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सुप्रीम कोर्ट का आदेश शादी जैसे रिश्ते में महिला पार्टनर को मिलेगी सुरक्षा

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (3 अगस्त) को महिलाओं की सुरक्षा और लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े कानून को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के दायरे को स्पष्ट करते हुए कहा है कि कुछ परिस्थितियों में लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला पार्टनर को भी पत्नी के समान कानूनी संरक्षण मिल सकता है। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई रिश्ता शादी जैसे स्वरूप का है और दोनों पक्षों के बीच विवाह करने का इरादा रहा है, तो ऐसे मामले में महिला के साथ क्रूरता करने वाले पुरुष पर धारा 498A के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि केवल कानूनी रूप से विवाह न होने के आधार पर किसी महिला को घरेलू क्रूरता से सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि हर लिव-इन रिलेशनशिप पर यह प्रावधान लागू नहीं होगा, बल्कि केवल उन्हीं रिश्तों में धारा 498A का इस्तेमाल किया जा सकेगा, जो वास्तविक रूप से शादी जैसे रिश्ते की श्रेणी में आते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि ऐसे सहजीवन रिश्ते, जिनमें दो बालिग व्यक्ति आपसी सहमति से साथ रहते हैं और जिनका उद्देश्य वैवाहिक जीवन जैसा होता है, उन्हें कानून के दायरे में देखा जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि यदि महिला यह साबित कर पाती है कि दोनों के बीच का रिश्ता शादी जैसे स्वरूप का था और दोनों पक्षों में विवाह करने की मंशा थी, तो उसे धारा 498A के तहत सुरक्षा मिल सकती है।
अदालत ने यह भी साफ किया कि इस तरह के मामलों में शुरुआती जिम्मेदारी उस महिला की होगी, जो कानूनी संरक्षण चाहती है। उसे यह दिखाना होगा कि उसका रिश्ता केवल सामान्य साथ रहने तक सीमित नहीं था, बल्कि उसमें वैवाहिक संबंधों जैसी गंभीरता और स्थायित्व मौजूद था।
धारा 498A का संबंध किसी महिला के पति या पति के रिश्तेदारों द्वारा उसके साथ की जाने वाली क्रूरता से है। आमतौर पर यह कानून शादीशुदा महिलाओं के मामलों में लागू होता रहा है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि घरेलू हिंसा और मानसिक उत्पीड़न से बचाव का उद्देश्य केवल विवाह के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता।
पीठ ने कहा कि शादी और शादी जैसे सहजीवन रिश्ते के बीच केवल कानूनी अंतर के आधार पर महिलाओं को मिलने वाली सुरक्षा में भेद करना उचित नहीं है। अदालत ने कहा कि घरेलू हिंसा को रोकने के उद्देश्य से इस तरह के रिश्तों को भी आवश्यक परिस्थितियों में कानून के तहत संरक्षण दिया जाना चाहिए। कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 में दिए गए समानता के अधिकार से भी जोड़ा।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के साथ सावधानी भी बरती है। अदालत ने कहा कि केवल किसी पुरुष और महिला के साथ रहने मात्र से धारा 498A लागू नहीं हो जाएगी। रिश्ते की प्रकृति, दोनों पक्षों की मंशा और परिस्थितियों की जांच जरूरी होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी को लेकर भी महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में बिना प्रारंभिक जांच के किसी व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि आरोप लगते ही किसी व्यक्ति को दोषी नहीं माना जा सकता और कानून के तहत उचित प्रक्रिया का पालन जरूरी है।
पीठ ने कहा कि कोई भी व्यक्ति यह सोचकर रिश्ते में प्रवेश नहीं करता कि आगे चलकर उसके साथ क्रूरता या विवाद होगा। समय के साथ कुछ रिश्तों में परेशानियां आ सकती हैं, इसलिए कानून को संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
यह फैसला उस कानूनी सवाल पर आया था जिसमें यह तय करना था कि क्या लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले व्यक्ति के खिलाफ IPC की धारा 498A के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को महिलाओं के अधिकारों और बदलते सामाजिक रिश्तों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने जहां महिलाओं को सुरक्षा का अधिकार दिया है, वहीं झूठे मामलों से बचाव के लिए जांच और प्रक्रिया का पालन करने पर भी जोर दिया है।





