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दिवाली पर पटाखों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, सेहत और पर्यावरण पर जताई चिंता
Ratna Netam
2 Nov 2026 9:17 PM IST

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नई दिल्ली। दिवाली के अवसर पर पटाखे जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण और स्वास्थ्य संबंधी खतरों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने एक बार फिर पर्यावरण संरक्षण और त्योहार मनाने के तौर-तरीकों पर चर्चा तेज कर दी है। अदालत ने पटाखों से होने वाले प्रदूषण के प्रभाव को गंभीर विषय मानते हुए इस बात पर जोर दिया कि त्योहारों का आनंद मनाने के साथ नागरिकों की सेहत और पर्यावरण की सुरक्षा का ध्यान रखना भी आवश्यक है। पटाखों से निकलने वाला धुआं, हानिकारक कण और तेज आवाज विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों तथा सांस संबंधी बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए परेशानी पैदा कर सकते हैं।दिवाली को रोशनी, खुशियों और आपसी सद्भाव का त्योहार माना जाता है। ऐसे में पटाखों के कारण पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य को होने वाले नुकसान का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट पहले भी विभिन्न मामलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि त्योहार मनाने की स्वतंत्रता के साथ दूसरों के स्वास्थ्य और स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार का संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
पटाखों से होने वाले प्रदूषण पर अदालत ने जताई चिंता
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने पटाखों के इस्तेमाल से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं। अदालत ने कहा कि पटाखों से वायु और ध्वनि प्रदूषण के साथ ठोस कचरा भी उत्पन्न होता है। इसका असर केवल पटाखे जलाने वाले लोगों पर नहीं, बल्कि आसपास रहने वाले नागरिकों और अन्य जीवों पर भी पड़ता है।अदालत ने कहा कि दिवाली का धार्मिक, सामाजिक और भावनात्मक महत्व है। यह त्योहार आशा, कल्याण और समृद्धि का संदेश देता है। लेकिन यदि उत्सव के कारण पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है और जीवों के स्वास्थ्य पर खतरा उत्पन्न होता है, तो त्योहार का मूल उद्देश्य ही प्रभावित होता है।
बच्चों और बुजुर्गों की सेहत को सबसे ज्यादा खतरा
सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों के प्रदूषण से होने वाले स्वास्थ्य संबंधी खतरों पर विशेष ध्यान दिया। अदालत ने बच्चों, दिव्यांग व्यक्तियों और बुजुर्गों को प्रदूषण के प्रति अधिक संवेदनशील समूहों में शामिल किया।पटाखों के जलने से हवा में सूक्ष्म कण फैलते हैं। इनमें पीएम2.5 जैसे बेहद छोटे कण भी शामिल हो सकते हैं, जो सांस के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। ये कण फेफड़ों के भीतर तक पहुंचकर स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां पैदा कर सकते हैं।अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि पटाखों से निकलने वाले प्रदूषक कण कई दिनों तक वातावरण में मौजूद रह सकते हैं। कुछ अत्यंत सूक्ष्म कण शरीर की प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली को पार कर रक्त प्रवाह तक पहुंच सकते हैं।अस्थमा, हृदय रोग और सांस संबंधी समस्याओं से प्रभावित लोगों के लिए प्रदूषित वातावरण विशेष रूप से नुकसानदायक हो सकता है।
धार्मिक स्वतंत्रता के साथ स्वास्थ्य का अधिकार भी जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 25 के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।अनुच्छेद 25 नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करता है, जबकि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में स्वस्थ और सुरक्षित पर्यावरण का अधिकार भी शामिल है।अदालत ने स्पष्ट किया कि धार्मिक गतिविधियों की स्वतंत्रता असीमित नहीं है। सार्वजनिक स्वास्थ्य और अन्य संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।पीठ ने माना कि पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध प्रदूषण कम करने का एक आदर्श उपाय प्रतीत हो सकता है, लेकिन उपलब्ध आंकड़े यह तय करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं कि पूर्ण प्रतिबंध ही सबसे प्रभावी समाधान है। इसी कारण अदालत ने नियंत्रित उपयोग और सख्त निगरानी का रास्ता अपनाया है।
दिल्ली-NCR में दो दिन ग्रीन पटाखों की अनुमति
सुप्रीम कोर्ट ने दिवाली के अवसर पर दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सीमित अवधि के लिए प्रमाणित ग्रीन पटाखे जलाने की अनुमति दी है।अदालत के निर्देशों के अनुसार, 7 और 8 नवंबर 2026 को सुबह 6 बजे से 7 बजे तक तथा रात 8 बजे से 10 बजे तक ही निर्धारित ग्रीन पटाखे जलाए जा सकेंगे।इसके अतिरिक्त अस्पतालों, नर्सिंग होम, स्वास्थ्य केंद्रों, वृद्धाश्रमों, शिक्षण संस्थानों और अधिसूचित शांत क्षेत्रों के 300 मीटर के दायरे में पटाखे जलाने पर प्रतिबंध रहेगा।अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि 9 नवंबर 2026 से दिल्ली-NCR में पटाखों पर पहले से लागू पूर्ण प्रतिबंध फिर प्रभावी हो जाएगा।
केवल प्रमाणित ग्रीन पटाखों की अनुमति
अदालत ने कहा कि केवल CSIR-NEERI और संबंधित प्राधिकरणों से प्रमाणित ग्रीन पटाखों को ही निर्धारित शर्तों के तहत अनुमति दी जाएगी।बेरियम युक्त पटाखों और गैर-अनुमोदित पटाखों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध जारी रहेगा। इसके साथ ही लड़ियों के रूप में जुड़े पटाखों के निर्माण और बिक्री की अनुमति नहीं होगी।ग्रीन पटाखों को पारंपरिक पटाखों की तुलना में कम प्रदूषण फैलाने के उद्देश्य से विकसित किया गया है। हालांकि, इनसे भी प्रदूषण पूरी तरह समाप्त नहीं होता।अदालत ने अधिकारियों को अवैध और पारंपरिक पटाखों की बिक्री रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाने का निर्देश दिया है।
प्रदूषण और अस्पतालों में मरीजों के आंकड़े मांगे
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-NCR के संबंधित अधिकारियों को दिवाली के बाद वायु गुणवत्ता और स्वास्थ्य संबंधी आंकड़े प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।अदालत ने यह जानकारी भी मांगी है कि पटाखों के प्रदूषण से संबंधित समस्याओं के कारण अस्पतालों में मरीजों की संख्या में कोई बढ़ोतरी हुई या नहीं।अधिकारियों को निगरानी व्यवस्था, नियमों के उल्लंघन पर की गई कार्रवाई और प्रदूषण नियंत्रण उपायों की रिपोर्ट भी देनी होगी।ये रिपोर्ट 14 दिसंबर 2026 तक दाखिल की जानी हैं। मामले की अगली सुनवाई 16 दिसंबर को निर्धारित है।
स्वच्छ और सुरक्षित दिवाली मनाने का संदेशसुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से यह स्पष्ट होता है कि पर्यावरण संरक्षण और त्योहारों के उत्सव के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है।दिवाली पर पटाखों से होने वाला प्रदूषण पहले से खराब वायु गुणवत्ता की समस्या को और गंभीर बना सकता है। विशेष रूप से दिल्ली-NCR में सर्दियों के दौरान कम हवा की गति और मौसम संबंधी परिस्थितियों के कारण प्रदूषक लंबे समय तक वातावरण में बने रह सकते हैं।अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि प्रदूषण नियंत्रण की जिम्मेदारी केवल त्योहारों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। संबंधित एजेंसियों को पूरे वर्ष निगरानी और नियमों का प्रभावी पालन सुनिश्चित करना होगा।सुप्रीम कोर्ट का संदेश है कि दिवाली की खुशियां मनाते समय नागरिकों के स्वास्थ्य, पर्यावरण और दूसरे जीवों की सुरक्षा का ध्यान रखना भी जरूरी है। उत्सव का वास्तविक आनंद तभी सार्थक होगा, जब उससे दूसरों के जीवन और स्वास्थ्य पर अनावश्यक खतरा उत्पन्न न हो।
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