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दलबदल कानून पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कपिल सिब्बल की याचिका पर केंद्र को नोटिस

Kavita2
27 July 2026 2:35 PM IST
दलबदल कानून पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कपिल सिब्बल की याचिका पर केंद्र को नोटिस
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नई दिल्ली: संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) की व्याख्या को लेकर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक बहस एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय ने निर्दलीय राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। याचिका में उस न्यायिक व्याख्या पर पुनर्विचार की मांग की गई है, जिसके तहत सांसद (MP) और विधायक (MLA) किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय का दावा कर दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य घोषित होने से बच सकते हैं।

मामले की सुनवाई जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने की। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि याचिका में ऐसे कई संवैधानिक और विधायी प्रश्न उठाए गए हैं, जिन पर संसद को भी विचार करना होगा। अदालत ने केंद्र सरकार से इस विषय पर अपना पक्ष रखने को कहा है।

क्या है मामला?

कपिल सिब्बल की याचिका संविधान की दसवीं अनुसूची की उस व्याख्या को चुनौती देती है, जिसके अनुसार किसी राजनीतिक दल के निर्वाचित प्रतिनिधि यदि एक निश्चित संख्या में किसी अन्य दल में विलय का दावा करते हैं, तो उन्हें दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता से छूट मिल सकती है।

याचिका में कहा गया है कि इस प्रावधान की वर्तमान व्याख्या का कई बार राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया गया है। इससे दलबदल विरोधी कानून का मूल उद्देश्य प्रभावित होता है, जिसका मकसद निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा व्यक्तिगत या राजनीतिक लाभ के लिए पार्टी बदलने की प्रवृत्ति पर रोक लगाना था।

अदालत की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि इस याचिका में कई ऐसे प्रश्न हैं, जिनका संबंध केवल न्यायिक व्याख्या से नहीं बल्कि विधायी नीति से भी है। अदालत ने कहा कि कुछ मुद्दे ऐसे हैं जिन पर संसद को निर्णय लेना होगा।

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या और उनके प्रभावों की समीक्षा करना न्यायपालिका का दायित्व है। इसी कारण इस मामले की सुनवाई आवश्यक है।

दसवीं अनुसूची क्या है?

भारतीय संविधान में दसवीं अनुसूची को वर्ष 1985 में 52वें संविधान संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया था। इसका उद्देश्य दलबदल की बढ़ती घटनाओं पर रोक लगाना और निर्वाचित सरकारों की स्थिरता बनाए रखना था।

इस कानून के तहत यदि कोई सांसद या विधायक स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है या सदन में पार्टी व्हिप के खिलाफ मतदान करता है, तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है। हालांकि, राजनीतिक दलों के विलय से संबंधित कुछ परिस्थितियों में कानून छूट भी प्रदान करता है।

विवाद का केंद्र

याचिका का मुख्य मुद्दा यही है कि विलय संबंधी प्रावधानों की वर्तमान व्याख्या कई बार राजनीतिक दलों और निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा अपने हित में इस्तेमाल की जाती रही है। आलोचकों का कहना है कि इससे दलबदल विरोधी कानून की भावना कमजोर होती है और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ सकती है।

याचिका में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि संविधान की मंशा निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना थी, न कि तकनीकी आधार पर दलबदल को वैध ठहराना।

राजनीतिक महत्व

यह मामला केवल कानूनी नहीं बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हाल के वर्षों में कई राज्यों में सरकारों के गठन और गिरने के दौरान दलबदल विरोधी कानून की व्याख्या और उसके अनुप्रयोग को लेकर विवाद सामने आए हैं।

कई मामलों में विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि विधायकों के समूहों द्वारा विलय का दावा कर दलबदल विरोधी कानून से बचने की कोशिश की गई। वहीं संबंधित दलों ने इसे संविधान के अनुरूप कदम बताया।

केंद्र सरकार से जवाब तलब

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर इस संवैधानिक मुद्दे पर विस्तृत जवाब मांगा है। केंद्र के जवाब और सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत यह तय करेगी कि इस विषय पर विस्तृत सुनवाई की आवश्यकता है या नहीं।

संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अदालत इस मामले में वर्तमान व्याख्या पर पुनर्विचार करती है, तो इसका असर भविष्य में दलबदल से जुड़े मामलों और राजनीतिक दलों की रणनीतियों पर पड़ सकता है।

आगे क्या?

फिलहाल मामला प्रारंभिक चरण में है और सुप्रीम कोर्ट ने केवल नोटिस जारी किया है। आगामी सुनवाई में केंद्र सरकार, अन्य संबंधित पक्ष और याचिकाकर्ता अपनी-अपनी दलीलें पेश करेंगे।

इस मामले पर सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम फैसला भारतीय लोकतंत्र, संसदीय व्यवस्था और दलबदल विरोधी कानून की भविष्य की व्याख्या के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजनीतिक दलों और संवैधानिक विशेषज्ञों की नजर अब इस मामले की आगामी सुनवाई पर टिकी हुई है।

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