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टेट्रा पैक वाली शराब पर बढ़ी मुश्किलें, सरकारों को नोटिस

Rajeshwari Nishad
15 Oct 2026 12:17 AM IST
टेट्रा पैक वाली शराब पर बढ़ी मुश्किलें, सरकारों को नोटिस
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नई दिल्ली। बच्चों और युवाओं को शराब की लत से बचाने तथा शराब की बिक्री में इस्तेमाल होने वाली भ्रामक पैकेजिंग पर रोक लगाने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने बुधवार, 14 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार और राज्यों से चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है। मामला टेट्रा पैक, प्लास्टिक पाउच और छोटी प्लास्टिक बोतलों में शराब की बिक्री से जुड़ा है। याचिका में दावा किया गया है कि इस तरह की पैकेजिंग कई बार फलों के जूस जैसी दिखाई देती है, जिससे बच्चों और कम उम्र के लोगों के भ्रमित होने का खतरा रहता है। अदालत ने शराब की दुकानों और अन्य बिक्री केंद्रों पर खरीदारों की उम्र की जांच के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाने की मांग पर भी जवाब मांगा है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अभी इन पैकेटों में
शराब
की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने का अंतिम आदेश नहीं दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति अपरेश कुमार सिंह की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई की। अदालत के समक्ष गैर-सरकारी संगठन कम्युनिटी अगेंस्ट ड्रंकन ड्राइविंग की ओर से जनहित याचिका दाखिल की गई है।
याचिका में मांग की गई है कि देशभर में शराब की पैकेजिंग और बिक्री को लेकर स्पष्ट तथा समान नियम बनाए जाएं। विशेष रूप से ऐसी पैकेजिंग पर रोक लगाने की मांग की गई है, जिससे शराब और सामान्य पेय पदार्थ के बीच अंतर करना मुश्किल हो सकता है।
याचिकाकर्ता संगठन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विपिन नायर ने पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि देश के कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में शराब टेट्रा पैक में बेची जा रही है। उनके अनुसार, कुछ पैकेटों पर फलों के चित्र और आकर्षक नाम होते हैं, जबकि उनमें अल्कोहल होने की जानकारी अपेक्षाकृत छोटे अक्षरों में लिखी जाती है।
याचिका में उदाहरण देते हुए बताया गया कि कुछ शराब उत्पादों की पैकेजिंग पर आम और दूसरे फलों से संबंधित नाम तथा चित्र होते हैं। इससे पहली नजर में पैकेट सामान्य फ्रूट जूस जैसा दिखाई दे सकता है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि इस तरह की पैकेजिंग कम उम्र के लोगों को भ्रमित कर सकती है। विशेष रूप से ऐसे बच्चों के लिए खतरा बताया गया है, जो पैकेट पर लिखी चेतावनी या अल्कोहल की मात्रा को ठीक से नहीं समझ पाते।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और संबंधित राज्यों को अपना पक्ष रखने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। इसके बाद याचिकाकर्ता संगठन को दो सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने की अनुमति दी गई है। मामले की अगली सुनवाई छह सप्ताह बाद निर्धारित की गई है।
सुनवाई के दौरान शराब की पैकेजिंग के साथ कम उम्र के लोगों तक इसकी पहुंच का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। याचिका में शराब बिक्री केंद्रों पर उम्र की अनिवार्य जांच सुनिश्चित करने की मांग की गई है।
संगठन ने कहा है कि विभिन्न राज्यों में शराब खरीदने और उसका सेवन करने के लिए न्यूनतम आयु निर्धारित है। इसके बावजूद बिक्री के समय उम्र की पहचान सुनिश्चित करने के लिए देशभर में एक समान और प्रभावी व्यवस्था नहीं है।
याचिका में मांग की गई है कि शराब की दुकानों, बार, पब और रेस्तरां जैसे स्थानों पर खरीदारों की उम्र की जांच को प्रभावी बनाया जाए, ताकि निर्धारित आयु से कम उम्र के लोगों को शराब की बिक्री रोकी जा सके।
इस मामले में अदालत ने केंद्र सरकार की ओर से पहले जवाब दाखिल नहीं किए जाने पर भी सवाल उठाए। सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि नोटिस मिलने के बावजूद केंद्र सरकार की ओर से जवाबी हलफनामा दाखिल नहीं किया गया था।
पीठ ने मामले को महत्वपूर्ण बताते हुए केंद्र सरकार से निर्धारित अवधि में जवाब देने को कहा। अदालत ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के कार्यालय को भी याचिका की प्रति उपलब्ध कराने की अनुमति दी है।
याचिकाकर्ता संगठन का कहना है कि शराब की बिक्री में इस्तेमाल होने वाले छोटे टेट्रा पैक और प्लास्टिक पाउच आसानी से कहीं भी ले जाए जा सकते हैं। उनका आकार और बनावट सामान्य पेय पदार्थों के पैकेट से मिलती-जुलती हो सकती है।
संगठन ने आशंका जताई है कि इस तरह की पैकेजिंग शराब के सेवन को छिपाने में भी इस्तेमाल हो सकती है। याचिका में सार्वजनिक स्थानों पर शराब के सेवन और कम उम्र के लोगों तक इसकी पहुंच से जुड़ी चिंताओं का उल्लेख किया गया है।
इसके अलावा शराब की बोतलबंदी और पैकेजिंग से संबंधित राज्यों के आबकारी नियमों में समानता लाने की मांग भी की गई है। याचिका में सुझाव दिया गया है कि शराब के लिए ऐसी पैकेजिंग अपनाई जाए, जिससे उसे सामान्य पेय पदार्थों से स्पष्ट रूप से अलग पहचाना जा सके।
हालांकि, इस प्रस्ताव का विरोध भी सामने आया है। एक्शन एलायंस फॉर रीसाइक्लिंग बेवरेज कार्टन्स नामक संगठन ने मामले में पक्षकार बनने की अनुमति मांगी है।
संगठन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने दलील दी कि टेट्रा पैक जैसी पैकेजिंग के जरिए शराब की बिक्री कई राज्यों में लंबे समय से कानूनी अनुमति के तहत हो रही है। अचानक पूर्ण प्रतिबंध लगाने से पैकेजिंग उद्योग, निवेश और रोजगार पर असर पड़ सकता है।
संगठन ने कहा कि संबंधित राज्यों की आबकारी नीतियों के अंतर्गत ऐसी पैकेजिंग को अनुमति दी गई है। उसने याचिका में प्रस्तावित प्रतिबंध का विरोध किया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संगठन को मामले में पक्षकार बनने की अनुमति दे दी है।
इस तरह अदालत के सामने अब दो महत्वपूर्ण पहलू हैं। पहला, बच्चों और युवाओं को शराब की भ्रामक पैकेजिंग तथा कम उम्र में शराब खरीदने से बचाने की आवश्यकता। दूसरा, मौजूदा कानूनों के अंतर्गत अनुमति प्राप्त पैकेजिंग के संबंध में उद्योग का पक्ष।
सुनवाई में इन दोनों पहलुओं पर संबंधित पक्षों की दलीलें सामने आएंगी। केंद्र और राज्यों के जवाब से यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि शराब की पैकेजिंग तथा उम्र की जांच को लेकर वर्तमान में कौन-कौन सी व्यवस्थाएं लागू हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, शराब के सेवन से जुड़े जोखिमों के बारे में स्पष्ट चेतावनी और उत्पाद की पहचान महत्वपूर्ण होती है। खासतौर पर ऐसे उत्पादों की पैकेजिंग में भ्रम की संभावना कम करना जरूरी है, जिनका सेवन बच्चों के लिए हानिकारक हो सकता है।
शराब की बिक्री पर नियंत्रण का एक महत्वपूर्ण पहलू उम्र की जांच भी है। यदि खरीदार की उम्र के सत्यापन की व्यवस्था प्रभावी नहीं होती, तो कानूनी आयु सीमा लागू कराने में कठिनाई हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के सामने लंबित याचिका इसी व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने की मांग करती है। इसमें केवल शराब के पैकेटों की बनावट ही नहीं, बल्कि बिक्री के दौरान पहचान संबंधी नियमों को लागू करने का मुद्दा भी शामिल है।
यह मामला पहले भी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आ चुका है। मई 2026 में अदालत ने शराब के टेट्रा पैक और पाउच में बिक्री के खिलाफ दाखिल याचिका पर केंद्र तथा संबंधित राज्यों से जवाब मांगा था। उस समय भी जूस जैसी पैकेजिंग के कारण उपभोक्ताओं के भ्रमित होने का मुद्दा उठाया गया था।
अब अक्टूबर में हुई सुनवाई के बाद अदालत ने संबंधित पक्षों को जवाब दाखिल करने के लिए स्पष्ट समयसीमा दी है।
फिलहाल देशभर में टेट्रा पैक या प्लास्टिक पाउच में शराब की बिक्री पर सुप्रीम कोर्ट की ओर से कोई अंतिम प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। मामला न्यायिक विचाराधीन है और केंद्र सरकार तथा राज्यों के जवाब आने के बाद आगे की सुनवाई होगी।
अदालत के इस कदम से शराब की पैकेजिंग, चेतावनी संबंधी जानकारी और कम उम्र के लोगों को शराब की बिक्री रोकने की व्यवस्था पर नई बहस शुरू हुई है। अगली सुनवाई में यह स्पष्ट हो सकता है कि इन मुद्दों पर अदालत आगे क्या निर्देश देती है
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