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भ्रष्टाचार के दो मामलों में RPF के पूर्व अधिकारी को सुप्रीम कोर्ट ने किया बरी
Kiran
10 Oct 2026 8:36 AM IST

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Delhi सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामलों में रेलवे सुरक्षा बल (RPF) के एक पूर्व डिविजनल सिक्योरिटी कमिश्नर को बरी कर दिया है। इन मामलों में ट्रांसफर और पोस्टिंग के लिए रिश्वत लेने का आरोप था। कोर्ट ने कहा कि किसी बिचौलिए को पैसे देने से यह साबित नहीं होता कि सरकारी कर्मचारी ने गैर-कानूनी तरीके से पैसे (रिश्वत) लिए हैं। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने 16 सितंबर के अपने फैसले में कहा, "किसी तीसरे व्यक्ति द्वारा पैसे लेने से सरकारी कर्मचारी पर अपने आप आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती।" कोर्ट ने केरल के पलक्कड़ में RPF के डिविजनल सिक्योरिटी कमिश्नर के तौर पर काम कर रहे भरत राज मीणा की सज़ा को रद्द कर दिया। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष दोनों मामलों में उनके अपराध को बिना किसी शक के साबित करने में नाकाम रहा।
CBI का आरोप था कि मीणा अपने मातहत अधिकारियों का इस्तेमाल बिचौलियों के तौर पर करते थे ताकि वे RPF कर्मचारियों से मनचाहे ट्रांसफर, पोस्टिंग और नौकरी से जुड़े अन्य फायदों के लिए रिश्वत ले सकें। एक मामले में, एक कॉन्स्टेबल को ट्रैप ऑपरेशन के दौरान शिकायतकर्ता से 5,000 रुपये लेते हुए पकड़ा गया था। दूसरे मामले में, अभियोजन पक्ष का आरोप था कि मीणा ने ट्रांसफर के सिलसिले में एक बिचौलिए के ज़रिए पैसे लिए थे।
सबूतों की जांच करते हुए, बेंच ने ट्रैप केस में शिकायतकर्ता और बिचौलिए के बयानों में विसंगतियों की ओर इशारा किया। हालांकि शिकायतकर्ता का दावा था कि मीणा ने उसे बिचौलिए को पैसे देने के लिए कहा था, लेकिन बिचौलिए के बयान से घटनाओं का वही क्रम साबित नहीं हुआ। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष ज़्यादा से ज़्यादा यह साबित कर पाया कि शिकायतकर्ता और उस बिचौलिए के बीच पैसे का लेन-देन हुआ, जिसने सरकारी कर्मचारी का नाम लिया था। इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि मीणा ने रिश्वत ली थी।
बेंच ने दोहराया कि 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम' (Prevention of Corruption Act) के तहत सज़ा के लिए गैर-कानूनी तरीके से पैसे (रिश्वत) की मांग और उसे लेने का सबूत होना ज़रूरी है। धारा 20 के तहत कानूनी अनुमान (statutory presumption) का इस्तेमाल तब तक नहीं किया जा सकता जब तक अभियोजन पक्ष पहले ज़रूरी बुनियादी तथ्य साबित न कर दे।
कोर्ट ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि 'अप्रूवर' (वह आरोपी जिसे गवाही देने के बदले माफ़ी मिल जाती है) के बयान की सावधानीपूर्वक जांच की जानी चाहिए और आम तौर पर अहम बातों के लिए स्वतंत्र पुष्टि की ज़रूरत होती है। दूसरे मामले में, कोर्ट ने कथित पेमेंट को लेकर वाजिब शक पाया; इसमें गवाहों के बयानों में विसंगतियां और रिकवरी या स्वतंत्र पुष्टि करने वाली सामग्री का न होना शामिल था। दोनों अपीलों को मंज़ूरी देते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने मीना को विचाराधीन मामलों में सभी आरोपों से बरी कर दिया।
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