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जज ही जजों की नियुक्ति करते हैं यह मिथक है सुप्रीम कोर्ट
Ratna Netam
23 Sept 2026 8:29 PM IST

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने बुधवार को न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए अपनाई जाने वाली कॉलेजियम व्यवस्था को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने आम धारणा कि “जज ही जजों की नियुक्ति करते हैं” को मिथक और गलत धारणा बताया। साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिशों को चुनिंदा तरीके से मंजूरी देने के चलन पर भी गंभीर चिंता जताई।जस्टिस दत्ता की यह टिप्पणी मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान उनके अलग मत में सामने आई। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कॉलेजियम व्यवस्था का उदाहरण देते हुए दलील दी थी। इसी तर्क का जवाब देते हुए जस्टिस दत्ता ने न्यायिक नियुक्तियों की वास्तविक प्रक्रिया का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि कॉलेजियम को ऐसी व्यवस्था के रूप में पेश करना जिसमें केवल न्यायाधीश ही दूसरे न्यायाधीशों को नियुक्त करते हैं, पूरी प्रक्रिया को सही ढंग से नहीं दर्शाता। उनके मुताबिक न्यायाधीशों की नियुक्ति में केंद्र और राज्यों की कार्यपालिका के साथ-साथ इंटेलिजेंस तथा दूसरी एजेंसियों की भी भूमिका होती है। उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि और योग्यता की जांच होती है और अंतिम नियुक्ति राष्ट्रपति के नाम से होती है।जस्टिस दत्ता ने कहा कि कॉलेजियम की भूमिका मूल रूप से नामों की सिफारिश करने की है। नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका भी विभिन्न चरणों में शामिल रहती है। उन्होंने इस धारणा से असहमति जताई कि कॉलेजियम अपने आप में पूरी नियुक्ति प्रक्रिया को नियंत्रित करता है।
मामले में केंद्र की दलील चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए गठित चयन समिति की संरचना से जुड़ी थी। 2023 के कानून के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं। इस कानून में भारत के मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति में जगह नहीं दी गई है। इसी प्रावधान सहित कानून के विभिन्न हिस्सों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से कॉलेजियम व्यवस्था से तुलना की गई। जस्टिस दत्ता ने इस तुलना पर सवाल उठाते हुए कहा कि न्यायिक नियुक्तियों में कार्यपालिका की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कॉलेजियम की सिफारिशों पर केंद्र की ओर से चुनिंदा मंजूरी दिए जाने के मुद्दे को भी उठाया। जस्टिस दत्ता के मुताबिक चिंता की बात यह है कि कई बार कॉलेजियम द्वारा भेजे गए नामों में से अधिकांश को मंजूरी दे दी जाती है, जबकि एक या कुछ नाम रोक लिए जाते हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह की चुनिंदा स्वीकृति से कॉलेजियम प्रस्ताव की समग्रता प्रभावित होती है।हाल का एक उदाहरण दिल्ली हाईकोर्ट से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 10 सितंबर 2026 को दिल्ली हाईकोर्ट के लिए आठ न्यायिक अधिकारियों के नामों की सिफारिश की थी। बाद में केंद्र ने सात की नियुक्ति अधिसूचित की, जबकि आठवें नाम की नियुक्ति उस समय तक अधिसूचित नहीं हुई थी।
जस्टिस दत्ता ने अपने मत में यह भी कहा कि कई अवसरों पर कॉलेजियम की सिफारिशों पर लंबे समय तक निर्णय नहीं लिया जाता। कुछ मामलों में दोबारा सिफारिश किए जाने के बाद भी नाम लंबित रहने की स्थिति बनी है। उनके अनुसार यदि कॉलेजियम की सिफारिशें अपने आप बाध्यकारी नियुक्तियां होतीं तो सभी सिफारिशें उसी रूप में लागू हो जातीं।उन्होंने सवाल उठाया कि यदि सिफारिशों को चुनिंदा तरीके से लागू करने की प्रक्रिया एक स्वीकार्य प्रथा बनती गई तो यह स्थिति कब तक जारी रह सकती है। उनके मत में कॉलेजियम कई बार संस्था का कामकाज जारी रखने और कार्यपालिका के साथ सीधे टकराव से बचने के लिए ऐसी स्थिति के बावजूद आगे बढ़ता है।
जस्टिस दत्ता ने डॉ. बीआर आंबेडकर के न्यायपालिका की स्वतंत्रता से जुड़े विचारों का भी उल्लेख किया। उन्होंने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसकी संस्थागत क्षमता को संवैधानिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया और वर्तमान नियुक्ति व्यवस्था में कार्यपालिका की प्रभावी भूमिका की ओर ध्यान दिलाया।इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ में इस सवाल पर अलग-अलग राय सामने आई कि चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को संविधान पीठ के पास भेजा जाना चाहिए या नहीं। जस्टिस दीपांकर दत्ता का मत था कि स्थापित संवैधानिक सिद्धांतों के आधार पर मामले पर विचार किया जा सकता है और बड़ी पीठ को संदर्भित करना जरूरी नहीं है। दूसरी ओर जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने महत्वपूर्ण संवैधानिक सवालों को पांच न्यायाधीशों की पीठ के पास भेजने का समर्थन किया।
मतभेद के बाद मामले के कागजात भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने का निर्देश दिया गया, ताकि वे इस पर विचार कर सकें कि 2023 के कानून की संवैधानिक वैधता से जुड़े सवालों पर सुनवाई के लिए संविधान पीठ गठित की जाए या नहीं।पूरा विवाद मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं ने 2023 के कानून के उस प्रावधान सहित विभिन्न हिस्सों को चुनौती दी है, जिसने चयन समिति की संरचना तय की है। सुप्रीम कोर्ट में इस कानून की संवैधानिक वैधता पर अंतिम निर्णय अभी होना बाकी है।
बुधवार की कार्यवाही में जस्टिस दत्ता की कॉलेजियम से जुड़ी टिप्पणी ने न्यायिक नियुक्तियों में न्यायपालिका और कार्यपालिका की भूमिका को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया। उनकी टिप्पणियों का मुख्य बिंदु यह था कि न्यायाधीशों की नियुक्ति को केवल “जजों द्वारा जजों की नियुक्ति” के रूप में पेश करना प्रक्रिया का अधूरा चित्र है, क्योंकि इसमें सरकार, जांच एजेंसियों और राष्ट्रपति सहित कई संवैधानिक एवं प्रशासनिक स्तर शामिल होते हैं।
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