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अवैध रेत खनन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, तीन राज्यों से मांगा जवाब

Ashish verma
6 Oct 2026 11:39 PM IST
अवैध रेत खनन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, तीन राज्यों से मांगा जवाब
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नई दिल्ली। राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य में कथित अवैध रेत खनन और उससे वन्यजीवों तथा पर्यावरण को हो रहे नुकसान के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश से विस्तृत जवाब मांगा है। इसके साथ ही केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति यानी CEC को भी पूरे मामले की जमीनी स्थिति का आकलन कर विस्तृत रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया गया है।
मामला राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य में बड़े पैमाने पर अवैध रेत खनन और उससे संकटग्रस्त जलीय वन्यजीवों को पैदा हो रहे खतरे से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय पर स्वत: संज्ञान लेते हुए कार्यवाही शुरू की थी।
अदालत ने प्रारंभिक सुनवाई के दौरान कहा था कि संरक्षित क्षेत्रों में वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। अवैध खनन का असर केवल नदी के प्रवाह और रेत के प्राकृतिक स्तर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका सीधा प्रभाव घड़ियाल, गंगा डॉल्फिन और अन्य जलीय जीवों के आवास पर भी पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश को नोटिस जारी किए। इन राज्यों से खनन, वन, जल संसाधन और कानून-व्यवस्था से जुड़े विभागों द्वारा उठाए गए कदमों की जानकारी मांगी गई।
अदालत के सामने एमिकस क्यूरी और CEC की शुरुआती रिपोर्ट भी रखी गई। इसके बाद तीनों राज्यों को इन रिपोर्टों पर जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया गया।
CEC ने अदालत से विस्तृत अध्ययन के लिए समय मांगा था। सुप्रीम कोर्ट ने समिति को छह सप्ताह में विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने की अनुमति दी।
इस रिपोर्ट में अवैध रेत खनन वाले संवेदनशील क्षेत्रों, नदी के पारिस्थितिकी तंत्र पर उसके प्रभाव, निगरानी व्यवस्था, प्रशासन की कार्रवाई और भविष्य में अवैध खनन रोकने के उपायों पर जानकारी देने को कहा गया।
अदालत ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को भी अपना पक्ष रिकॉर्ड पर रखने का अवसर दिया। इसके अलावा राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड को भी मामले में पक्षकार बनाया गया।
मामले की सुनवाई के दौरान राजस्थान सरकार की ओर से वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत जारी एक अधिसूचना का मुद्दा भी सामने आया। सुप्रीम कोर्ट ने उस अधिसूचना के संचालन पर अंतरिम रोक लगा दी थी।
अदालत ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी NGT के सामने लंबित अवैध खनन से जुड़े एक मामले को भी
सुप्रीम कोर्ट
में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया, ताकि इससे जुड़े मामलों की एक साथ सुनवाई की जा सके।
बाद की सुनवाई में अदालत ने राज्यों द्वारा दाखिल अनुपालन रिपोर्ट और CEC की रिपोर्ट का भी अध्ययन किया। CEC ने जुलाई में अपनी तीसरी रिपोर्ट पेश की, जिसमें अवैध रेत खनन पर रोक लगाने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए।
इनमें संवेदनशील इलाकों में CCTV कैमरे लगाने, PTZ कैमरों और AI आधारित थर्मल कैमरों का इस्तेमाल करने, स्थायी और अस्थायी चेकपोस्ट बढ़ाने तथा संयुक्त पेट्रोलिंग व्यवस्था मजबूत करने जैसे सुझाव शामिल थे।
CEC ने आदतन अपराधियों और अवैध खनन नेटवर्क से जुड़े लोगों का डिजिटल डेटाबेस तैयार करने की भी सिफारिश की।
इसके अलावा प्रत्येक जिले में प्रवर्तन और निगरानी समितियां बनाने, विभिन्न विभागों के बीच डेटा साझा करने और खनन माफिया के खिलाफ समन्वित कार्रवाई करने पर जोर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों की कार्रवाई की समीक्षा करते हुए कहा कि कुछ कदम जरूर उठाए गए हैं, लेकिन संगठित अवैध रेत खनन के खिलाफ प्रवर्तन व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत है।
अदालत ने विशेष रूप से उन लोगों के खिलाफ सख्त कदम उठाने पर जोर दिया जो लंबे समय से संगठित तरीके से अवैध रेत खनन और परिवहन से जुड़े हैं।
कोर्ट ने तीनों राज्यों से यह भी कहा कि वे CEC की सिफारिशों पर स्पष्ट निर्णय लें और बताएं कि किन सुझावों को लागू किया जा रहा है तथा उनके क्रियान्वयन की समयसीमा क्या होगी।
मध्य प्रदेश ने निगरानी के लिए कई संवेदनशील स्थानों की पहचान की और CCTV समेत तकनीकी निगरानी की व्यवस्था शुरू की। पुलिस और वन विभाग की संयुक्त चौकियां भी स्थापित की गईं।
राजस्थान ने भी कई स्थायी और अस्थायी चेकपोस्ट स्थापित करने तथा निगरानी बढ़ाने की जानकारी अदालत को दी।
वहीं उत्तर प्रदेश में प्रभावी निगरानी ढांचे को लेकर CEC ने कुछ कमियां बताई थीं। अदालत ने सभी राज्यों को चेकपोस्ट, वन कर्मियों की तैनाती और निगरानी व्यवस्था मजबूत करने के निर्देश दिए।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों के मुख्य सचिवों को व्यक्तिगत रूप से इस मामले की निगरानी करने को कहा। संबंधित जिलों के जिलाधिकारियों को भी अवैध खनन रोकने के लिए नोडल अधिकारी की जिम्मेदारी देने के निर्देश दिए गए।
अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि अवैध रेत खनन को केवल खनन कानूनों के उल्लंघन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसका सीधा प्रभाव नदी, वन्यजीव और स्थानीय पर्यावरण पर पड़ता है।
राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के हिस्सों में फैला हुआ है। यह क्षेत्र दुर्लभ घड़ियाल सहित कई जलीय प्रजातियों के लिए महत्वपूर्ण प्राकृतिक आवास माना जाता है।
रेत की अनियंत्रित खुदाई से नदी तल की प्राकृतिक संरचना बदल सकती है। इससे घड़ियालों के अंडे देने वाले स्थान, नदी किनारे के आवास और जलीय पारिस्थितिकी प्रभावित हो सकती है।
यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले की लगातार निगरानी कर रहा है और केवल कार्रवाई की रिपोर्ट लेने के बजाय राज्यों से स्थायी व्यवस्था विकसित करने को कह रहा है।
CEC ने वैकल्पिक निर्माण सामग्री के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए M-Sand इकाइयों और लाइसेंस प्राप्त रेत भंडारण केंद्रों की व्यवस्था पर भी जोर दिया।
इसका उद्देश्य प्राकृतिक नदी रेत पर दबाव कम करना और अवैध खनन की मांग को नियंत्रित करना है।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को निगरानी तकनीक के साथ जमीनी स्तर पर पर्याप्त कर्मचारियों की तैनाती सुनिश्चित करने को भी कहा है। वनकर्मियों की कमी, दूरदराज के इलाकों में निगरानी और खनन नेटवर्क की गतिविधियों पर नजर रखना इस मामले की प्रमुख चुनौतियों में शामिल हैं।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अवैध खनन से जुड़े संगठित गिरोहों और बार-बार अपराध करने वालों के खिलाफ प्रभावी कानूनी कार्रवाई पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट इस पूरे मामले में राज्यों द्वारा उठाए जा रहे कदमों और CEC की सिफारिशों के क्रियान्वयन की निगरानी कर रहा है। अदालत की सख्ती से साफ है कि राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य में अवैध रेत खनन और पर्यावरणीय नुकसान को रोकने के लिए राज्यों को केवल कागजी कार्रवाई के बजाय जमीन पर ठोस कदम उठाने होंगे।
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