- Home
- /
- दिल्ली-एनसीआर
- /
- दिल्ली में बढ़ा शिकायत...
दिल्ली में बढ़ा शिकायत खारिज होने का आंकड़ा, जनता परेशान

दिल्ली: भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई की उम्मीद लेकर लोकायुक्त के पास पहुंचने वाली बड़ी संख्या में शिकायतें लगातार खारिज हो रही हैं। आंकड़े बताते हैं कि बीते तीन वर्षों में हजारों लोगों ने भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को लेकर लोकायुक्त से शिकायत की, लेकिन बड़ी संख्या में मामले संस्था के अधिकार क्षेत्र से बाहर होने के कारण आगे नहीं बढ़ सके। इससे आम जनता में निराशा बढ़ रही है और लोकायुक्त की प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे हैं।
दिल्ली लोकायुक्त संस्था की स्थापना का मुख्य उद्देश्य सरकारी व्यवस्था में पारदर्शिता लाना और भ्रष्टाचार के मामलों पर कार्रवाई करना था। लेकिन मौजूदा स्थिति में यह संस्था खुद सीमित अधिकारों और संसाधनों की कमी से जूझ रही है। पिछले तीन वर्षों में लोकायुक्त के पास कुल 1512 शिकायतें पहुंचीं, जिनमें से 1363 शिकायतें केवल इसलिए खारिज कर दी गईं क्योंकि वे संस्था के अधिकार क्षेत्र में नहीं आती थीं।
दिल्ली लोकायुक्त अधिनियम, 1995 के तहत लोकायुक्त का दायरा सीमित है। कानून के अनुसार लोकायुक्त मुख्य रूप से मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक और पार्षदों से जुड़े मामलों की जांच कर सकता है। वहीं आम जनता जिन विभागों में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार की शिकायतें करती है, जैसे सरकारी अधिकारी, इंजीनियर, पुलिसकर्मी और वरिष्ठ आईएएस-आईपीएस अधिकारी, उनमें से कई लोकायुक्त के सीधे अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं।
इस वजह से कई शिकायतों की जांच शुरू होने से पहले ही उन्हें समाप्त कर दिया जाता है। शिकायतकर्ता को यह जानकारी दी जाती है कि मामला लोकायुक्त के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। इससे लोगों को लगता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं हुई और उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा।
आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2023-24 में लोकायुक्त के पास 479 शिकायतें आईं, जिनमें से 404 शिकायतों को खारिज किया गया या संबंधित विभागों को भेज दिया गया। वहीं 2024-25 में कुल 383 शिकायतें दर्ज हुईं, जिनमें 326 मामलों पर इसी तरह कार्रवाई हुई। वर्ष 2025-26 में शिकायतों की संख्या बढ़कर 650 हो गई, लेकिन इनमें से 633 शिकायतें खारिज या संबंधित विभागों को जांच के लिए भेज दी गईं।
लोकायुक्त के अधिकार सीमित होने के साथ-साथ संस्था के पास संसाधनों की भी भारी कमी है। करीब ढाई करोड़ की आबादी वाले दिल्ली शहर के लिए लोकायुक्त कार्यालय के पास अपनी स्वतंत्र जांच एजेंसी या पुलिस विंग नहीं है। वर्तमान में जांच का काम अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे एक डीसीपी स्तर के अधिकारी और एक इंस्पेक्टर रैंक के अधिकारी के भरोसे चल रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भ्रष्टाचार जैसे गंभीर मामलों की जांच के लिए एक मजबूत और स्वतंत्र तंत्र की जरूरत होती है। अगर जांच एजेंसी ही सीमित होगी तो प्रभावी कार्रवाई करना मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा लोकायुक्त की सिफारिशें भी सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं होतीं, जिससे कई मामलों में कार्रवाई की गति धीमी हो सकती है।
भ्रष्टाचार निरोधक संस्थाओं की स्वतंत्रता को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी कई बार अपनी चिंता जाहिर कर चुका है। अदालत ने कहा है कि लोकतंत्र और कानून के शासन के लिए ऐसी संस्थाओं का स्वतंत्र और प्रभावी होना बेहद जरूरी है। विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली लोकायुक्त कानून में बदलाव कर संस्था को ज्यादा अधिकार दिए जाने चाहिए।
जानकारों के मुताबिक, दिल्ली में लोकायुक्त को मजबूत बनाने के लिए स्वतंत्र जांच विंग की स्थापना, पर्याप्त कर्मचारियों की नियुक्ति और अधिकार क्षेत्र का विस्तार जरूरी है। देश के कई राज्यों में लोकायुक्त को दिल्ली की तुलना में ज्यादा अधिकार मिले हुए हैं। कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, ओडिशा और नागालैंड जैसे राज्यों में लोकायुक्त व्यवस्था को ज्यादा प्रभावी माना जाता है।
दिल्ली लोकायुक्त जस्टिस हरीश चंद्र मिश्रा का कहना है कि संस्था अपने कर्तव्यों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उनके अनुसार, क्षेत्राधिकार के तहत आने वाली शिकायतों का निपटारा किया जाता है और उचित मामलों में संबंधित अधिकारियों को सिफारिशें भेजी जाती हैं।
हालांकि, मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली लोकायुक्त के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसका सीमित दायरा और संसाधनों की कमी है। यदि संस्था को ज्यादा अधिकार और मजबूत व्यवस्था मिलती है तो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को मजबूती मिल सकती है और जनता का भरोसा भी बढ़ाया जा सकता है।





