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दिल्ली में बढ़ते रेप मामलों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, पुलिस को दिए कड़े निर्देश

Tara Tandi
5 Oct 2026 4:33 PM IST
दिल्ली में बढ़ते रेप मामलों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, पुलिस को दिए कड़े निर्देश
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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली पुलिस और केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) को निर्देश दिया कि वे दिल्ली-NCR में हाल ही में हुई रेप और यौन उत्पीड़न की घटनाओं पर स्वतः संज्ञान (suo motu) लेते हुए शुरू की गई कार्यवाही में चार हफ़्ते के भीतर अपना जवाब दाखिल करें। कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि अपराध होने के बाद कार्रवाई करने के बजाय अपराध को रोकना ज़्यादा ज़रूरी है।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी रोकथाम के उपायों और संवेदनशील सार्वजनिक जगहों की लगातार निगरानी की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।
शीर्ष अदालत ने मौखिक रूप से कहा कि केवल कागज़ पर उपाय लिखना काफ़ी नहीं होगा और अधिकारियों को अपराध रोकने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।
जस्टिस पारदीवाला की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा, "हमें मिलकर काम करना होगा। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि दिल्ली-NCR में हर महिला रात 11 बजे भी सुरक्षित महसूस करे, चाहे वह सड़क पर यात्रा कर रही हो या मेट्रो में।"
बेंच ने आगे कहा कि ध्यान अपराध होने के बाद कार्रवाई करने के बजाय अपराध को रोकने पर होना चाहिए।
शीर्ष अदालत ने कहा, "महत्वपूर्ण बात अपराध को रोकना है, न कि अपराध होने के बाद आप क्या करते हैं।" कोर्ट ने ज़ोर दिया कि पुलिस को ऐसे अपराध करने वाले "गुंडों और असामाजिक तत्वों" के मन में डर पैदा करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने लगातार निगरानी के बिना CCTV सर्विलांस की प्रभावशीलता पर भी दिल्ली पुलिस से सवाल किया और पूछा कि क्या संवेदनशील इलाकों की लगातार निगरानी के लिए कोई सिस्टम है।
कोर्ट ने घटनाओं की निगरानी और उन पर प्रतिक्रिया देने के लिए एक समर्पित "वॉर रूम" न होने पर भी सवाल उठाया और पूछा कि ऐसे सिस्टम के बिना अपराध को कैसे रोका जा सकता है।
बेंच ने कहा, "आपको उस व्यक्ति के मन में डर पैदा करना होगा जो अपराध करने के लिए तैयार है।" बेंच ने आगे कहा कि पुलिस को यह डर पैदा करना चाहिए कि ऐसे अपराध करने के गंभीर परिणाम होंगे।
यह कार्यवाही दिल्ली-NCR में रेप और यौन उत्पीड़न की कई परेशान करने वाली रिपोर्टों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान लेने के बाद शुरू हुई है। 28 सितंबर को दिए अपने आदेश में, सुप्रीम कोर्ट ने पार्क, सड़क, बस, मेट्रो स्टेशन, सबवे और फुटब्रिज जैसी सार्वजनिक जगहों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई थी। कोर्ट ने कहा था कि खराब लाइटिंग, खराब निगरानी या ढीली पेट्रोलिंग की वजह से ऐसी जगहों को 'हाई-रिस्क ज़ोन' नहीं बनने दिया जा सकता।
बेंच ने सार्वजनिक जगहों पर सुरक्षा इंतज़ामों, 'नेशनल डेटाबेस ऑन सेक्सुअल ऑफेंडर्स' (NDSO), 'इन्वेस्टिगेशन ट्रैकिंग सिस्टम फॉर सेक्सुअल ऑफेंसेज़' (ITSSO), 'मिशन शक्ति' प्रोग्राम, इमरजेंसी रिस्पॉन्स सिस्टम, महिलाओं के लिए हेल्पलाइन, CCTV कवरेज, महिला हेल्प डेस्क और 'वन स्टॉप सेंटर' के इस्तेमाल पर एक विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट भी मांगी थी।
कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया था कि वह हर पुलिस ज़िले के लिए खास टीमें बनाए, जो संवेदनशील जगहों की पहचान करें और ज़िले के हिसाब से 'वल्नरेबिलिटी मैप' (संवेदनशीलता का नक्शा) तैयार करें। साथ ही, लाइटिंग और CCTV इंफ्रास्ट्रक्चर का ऑडिट करने और संवेदनशील इलाकों में पेट्रोलिंग बढ़ाने का भी आदेश दिया था।
यह कार्रवाई कई यौन अपराधों की घटनाओं के बाद हुई, जिनमें आस्था कुंज पार्क में 17 साल की लड़की के साथ कथित गैंगरेप और ग्रेटर नोएडा से दिल्ली जा रही चलती स्लीपर बस में एक नाबालिग के साथ कथित यौन उत्पीड़न की घटना शामिल है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बाद वाली घटना 2012 के निर्भया केस की दर्दनाक यादें ताज़ा करती है।
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