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स्कूलों में प्रस्तावना पाठ अनिवार्य करने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

Ratna Netam
6 Oct 2026 2:59 PM IST
स्कूलों में प्रस्तावना पाठ अनिवार्य करने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार
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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उस जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें देशभर के स्कूलों में सुबह की सभा के दौरान छात्रों के लिए संविधान की प्रस्तावना का पाठ अनिवार्य करने की मांग की गई थी। याचिका में केंद्र सरकार और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी CBSE को निर्देश देने की मांग की गई थी कि वे इस संबंध में एक राष्ट्रीय नीति तैयार करें, ताकि स्कूली बच्चों के बीच संविधान और उसके मूल मूल्यों को लेकर जागरूकता बढ़ाई जा सके।
मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि संविधान की प्रस्तावना पहले से ही स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा है और छात्रों को छठी कक्षा से ही इसके बारे में पढ़ाया जाता है। अदालत ने इस आधार पर याचिका पर आगे सुनवाई करने की आवश्यकता नहीं मानी।
यह जनहित याचिका दिल्ली यूनिवर्सिटी के राजधानी कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर धीरज कुमार की ओर से दायर की गई थी। याचिका में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय और CBSE को यह निर्देश देने की मांग की गई थी कि देशभर के स्कूलों में सुबह की प्रार्थना सभा या मॉर्निंग असेंबली के दौरान संविधान की प्रस्तावना का नियमित पाठ कराया जाए। याचिकाकर्ता का तर्क था कि इससे बच्चों में कम उम्र से ही संवैधानिक मूल्यों, अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति समझ विकसित होगी।
याचिका में कहा गया था कि संविधान की प्रस्तावना देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था, न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे मूल सिद्धांतों की जानकारी देती है। ऐसे में यदि छात्र इसे नियमित रूप से पढ़ेंगे तो उनके बीच संवैधानिक चेतना और नागरिक जिम्मेदारी की भावना मजबूत हो सकती है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को स्वीकार करते हुए कोई निर्देश जारी करने से इनकार कर दिया।
पीठ ने सुनवाई के दौरान इस तथ्य पर जोर दिया कि प्रस्तावना को छात्रों की पढ़ाई में पहले से शामिल किया गया है। अदालत के अनुसार, जब संविधान और उसकी प्रस्तावना शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा हैं और बच्चों को स्कूल स्तर पर इसकी जानकारी दी जा रही है, तो इसके लिए अलग से एक अनिवार्य राष्ट्रीय नीति बनाए जाने की मांग पर न्यायिक हस्तक्षेप जरूरी नहीं है।
इस मामले में याचिकाकर्ता ने संविधान की प्रस्तावना को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित न रखकर स्कूलों की रोजमर्रा की गतिविधियों से जोड़ने की मांग की थी। उनका कहना था कि प्रतिदिन प्रस्तावना का पाठ कराने से बच्चों को संविधान के शब्दों और उसके भाव को बार-बार समझने का अवसर मिलेगा। इसके साथ ही छात्रों में लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय, समान अवसर और राष्ट्रीय एकता जैसे मूल्यों को लेकर जागरूकता बढ़ सकती है।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावना के महत्व को लेकर कोई विवाद नहीं है, लेकिन इसे सुबह की सभा में अनिवार्य रूप से पढ़ाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर नीति बनाने का निर्देश देना आवश्यक नहीं है। अदालत की टिप्पणी से यह भी संकेत मिला कि शैक्षणिक पाठ्यक्रम और विद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली सामग्री से जुड़े मामलों में पहले से मौजूद व्यवस्था को ध्यान में रखना जरूरी है।
संविधान की प्रस्तावना भारतीय संविधान की मूल भावना को दर्शाती है। इसमें भारत को संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने के संकल्प के साथ नागरिकों को न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व सुनिश्चित करने की बात कही गई है। स्कूलों में नागरिक शास्त्र और सामाजिक विज्ञान जैसे विषयों के माध्यम से छात्रों को संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिक अधिकारों की जानकारी दी जाती है।
याचिका के जरिए इस व्यवस्था को और व्यापक बनाने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता चाहते थे कि केंद्र सरकार ऐसी नीति तैयार करे, जिससे सभी स्कूलों में एक समान व्यवस्था लागू हो और हर दिन छात्रों को प्रस्तावना का पाठ कराया जाए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दिशा में कोई अनिवार्य आदेश देने से इनकार कर दिया।
अदालत के फैसले के बाद फिलहाल स्कूलों में सुबह की सभा के दौरान संविधान की प्रस्तावना पढ़ना राष्ट्रीय स्तर पर अनिवार्य किए जाने का रास्ता नहीं खुला है। हालांकि स्कूल और शैक्षणिक संस्थान अपने स्तर पर संविधान और उसके मूल्यों को लेकर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित कर सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का प्रमुख आधार यही रहा कि संविधान की प्रस्तावना पहले से ही शिक्षा व्यवस्था में शामिल है और छठी कक्षा से छात्रों को इसके बारे में पढ़ाया जा रहा है। ऐसे में अदालत ने इस विषय पर अलग राष्ट्रीय नीति बनाने के लिए केंद्र या CBSE को कोई निर्देश जारी नहीं किया।
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