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विशेष सत्र से पहले बढ़ी हलचल परिसीमन बिल पर विपक्ष और सरकार आमने सामने

Ratna Netam
27 Aug 2026 5:35 PM IST
विशेष सत्र से पहले बढ़ी हलचल परिसीमन बिल पर विपक्ष और सरकार आमने सामने
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दिल्ली : देश की राजनीति में एक बार फिर परिसीमन बिल को लेकर हलचल तेज हो गई है। केंद्र सरकार की ओर से इस बिल को आगे बढ़ाने की संभावनाओं के बीच कांग्रेस समेत विपक्षी दल सतर्क हो गए हैं। चर्चा है कि सरकार परिसीमन विधेयक को पारित कराने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने पर विचार कर सकती है। हालांकि अभी तक सरकार की ओर से इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
परिसीमन बिल का मुद्दा राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माना जा रहा है, क्योंकि इसका सीधा असर लोकसभा और विधानसभा सीटों के पुनर्गठन पर पड़ सकता है। परिसीमन के जरिए जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय की जाती हैं। ऐसे में राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सीटों की संख्या को लेकर कई दल अपनी चिंताएं जाहिर कर चुके हैं।
दो तिहाई बहुमत क्यों है जरूरी
परिसीमन से जुड़ा विधेयक संविधान संशोधन से जुड़ा होने के कारण इसे संसद में पारित कराने के लिए विशेष बहुमत की जरूरत होगी। संविधान संशोधन विधेयक को पास कराने के लिए सदन में मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन के साथ-साथ कुल सदस्यों के बहुमत की आवश्यकता होती है।
यही वजह है कि सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती संख्या बल जुटाने की है। पिछली कोशिश में सरकार को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया था। अप्रैल में हुए मतदान में विधेयक के पक्ष में 298 और विपक्ष में 230 वोट पड़े थे, जबकि पारित कराने के लिए 352 वोटों की जरूरत थी।
एनडीए का क्या है गणित
मौजूदा राजनीतिक समीकरणों में एनडीए सरकार के पास लोकसभा में मजबूत स्थिति है, लेकिन संविधान संशोधन के लिए केवल सरकार के अपने सांसदों का समर्थन पर्याप्त नहीं माना जा रहा। इसलिए सरकार को सहयोगी दलों और कुछ विपक्षी दलों के समर्थन की जरूरत पड़ सकती है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कुछ क्षेत्रीय दल मुद्दे के आधार पर सरकार का साथ दे सकते हैं। वहीं कुछ विपक्षी सांसदों की गैरमौजूदगी भी मतदान के समय सरकार के लिए मददगार साबित हो सकती है। हालांकि यह पूरा गणित राजनीतिक सहमति पर निर्भर करेगा।
कांग्रेस क्यों हुई सतर्क
कांग्रेस ने सरकार की संभावित रणनीति को देखते हुए अपना रुख स्पष्ट करना शुरू कर दिया है। पार्टी का कहना है कि परिसीमन जैसे बड़े संवैधानिक मुद्दे पर व्यापक चर्चा और सभी राज्यों के हितों को ध्यान में रखना जरूरी है।
कांग्रेस को आशंका है कि परिसीमन के जरिए दक्षिणी राज्यों और उन राज्यों के प्रतिनिधित्व पर असर पड़ सकता है, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है। यही वजह है कि विपक्ष इस मुद्दे को संघीय ढांचे और राज्यों के अधिकारों से जोड़कर देख रहा है।
दक्षिणी राज्यों की चिंता
परिसीमन को लेकर सबसे बड़ी बहस दक्षिण भारत के राज्यों में है। इन राज्यों का तर्क है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण और विकास के क्षेत्र में बेहतर काम किया है, उन्हें सीटों के पुनर्वितरण में नुकसान नहीं होना चाहिए।
वहीं केंद्र सरकार का पक्ष है कि परिसीमन का उद्देश्य सभी नागरिकों को समान प्रतिनिधित्व देना है। सरकार इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने वाला कदम बता रही है।
क्या विशेष सत्र बुलाया जाएगा
फिलहाल विशेष सत्र को लेकर केवल राजनीतिक चर्चाएं चल रही हैं। सरकार की ओर से अंतिम फैसला सामने नहीं आया है। लेकिन जिस तरह से संख्या बल और समर्थन जुटाने की कवायद की खबरें सामने आ रही हैं, उससे साफ है कि परिसीमन बिल को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं।
अगर सरकार विशेष सत्र बुलाती है तो संसद में जोरदार बहस और राजनीतिक टकराव देखने को मिल सकता है। विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की तैयारी कर रहा है, जबकि सरकार इसे ऐतिहासिक सुधार के रूप में पेश कर सकती है।
आगे क्या होगा
परिसीमन बिल का भविष्य पूरी तरह संसद के गणित और राजनीतिक सहमति पर निर्भर करेगा। सरकार के लिए चुनौती सिर्फ बिल पेश करना नहीं बल्कि दो तिहाई समर्थन हासिल करना भी है।
वहीं विपक्ष के लिए यह मुद्दा राज्यों के अधिकार, संघवाद और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ा हुआ है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद और देश की राजनीति में बड़ा केंद्र बन सकता है।
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