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रिश्वत के लिए दी रकम की वसूली का दावा नहीं चलेगा सुप्रीम कोर्ट का फैसला

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कानून के खिलाफ, अनैतिक या सार्वजनिक नीति के विरुद्ध समझौते पर आधारित धन वसूली का दावा शुरुआती चरण में ही खारिज किया जा सकता है। हालांकि, इसके लिए वादपत्र में दर्ज तथ्यों से ही दावे की गैरकानूनी प्रकृति सामने आनी चाहिए। अदालत ने जोर दिया कि अवैध लेन-देन में समान रूप से दोषी पक्ष न्यायालय से उस सौदे को लागू कराने या उसके आधार पर राहत दिलाने की अपेक्षा नहीं कर सकते। यह फैसला बैंक ऋण दिलाने के लिए कथित रूप से दी गई रकम की वसूली से जुड़े विवाद में आया है।
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने पूसा श्री कृष्णा और नौ अन्य लोगों की अपील स्वीकार की। अपील तेलंगाना हाई कोर्ट के तीन जनवरी 2025 के आदेश के खिलाफ दाखिल की गई थी। हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस निर्णय को बरकरार रखा था, जिसमें प्रतिवादियों की वादपत्र खारिज करने की मांग अस्वीकार कर दी गई थी। प्रतिवादियों ने सिविल प्रक्रिया संहिता यानी सीपीसी के ऑर्डर VII रूल 11 के तहत यह आवेदन किया था।
मामले की शुरुआत मूल वादी द्वारा दाखिल धन वसूली के मुकदमे से हुई थी। उसने दावा किया था कि विभिन्न बैंकों से ऋण दिलाने के लिए अपीलकर्ताओं को रकम दी गई थी। इस भुगतान को कथित तौर पर खर्चों से जोड़ा गया था। लेकिन वादपत्र में दर्ज विवरण से सामने आया कि रकम का एक हिस्सा बैंक अधिकारियों को उनकी निजी हैसियत में अवैध लाभ पहुंचाने के लिए दिया गया था। लेन-देन में नोटबंदी के दौरान बंद हुए नोटों के इस्तेमाल का उल्लेख भी था।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि वादपत्र स्वयं कथित भुगतान के गैरकानूनी और धोखाधड़ीपूर्ण उद्देश्य को उजागर करता है। ऐसी स्थिति में ‘इन पैरी डेलिक्टो’ के सिद्धांत के आधार पर दावा आगे नहीं बढ़ सकता और वादपत्र ऑर्डर VII रूल 11(d) के अंतर्गत खारिज किए जाने योग्य है। इस सिद्धांत का संबंध ऐसे मामलों से है, जहां अवैध व्यवहार में दोनों पक्ष समान रूप से दोषी हों।
फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि किसी भुगतान को लिखित समझौते या एमओयू में दर्ज कर देने से उसका उद्देश्य वैध नहीं हो जाता। दस्तावेज का नाम और उसका प्रारूप अलग विषय हैं, जबकि उसके पीछे का लेन-देन अलग प्रश्न है। यदि समझौते का आधार ही गैरकानूनी हो, तो अदालत में केवल उसके लिखित होने का सहारा पर्याप्त नहीं होगा। इस विवाद में ऋण की व्यवस्था करने के लिए किए गए भुगतान की प्रकृति केंद्रीय मुद्दा थी।
वैध सेवा के लिए भुगतान और अधिकारियों को निजी फायदा पहुंचाने के लिए भुगतान के बीच अंतर भी इस मामले में महत्वपूर्ण है। किसी बैंक ऋण से संबंधित दस्तावेज तैयार करने या वैध सेवा लेने का मामला अलग हो सकता है। यहां विवाद का आधार वादपत्र में सामने आया कथित अवैध उद्देश्य था। इसलिए फैसले को प्रत्येक ऋण-संबंधी भुगतान या सभी धन वसूली मामलों पर एक समान लागू होने वाला निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।
शुरुआती चरण में वादपत्र खारिज करने की प्रक्रिया और पूरे मुकदमे की सुनवाई अलग स्थितियां हैं। इस मामले में अदालत के सामने प्रश्न यह था कि वादी के अपने विवरण को देखते हुए दावा कानूनी रूप से आगे बढ़ सकता है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष इसी आधार पर था कि गैरकानूनी उद्देश्य वादपत्र से ही स्पष्ट हो रहा था। किसी प्रतिवादी का केवल आरोप लगा देना और वादी के दस्तावेजों से ऐसी स्थिति सामने आना एक जैसी बात नहीं है।
‘इन पैरी डेलिक्टो’ का सामान्य आशय यह है कि अवैध लेन-देन में समान दोष रखने वाले पक्षों के बीच अदालत किसी एक को उस अवैध व्यवहार के आधार पर राहत देने से इनकार कर सकती है। इसका उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया के जरिए गैरकानूनी सौदे को संरक्षण देने से बचना है। लेकिन समान दोष की स्थिति और लेन-देन की प्रकृति प्रत्येक विवाद के तथ्यों से निर्धारित होगी। किसी धोखाधड़ी के निर्दोष पीड़ित की स्थिति को अपने आप इस मामले के पक्षों के समान नहीं माना जा सकता।
धन वसूली का दावा खारिज होना आपराधिक जिम्मेदारी पर निर्णय से भी अलग है। इस फैसले में मुद्दा संबंधित दीवानी दावे की स्वीकार्यता था। इसे किसी पक्ष को रिश्वत, धोखाधड़ी या अन्य संभावित अपराध से स्वतः मुक्त करने के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए। इसी तरह उपलब्ध विवरण के आधार पर किसी नए आपराधिक मुकदमे, सजा अथवा दंड की घोषणा करना भी उचित नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से इस विवाद में अपीलकर्ताओं को राहत मिली है। व्यापक रूप से फैसला समझौते की वैधता और अदालत से मांगी जाने वाली राहत के संबंध को स्पष्ट करता है। केवल रकम देने का दावा न्यायिक वसूली का पर्याप्त आधार नहीं बनता, यदि वादी का अपना विवरण उस भुगतान का अवैध उद्देश्य दिखाता हो। ऐसे मामलों में अदालत प्रारंभिक स्तर पर ही वादपत्र की स्वीकार्यता का परीक्षण कर सकती है और कानून से बाधित दावा आगे बढ़ाने से इनकार कर सकती है।





