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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को परमाणु सुरक्षा से जुड़े SHANTI एक्ट को लेकर केंद्र सरकार से महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण मांगा है। शीर्ष अदालत ने केंद्र से पूछा है कि क्या इस कानून के तहत परमाणु दुर्घटना की स्थिति में पीड़ितों को उचित और न्यायसंगत मुआवजा दिलाने के मामले में अदालतों के अधिकारों को सीमित किया गया है।
चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं, ने मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार से कई सवाल पूछे। अदालत ने कहा कि वह इस मामले में सीमित नोटिस जारी कर रही है और सरकार से इस संबंध में स्पष्ट जवाब चाहती है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से यह भी स्पष्ट करने को कहा है कि क्या परमाणु नियामक संस्था में सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया के दौरान हितों के टकराव (Conflict of Interest) की स्थिति पैदा हो सकती है। अदालत ने पूछा कि नियामक संस्था की स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए क्या प्रावधान किए गए हैं।
पीठ ने सुनवाई के दौरान परमाणु दुर्घटनाओं से जुड़े मामलों में पीड़ितों के अधिकारों और मुआवजे की व्यवस्था को लेकर चिंता जताई। अदालत ने जानना चाहा कि यदि किसी परमाणु हादसे में लोगों को नुकसान पहुंचता है तो उन्हें न्याय दिलाने के लिए क्या पर्याप्त कानूनी रास्ते उपलब्ध हैं।
SHANTI एक्ट को लेकर यह मामला महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में सुरक्षा, जिम्मेदारी और जवाबदेही से जुड़े कई पहलू इससे जुड़े हैं। परमाणु दुर्घटनाओं की स्थिति में पीड़ितों को राहत और मुआवजा उपलब्ध कराना एक संवेदनशील विषय है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से यह जानकारी भी मांगी कि कानून में मुआवजे को लेकर क्या व्यवस्था बनाई गई है और क्या अदालतें जरूरत पड़ने पर पीड़ितों के हित में हस्तक्षेप कर सकती हैं या नहीं।
अदालत ने यह सवाल इसलिए उठाया क्योंकि किसी भी बड़े औद्योगिक या परमाणु हादसे में प्रभावित लोगों के अधिकारों की रक्षा करना न्याय व्यवस्था की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। ऐसे मामलों में मुआवजा केवल आर्थिक सहायता नहीं बल्कि पीड़ितों को न्याय दिलाने का माध्यम भी होता है।
सुनवाई के दौरान पीठ ने नियामक संस्था की भूमिका पर भी सवाल उठाए। अदालत ने पूछा कि अगर नियामक संस्था में नियुक्त लोगों के किसी पक्ष से हित जुड़े हों तो ऐसी स्थिति में निष्पक्ष निर्णय कैसे सुनिश्चित किया जाएगा।
हितों के टकराव का मुद्दा कई महत्वपूर्ण संस्थाओं में नियुक्तियों को लेकर समय-समय पर उठता रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी सुरक्षा संबंधी क्षेत्र में काम करने वाली संस्था की विश्वसनीयता के लिए उसकी स्वतंत्रता और पारदर्शिता बेहद जरूरी होती है।
परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में सुरक्षा मानकों का पालन सबसे महत्वपूर्ण विषयों में शामिल है। दुनिया में परमाणु दुर्घटनाओं के कई उदाहरण रहे हैं, जिनके बाद सुरक्षा नियमों और जवाबदेही को लेकर कड़े कदम उठाए गए।
भारत में भी परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं को लेकर सुरक्षा और जिम्मेदारी से जुड़े नियम बनाए गए हैं। SHANTI एक्ट इसी क्षेत्र से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कानून है, जिस पर अब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा है।
अदालत ने केंद्र सरकार से यह बताने को कहा है कि कानून के प्रावधान किस तरह पीड़ितों के हितों की रक्षा करते हैं और क्या मुआवजे के मामलों में न्यायिक समीक्षा का अधिकार मौजूद है।
विशेषज्ञों के अनुसार, परमाणु दुर्घटनाओं से जुड़े मामलों में सबसे बड़ी चुनौती जिम्मेदारी तय करना और प्रभावित लोगों को समय पर राहत उपलब्ध कराना होती है। ऐसे मामलों में कानूनी प्रक्रिया स्पष्ट और प्रभावी होना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट की ओर से जारी सीमित नोटिस के बाद अब केंद्र सरकार को अपना जवाब दाखिल करना होगा। सरकार के जवाब के बाद अदालत इस मामले में आगे की सुनवाई करेगी।
मामले की अगली सुनवाई में यह स्पष्ट हो सकता है कि SHANTI एक्ट के तहत मुआवजे और नियामक संस्था की स्वतंत्रता को लेकर अदालत का रुख क्या होगा।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के सवालों के बाद परमाणु सुरक्षा कानून और पीड़ितों के अधिकारों को लेकर बहस तेज हो गई है। अदालत का यह कदम परमाणु क्षेत्र में जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।





