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दिल्ली-एनसीआर
राहुल गांधी और अखिलेश यादव को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस
Ratna Netam
15 Oct 2026 5:48 PM IST

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नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर 12 अक्टूबर को विपक्षी दलों द्वारा निकाले गए मार्च का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026 को शीर्ष अदालत ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव और अन्य विपक्षी नेताओं के खिलाफ दायर याचिका पर नोटिस जारी किया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सुप्रीम कोर्ट की ओर निकाले गए राजनीतिक मार्च के माध्यम से न्यायपालिका पर दबाव बनाने का प्रयास किया गया।मामले की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट कहा कि न्यायपालिका को कोई डरा-धमका नहीं सकता। अदालत ने न्यायिक परिसरों के आसपास विरोध प्रदर्शनों और जुलूसों को नियंत्रित करने के लिए नियम बनाने की मांग वाली याचिका पर संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है।
मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने की सुनवाई
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने की।याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि राजनीतिक नेताओं और उनके समर्थकों द्वारा न्यायालय परिसर की ओर मार्च करना न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गरिमा से जुड़ा गंभीर विषय है।उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रकार के विरोध प्रदर्शन से अदालतों पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाने की कोशिश हो सकती है।इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्यायपालिका को किसी भी प्रकार से डराया या प्रभावित नहीं किया जा सकता।उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अदालतें बाहरी घटनाक्रम से अनजान नहीं हैं और सार्वजनिक रूप से दिए जाने वाले बयानों की जानकारी रखती हैं।
12 अक्टूबर को विपक्ष ने निकाला था मार्च
दरअसल, 12 अक्टूबर को राहुल गांधी सहित इंडिया गठबंधन के कई वरिष्ठ नेताओं ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण में कथित अनियमितताओं के विरोध में सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च निकाला था।विपक्षी नेताओं की मांग थी कि निर्वाचन आयोग की SIR प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच की जाए और कथित तौर पर हटाए गए मतदाताओं के नामों की समीक्षा की जाए।इस दौरान विपक्षी नेताओं ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी उठाई थी।मार्च में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों के नेता तथा समर्थक शामिल हुए थे। राजधानी दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था के बीच यह प्रदर्शन आयोजित किया गया था।
200 वकीलों के ज्ञापन का किया उल्लेख
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि लगभग 200 वकीलों ने एक ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं।ज्ञापन में न्यायपालिका को कथित रूप से डराने-धमकाने और उस पर दबाव डालने के प्रयासों को लेकर चिंता जताई गई है।याचिकाकर्ताओं ने कहा कि न्यायिक संस्थाओं की स्वतंत्रता बनाए रखना आवश्यक है और राजनीतिक गतिविधियों के कारण अदालतों की कार्यवाही प्रभावित नहीं होनी चाहिए।उन्होंने न्यायालय से इस प्रकार के प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए उचित दिशा-निर्देश जारी करने का अनुरोध किया।
अदालत ने कहा- हम सब कुछ जानते हैं
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया ने विपक्षी नेताओं के मार्च को अदालत पर दबाव बनाने का प्रयास बताया।इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ऐसे प्रयास कमजोर हैं और न्यायपालिका उनसे प्रभावित नहीं होती।पीठ ने यह भी कहा कि न्यायालय किसी अलग-थलग दुनिया में काम नहीं करता। अदालत को जानकारी रहती है कि बाहर क्या बयान दिए जा रहे हैं और न्यायालय के भीतर क्या दलीलें प्रस्तुत की जा रही हैं।अदालत की टिप्पणी का उद्देश्य न्यायिक स्वतंत्रता और निष्पक्षता के महत्व को स्पष्ट करना था।
राजनीतिक प्रदर्शनों के लिए दिशा-निर्देश बनाने की मांग
याचिका में मांग की गई है कि न्यायिक परिसरों के आसपास राजनीतिक प्रदर्शनों और जुलूसों के आयोजन के संबंध में स्पष्ट नियम निर्धारित किए जाएं।इसके अलावा कुछ विपक्षी नेताओं के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग भी की गई है।याचिका में राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, अखिलेश यादव और तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा सहित अन्य नेताओं का उल्लेख किया गया है।हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की ओर से नोटिस जारी करने का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित नेताओं के खिलाफ लगाए गए आरोप साबित हो गए हैं।
SIR मामले पर भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
इसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं द्वारा SIR प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर भी सुनवाई की।अदालत ने भारत निर्वाचन आयोग और संबंधित चुनाव अधिकारियों से जवाब मांगा है।विपक्ष ने मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है।फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के सामने दो अलग-अलग कानूनी मुद्दे हैं। पहला, SIR प्रक्रिया की वैधता और दूसरा, न्यायिक परिसर के आसपास राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों की सीमाएं। दोनों मामलों में आगे की न्यायिक कार्यवाही महत्वपूर्ण होगी।
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