिटी होना अनिवार्य है। डीएमसी ने कहा है कि सचिन जैन नाम के व्यक्ति ने दोनों डॉक्टरों के खिलाफ शिकायत की है। इसके बाद 4 अप्रैल को पत्र लिखकर दोनों डॉक्टरों और अस्पताल अधीक्षक से जवाब मांगा गया था। बाद में 21 अप्रैल को दोबारा पत्र भेजा गया लेकिन न तो डॉक्टर और न ही चिकित्सा अधीक्षक ने इसका जवाब दिया।
इस मामले पर 19 मई को काउंसिल की बैठक में चर्चा हुई थी। जिसमें पाया गया कि डॉ. अखिलेश सिंह ने 27 जनवरी 2005 को डीएमसी में पंजीकरण कराया था। उस समय उन्होंने अपनी डिग्री एमबीबीएस बताई थी। इसलिए वे खुद को बाल रोग विशेषज्ञ नहीं कह सकते। डॉ. विवेक जैन ने पिछले साल 5 अगस्त को पंजीकरण कराया था। उस समय उन्होंने अपनी डिग्री एमबीबीएस और एमआरसीपी (रॉयल कॉलेज ऑफ पीडियाट्रिक्स एंड चाइल्ड हेल्थ की सदस्यता) बताई थी। यूके जनरल मेडिकल काउंसिल से मिली जानकारी और उनके खिलाफ लंबित जांच को देखते हुए जनहित में प्रथम दृष्टया दोनों डॉक्टरों को खुद को सुपर स्पेशलिस्ट घोषित करने से रोका जाता है। डीएमसी के एक सदस्य ने बताया कि काउंसिल में पंजीकरण कराते समय डॉक्टर को अपनी डिग्री घोषित करनी होती है। हालांकि एमबीबीएस डॉक्टर को किसी को भी दवा लिखने का अधिकार है। इसलिए दोनों डॉक्टर प्रैक्टिस कर सकते हैं।
स्पेशलिस्ट और सुपर स्पेशलिस्ट डिग्री के लिए नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) से मान्यता की जरूरत होती है। डीएमसी की जांच में एनएमसी से मान्यता प्राप्त कोई डिग्री नहीं मिली। यह मामला पांच साल के बच्चे से जुड़ा है, जिसे जन्म के समय मस्तिष्क में रक्तस्राव की समस्या थी, लेकिन उसकी जांच सात महीने बाद की गई। जांच और उपचार में देरी के कारण बच्चे को मानसिक परेशानी और लकवा मार गया। इसके बाद बच्चे की मां ने एक अक्टूबर 2019 को केस दर्ज कराया और अस्पताल पर लापरवाही का आरोप लगाया। फोर्टिस अस्पताल प्रशासन का कहना है कि मामला कोर्ट में लंबित है। डीएमसी के आदेश से वे हैरान हैं। डॉक्टरों को अपना पक्ष रखने का मौका दिए बिना ही यह आदेश जारी कर दिया गया। उन्हें डीएमसी की सुनवाई के लिए नोटिस भी नहीं दिया गया। डीएमसी ने वर्ष 2023 में हाईकोर्ट में जो हलफनामा दाखिल किया है, उसमें दोनों डॉक्टरों की डिग्री पर सवाल नहीं उठाया गया है। हम डीएमसी के आदेश की समीक्षा कर रहे हैं और आवश्यक कानूनी कार्रवाई की जाएगी।





