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दिल्ली में 10 अक्टूबर के प्रदर्शन से पहले पाबंदियों पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल

Ratna Netam
9 Oct 2026 6:46 PM IST
दिल्ली में 10 अक्टूबर के प्रदर्शन से पहले पाबंदियों पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल
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नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में 10 अक्टूबर को प्रस्तावित विरोध प्रदर्शनों से पहले लगाई गई पाबंदियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने आम नागरिकों की आवाजाही और सार्वजनिक परिवहन सेवाओं पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को लेकर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि विरोध प्रदर्शनों के मद्देनजर मेट्रो और ट्रेन सेवाओं को पूरी तरह बंद नहीं किया जा सकता। अदालत ने संबंधित अधिकारियों से कहा कि वे ऐसी पाबंदियों पर उचित तरीके से दोबारा विचार करें, ताकि प्रदर्शन में शामिल नहीं होने वाले लोगों को अनावश्यक परेशानियों का सामना न करना पड़े।भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले में सुनवाई की। उपलब्ध विवरण के अनुसार, पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे। सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि मौजूदा कार्यवाही मुख्य रूप से आम नागरिकों की आवाजाही और सार्वजनिक परिवहन को प्रभावित करने वाली पाबंदियों से संबंधित है। अदालत ने यह भी साफ किया कि इस मामले में विरोध प्रदर्शन करने के व्यापक अधिकार पर विचार नहीं किया जा रहा है।
आम नागरिकों की परेशानी पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि दिल्ली में प्रस्तावित विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए लगाई गई पाबंदियों का असर उन लोगों पर भी पड़ सकता है, जिनका इन प्रदर्शनों से कोई संबंध नहीं है।राष्ट्रीय राजधानी में प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग नौकरी, व्यवसाय, पढ़ाई, इलाज और अन्य आवश्यक कार्यों के लिए सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में मेट्रो और रेल सेवाओं पर व्यापक प्रतिबंध लगाए जाने से उनकी दैनिक गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं।अदालत की टिप्पणी का मुख्य आधार यही रहा कि सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उठाए गए कदमों का असर आम नागरिकों पर अनावश्यक रूप से नहीं पड़ना चाहिए।कोर्ट ने अधिकारियों को पाबंदियों की समीक्षा करने के लिए कहा, ताकि सुरक्षा संबंधी जरूरतों और नागरिकों की आवाजाही के बीच उचित संतुलन बनाए रखा जा सके।
मेट्रो और ट्रेन सेवाओं को पूरी तरह बंद करने पर आपत्ति
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मेट्रो और ट्रेन सेवाओं को पूरी तरह बंद करने की संभावना पर आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक परिवहन को पूरी तरह रोकना उचित नहीं होगा।दिल्ली मेट्रो राजधानी के परिवहन नेटवर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बड़ी संख्या में लोग प्रतिदिन कार्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों और अन्य स्थानों तक पहुंचने के लिए इसका उपयोग करते हैं।इसी तरह रेल सेवाएं दिल्ली को आसपास के क्षेत्रों और देश के अन्य हिस्सों से जोड़ती हैं। इन सेवाओं पर व्यापक प्रतिबंध लगाए जाने से यात्रियों की यात्रा योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं।अदालत ने अधिकारियों से कहा कि वे प्रस्तावित पाबंदियों पर दोबारा विचार करें। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में किसी विशेष मेट्रो स्टेशन, रेल मार्ग या सेवा के संबंध में अंतिम आदेश का विस्तृत विवरण नहीं दिया गया है।
सुरक्षा व्यवस्था और नागरिक सुविधाओं में संतुलन जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, लेकिन ऐसे कदम परिस्थितियों के अनुरूप और संतुलित होने चाहिए।सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि वह संबंधित अधिकारियों से प्रतिबंधों पर पुनर्विचार करने और मेट्रो तथा रेल सेवाओं को नियंत्रित तरीके से जारी रखने का आग्रह करेंगे।अदालत ने इस आश्वासन को दर्ज करते हुए कहा कि मेट्रो ट्रेनों की आवाजाही पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं होना चाहिए। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि सार्वजनिक परिवहन से संबंधित संशोधित फैसलों की पर्याप्त जानकारी नागरिकों तक पहुंचाई जाए।
सड़क यातायात के लिए भी निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में सड़कों पर लगाई जाने वाली बैरिकेडिंग और यातायात प्रतिबंधों की समीक्षा करने को भी कहा।अदालत ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि यदि किसी मार्ग पर आवाजाही सीमित की जाती है, तो वैकल्पिक रास्तों की जानकारी सार्वजनिक की जाए। इससे वाहन चालकों और यात्रियों को अपनी यात्रा की योजना बनाने में मदद मिलेगी।दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के बीच रोजाना बड़ी संख्या में लोग आवाजाही करते हैं। इनमें गुरुग्राम, नोएडा, ग्रेटर नोएडा और अन्य क्षेत्रों से आने वाले कर्मचारी, विद्यार्थी और आम यात्री शामिल हैं।अदालत ने इसी बात को ध्यान में रखते हुए कहा कि सभी लोगों के पास निजी वाहन नहीं होते। ऐसे में सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर नागरिकों की जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
57 मेट्रो स्टेशनों पर प्रतिबंध का प्रस्ताव
दिल्ली में 10 अक्टूबर को प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन को देखते हुए पुलिस ने दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन से 57 मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वार बंद करने का अनुरोध किया था।इस प्रस्ताव को लेकर अदालत में चिंता जताई गई कि इतने व्यापक प्रतिबंधों से आम नागरिकों को परेशानी हो सकती है।प्रदर्शन के मद्देनजर दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई गई है। अधिकारियों की ओर से भीड़ प्रबंधन और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता बताई गई है।हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा के नाम पर पूरी परिवहन व्यवस्था रोक देना उचित समाधान नहीं है।
विरोध प्रदर्शन के अधिकार पर नहीं थी मुख्य सुनवाई
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने विरोध प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक परिवहन पर लगाई गई पाबंदियों के बीच अंतर स्पष्ट किया।अदालत के समक्ष प्रदर्शन के लिए अनुमति मिलने का प्रश्न भी उठा। पीठ ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार लागू कानूनों और आवश्यक अनुमतियों के दायरे में इस्तेमाल किया जाना चाहिए।अदालत ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिलने के फैसले को चुनौती देने के लिए आयोजकों ने पहले कानूनी प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई।इसके साथ ही कोर्ट ने आम यात्रियों को होने वाली परेशानी को अलग विषय मानते हुए परिवहन सेवाओं पर व्यापक रोक की समीक्षा करने को कहा।
आम यात्रियों को राहत देने पर जोर
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का प्रमुख उद्देश्य यह सुनिश्चित करना रहा कि प्रस्तावित प्रदर्शन के कारण दिल्ली की सामान्य गतिविधियां पूरी तरह प्रभावित न हों।अदालत ने कहा कि संबंधित अधिकारी परिस्थितियों के अनुसार परिवहन सेवाओं को नियंत्रित कर सकते हैं, लेकिन उन्हें पूरी तरह बंद करने के बजाय कम प्रतिबंधात्मक विकल्पों पर विचार करना चाहिए।इस फैसले के बाद मेट्रो, रेलवे और सड़क यातायात से जुड़े अधिकारियों के लिए नागरिकों को समय पर सही जानकारी उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण होगा।फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि 10 अक्टूबर के विरोध प्रदर्शन को लेकर सुरक्षा इंतजाम करते समय आम नागरिकों की आवाजाही और सार्वजनिक परिवहन की जरूरतों का भी ध्यान रखना होगा। अदालत ने व्यापक प्रतिबंधों पर पुनर्विचार करने, मेट्रो और रेल सेवाओं को नियंत्रित रूप से जारी रखने तथा वैकल्पिक यातायात व्यवस्थाओं की जानकारी सार्वजनिक करने पर जोर दिया है।
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