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कैंसर की दवाओं के दाम पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल
Ratna Netam
22 Sept 2026 9:54 PM IST

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को जीवन रक्षक दवाओं, विशेष रूप से कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं के दाम में भारी अंतर को लेकर गंभीर चिंता जताई। अदालत के सामने ऐसे उदाहरण रखे गए, जिनमें किसी दवा का ‘प्राइस टू रिटेलर’ यानी PTR करीब 2,700 रुपये था, जबकि उसी दवा पर अधिकतम खुदरा मूल्य यानी MRP 27,000 रुपये तक दर्ज था। इस करीब दस गुना अंतर पर अदालत ने सवाल किया कि जरूरी दवाओं की कीमतों में इस तरह का अंतर कैसे रहने दिया जा सकता है।जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए दवाओं की कीमत तय करने और उनकी निगरानी की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि जीवन बचाने वाली दवाओं की कीमतों के मामले में मरीजों के हितों की रक्षा बेहद जरूरी है।
₹2700 की दवा पर ₹27000 MRP
सुनवाई के दौरान अदालत का ध्यान कैंसर की एक दवा के मूल्य निर्धारण की ओर दिलाया गया। बताया गया कि यह दवा रिटेलर को करीब 2,700 रुपये में उपलब्ध होती है, लेकिन उस पर MRP लगभग 27,000 रुपये दर्ज है। यानी PTR और MRP के बीच करीब दस गुना अंतर था।इसी उदाहरण पर कोर्ट ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। जस्टिस संदीप मेहता ने इसे मरीजों के साथ “दिन-दहाड़े डकैती” जैसा बताया। अदालत की चिंता यह थी कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों के पास कई बार इलाज और दवाओं को लेकर सीमित विकल्प होते हैं और ऐसे में अत्यधिक MRP उनके आर्थिक बोझ को और बढ़ा सकती है।
अधिकारियों की चुप्पी पर भी सवाल
पीठ ने इस बात पर भी आश्चर्य जताया कि दवाओं की कीमतों पर नजर रखने और जरूरी कदम उठाने वाले संबंधित अधिकारी ऐसी स्थिति में प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं कर रहे हैं। अदालत ने टिप्पणी की कि यह हैरानी की बात है कि कार्रवाई के लिए जिम्मेदार प्राधिकरण इस मुद्दे पर मौन दिखाई देते हैं।सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने दवा बाजार में PTR और MRP के अंतर से जुड़े व्यापक सवाल को सामने ला दिया है। PTR उस कीमत को कहा जाता है जिस पर आमतौर पर दवा रिटेलर तक पहुंचती है, जबकि MRP वह अधिकतम कीमत है जिस पर उत्पाद उपभोक्ता को बेचा जा सकता है।हालांकि PTR और MRP के बीच अंतर में वितरण, स्टॉकिस्ट और रिटेल मार्जिन सहित कई व्यावसायिक घटक शामिल हो सकते हैं, लेकिन कोर्ट की चिंता उन मामलों को लेकर है जहां यह अंतर असामान्य रूप से बहुत ज्यादा दिखाई देता है।
जीवन रक्षक दवाओं को लेकर चिंता
कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का इलाज लंबे समय तक चल सकता है। इसमें जांच, अस्पताल, डॉक्टर की फीस और अन्य चिकित्सा खर्चों के साथ दवाओं का खर्च भी शामिल होता है। कुछ कैंसर दवाएं महंगी होने के कारण परिवारों पर भारी आर्थिक दबाव डाल सकती हैं।ऐसे में अगर किसी दवा की रिटेल सप्लाई कीमत और उसके MRP में कई गुना अंतर हो तो मरीजों के लिए यह महत्वपूर्ण सवाल बन जाता है कि उस दवा का उचित मूल्य आखिर क्या होना चाहिए।सुप्रीम कोर्ट ने इसी पहलू पर ध्यान देते हुए आवश्यक और जीवन रक्षक दवाओं की कीमतों पर प्रभावी नियंत्रण की जरूरत को रेखांकित किया। रिपोर्टों के मुताबिक कोर्ट ने यह भी कहा कि अनियंत्रित MRP की व्यवस्था मरीजों के साथ-साथ सार्वजनिक धन से चलने वाली स्वास्थ्य योजनाओं को भी प्रभावित कर सकती है।
सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं पर भी पड़ सकता है असर
दवाओं की अत्यधिक कीमत का असर केवल उन मरीजों तक सीमित नहीं रहता जो अपनी जेब से भुगतान करते हैं। अगर महंगी MRP वाली दवाओं का भुगतान किसी सरकारी स्वास्थ्य योजना या बीमा व्यवस्था के जरिए किया जाता है तो इसका भार सार्वजनिक धन पर भी पड़ सकता है।यही कारण है कि दवा की वास्तविक सप्लाई कीमत और मरीज से ली जाने वाली कीमत के बीच अंतर की पारदर्शिता महत्वपूर्ण हो जाती है। अदालत के सामने इसी व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए गए।
MRP का मतलब क्या है?
MRP यानी Maximum Retail Price वह अधिकतम मूल्य है जिस पर किसी पैक्ड उत्पाद को उपभोक्ता को बेचा जा सकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि हर स्थिति में दवा को MRP पर ही बेचना जरूरी है। विक्रेता इससे कम कीमत पर दवा बेच सकता है।यहीं PTR महत्वपूर्ण हो जाता है। अगर किसी दवा की PTR काफी कम है और MRP उससे कई गुना ज्यादा है तो रिटेल स्तर पर बड़े मार्जिन की संभावना बन सकती है। हालांकि हर दवा की मूल्य संरचना अलग होती है और केवल PTR-MRP अंतर देखकर किसी विशेष विक्रेता द्वारा अनुचित लाभ कमाने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।सुप्रीम कोर्ट ने जिस मामले पर चिंता जताई, उसमें यह अंतर करीब दस गुना बताया गया, जिसने मूल्य निर्धारण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए।
मरीजों के लिए पारदर्शी कीमत क्यों जरूरी?
गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीज अक्सर डॉक्टर द्वारा बताई गई दवा जल्द से जल्द खरीदना चाहते हैं। ऐसे समय उनके पास अलग-अलग दुकानों पर कीमत की तुलना करने या विकल्प तलाशने का पर्याप्त समय नहीं होता।इसी वजह से जीवन रक्षक दवाओं के मामले में मूल्य पारदर्शिता अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। मरीज को यह पता होना चाहिए कि दवा का निर्धारित मूल्य क्या है और क्या उसका कोई कम कीमत वाला समान चिकित्सकीय विकल्प उपलब्ध है। किसी भी दवा को बदलने का फैसला हालांकि डॉक्टर की सलाह के बिना नहीं किया जाना चाहिए।
दवा मूल्य नियंत्रण व्यवस्था पर बड़ी बहस
भारत में कुछ आवश्यक दवाओं की कीमतें सरकारी मूल्य नियंत्रण व्यवस्था के तहत आती हैं, जबकि सभी दवाओं पर एक जैसी मूल्य सीमा लागू नहीं होती। मौजूदा सुनवाई ने उन जीवन रक्षक दवाओं को लेकर बहस तेज कर दी है जिनके PTR और MRP में असामान्य अंतर दिखाई देता है।अदालत की टिप्पणियों से स्पष्ट है कि मुद्दा केवल किसी एक कैंसर दवा की कीमत तक सीमित नहीं है, बल्कि सवाल यह है कि मरीजों को अत्यधिक मूल्य से बचाने के लिए नियामकीय व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने खड़े किए अहम सवाल
सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी के बाद अब जीवन रक्षक दवाओं की मूल्य संरचना, कंपनियों और वितरण श्रृंखला के मार्जिन तथा सरकारी निगरानी की प्रभावशीलता पर चर्चा बढ़ सकती है।अदालत के सामने आया 2,700 रुपये PTR और 27,000 रुपये MRP वाला उदाहरण यह दिखाता है कि कुछ दवाओं में मूल्य अंतर कितना बड़ा हो सकता है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि हर दवा वास्तविक रूप से MRP पर ही बेची जाती है, लेकिन इतनी ऊंची अधिकतम कीमत तय होने की गुंजाइश पर कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाया है। मामले में आगे की सुनवाई दवा मूल्य नियंत्रण और मरीजों के हितों के लिहाज से महत्वपूर्ण रह सकती है।
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